सोमवार, जनवरी 17, 2011

क्या माटी कुम्हार को रौंदने लगी है


क्या अब माटी कुम्हार को रौंदने लगी है वीरेन्द्र जैन
कबीरदास ने आज से चार सौ साल पहले ही घोषणा कर दी थी-
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रूंदे मोय
इक दिन ऐसो आयगो, मैं रूंदूंगी तोय
रूपम पाठक नामक महिला ने अपने यौन शोषण के खिलाफ एक बाहुबली विधायक की चाकू मार कर हत्या करके यही चरितार्थ कर दिया है कि जब जुल्म की इंतिहा हो जाती है और कहीं से भी न्याय मिलता नहीं दीखता तो कमजोर से कमजोर इंसान भी अपनी क्षमता के अनुसार प्रतिवार करने को मजबूर हो जाता है। ऐसा ही एक दृष्य नागपुर में देखा गया था जब एक नामी गिरामी गुंडे जिसके ऊपर 26 से अधिक हत्या, बलात्कार और अन्य आरोपों के प्रकरण चल रहे थे और उनसे भी अधिक प्रकरणों में वह कानून की कमजोरियों और अपने आतंक के सहारे मुक्त हो चुका था, को काम करने वाली बाइयों ने सामूहिक हमला कर अदालत के अन्दर ही मार डाला था।
पूर्णिया से जिन भाजपा विधायक राज किशोर केशरी की रूपम पाठक नामक महिला ने हत्या कर दी उसने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। यदि मृत विधायक के चरित्र का अध्ययन किया जाये तो गत विधानसभा चुनाव के दौरान ही उनके द्वारा प्रस्तुत किये गये शपथ पत्र से पता चलता है कि उनके ऊपर धारा उन्होंने अपने शपथ पत्र में लिखा है कि वे आईपीसी की दफा 147, 148, 149, 323, 332, 341, 353, 307, 376/43, 379, 426, 427, 504 में अभियुक्त हैं। जो लोग कानून की धाराओं के अर्थ जनना चाहें तो इतना समझ लेना ही काफी है कि आदरणीय विधायकजी पर ये धाराएं कत्ल की कोशिश, चोरी, घूसखोरी, बलात्कार, अपहरण आदि जैसे संगीन आरोपों के लिए लगी थीं। आम तौर पर जब गैर भाजपा शासित राज्यों में धर्म और संस्कृति की ठेकेदार इस पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं पर कोई आरोप लगता है तो वे कहते हैं कि ये हिन्दुओं के खिलाफ अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने वाली पार्टियों का षड़यंत्र है, पर यह जानना रोचक हो सकता है कि उपरोक्त आरोप उक्त विधायकजी पर उनकी पार्टी के ही शासन काल में लगे थे, और वह भी पुलिस को मजबूरी में लगाने पड़े होंगे। इस इतिहास को देखते हुए तो लगता है कि न जाने कितने अपराध तो पुलिस ने दाब धौंस दिखा कर दबा दिये होंगे। सच तो यह है कि रूपम पाठक को इस बात का भी भरोसा नहीं रहा होगा कि जो प्रकरण विधायक जी को स्वयं ही अपने शपथ पत्र में लिखने पड़े हैं, उन पर कोई कार्यवाही हो सकेगी। क्योंकि सरकारी संरक्षण में पल रहे अपराधियों को सजा तब मिलेगी जब अभियोजन अपना पक्ष मजबूती से लड़ेगा और गवाह आतंक और लालच से मुक्त रह सकें। गुजरात में 2002 में सरकारी संरक्षण में मारे दिये गये तीन हजार मुसलमानों के लिए किसी को भी सजा नहीं मिल सकी और बेस्ट बेकरी समेत सारे गवाहों को बदल जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा। मध्यप्रदेश में टीवी चैनल के सामने प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या होना और टीवी पर ही गवाही देने वाले कालेज के चपरासी को अपना बयान बदलना पड़ा। अपने फैसले में न्यायधीश ने साफ साफ कहा कि अभियोजन ने सही तरीके से अपना पक्ष ही नहीं रखा और गवाहों के बदल जाने के कारण मुझे आरोपियों को छोड़ना पड़ रहा है। चाहे दशहरा पर संघ के शस्त्रपूजन के दौरान एक स्वयं सेवक को गोली मारने का अपराध हो या मुख्यमंत्री के नाबालिग पुत्र द्वारा गोली चलाये जाने का मामला हो, पुलिस अधिकारियों का कहना होता है कि क्या करें गवाह ही नहीं मिलते। जहाँ तक भाजपा नेताओं के चरित्र का सवाल है तो किसी समय दिल्ली में मदनलाल खुराना ने धमकी दी थी कि वे एक महीने बाद भाजपा नेताओं के सच्चे किस्से बता देंगे, पर इस बीच उन्हें मना लिया गया। भाजपा का ही एक कुख्यात मुख्यमंत्री संघ से आये हुये एक संगठन सचिव की अश्लील सीडी बनवा कर उसे पत्रकारों तक पहुँचाता है, तो एक भाई सार्वजनिक रूप से धमकी देता है कि अगर मेंने मुँह खोल दिया तो मेरी बहिन को पंखे से लटक जाना पड़ेगा। मध्यप्रदेश के मंत्रियों के चरित्र और आचरण पर उनकी पार्टी के प्रदेश पभारी खुल कर टिप्पणी करते हैं, और एक मंत्री के कर्मचारी की पत्नी पुलिस में शिकायत करती है कि उसका पति उसे मंत्री के साथ सोने के लिए दबाव बनाता है। दिवंगत विधायक राज किशोर केसरी समेत सबके बारे में हाई कमान को पूरी जानकारी रहती है, पर सवाल है कि फिर उन्हें टिकिट क्यों दिया जाता है? चुनाव जीतने के बाद जब पार्टी दावा करती है कि उन्हें उनके जनहितेषी कार्यों के करण समर्थन मिला है, तो किसी खास को टिकिट देने की विवशता क्या पार्टी के अपने कामों के आधार पर मिलने वाले समर्थन को झूठा साबित नहीं करता, यदि ऐसा होता तो किसी भी सच्चरित्र को दिये गये टिकिट के बाद उसे पार्टी के कामों के आधार पर अपेक्षाकृत अधिक समर्थन मिलने की उम्मीद होनी चाहिए। पर सच्चाई सबको पता है।
ऐसे अपराधियों को प्रश्रय और राजनीतिक मंच देने का अपराध भाजपा समेत अनेक बड़ी पार्टियां कर रही हैं। बीमारू राज्यों अर्थात बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा में यह बीमारी अधिक तेज है और प्रतिरोध का आन्दोलन धीमा है। यही कारण है कि शोषित व्यक्ति का गुस्सा गैरकानूनी तरीकों में प्रकट होने लगता है। चम्बल में पैदा होने वाले बागी भी इसी अन्याय की पैदायश रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार विहीन न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना के प्रयास तेज हों, अन्यथा रूपम पाठक जैसी महिलाएं तेजी से अस्तित्व में आ सकती हैं। जो लोग इसमें राजनीतिक षड़यंत्र सूंघ रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि अनेक आधुनिक हथियारों से पटे इस दौर के राजनीतिक षड़यंत्र में चाकू जैसे हथियार का प्रयोग नहीं किया जाता। चाकू जैसा हथियार तो कमजोर और मजबूर का क्षणिक उत्तेजना में उठाया गया हथियार होता है।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

रविवार, जनवरी 16, 2011

न्याय व्यवस्था पर गम्भीर सवाल उठाती फिल्म्फिल्म्

नो वन किल्ड जेसिका

न्याय व्यवस्था पर गम्भीर सवाल उठाती फिल्म

वीरेन्द्र जैन

यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें नब्बे प्रतिशत यथार्थ है और दस प्रतिशत कहानी होते हुए भी न केवल एक सम्पूर्ण फीचर फिल्म है अपितु बहुत सारी दूसरी फिल्मों से बेहतर और महत्तर सवाल उठाती है। आम तौर पर जब भी किसी कला के माध्यम से व्यवस्था के सवाल उठाये जाते हैं तो वे केवल उस बौद्धिक जगत में चर्चा तक सीमित होकर रह जाते हैं जिसे उन तथ्यों की जानकारी पहले से ही होती है। किंतु रंग दे बसंती, पीपली लाइव, और नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में आम जन को भी महत्वपूर्ण सूचनाएं पहुँचाने के साथ उसकी सम्वेदनाओं को झकझोरती हैं। हम कह सकते हैं कि यह फिल्मी एक्टविस्म का प्रारम्भ है।

एक डांस बार में पद और पैसे के मद में अन्धा एक मंत्री का पुत्र तय समय के बाद शराब न देने पर देश की राजधानी में रेस्त्राँ की कर्मचारी एक लड़की को सरे आम गोली मार देता है, किंतु पैसे और दबाव के आगे सारे गवाह टूटते जाते हैं और भरपूर पैसे की मार के आगे एक नामी क्रिमिनल वकील आरोपी को मुक्त करा देता है। डर के मारे उस समय रेस्त्राँ में उपस्थित तीन सौ सम्भ्रांत लोग गवाही देने के नाम पर साफ झूठ बोल जाते हैं कि वे वहाँ से चले आये थे। रेस्त्राँ की मालकिन तक अपनी गवाही में मुकर जाती है। उसके बाद उसकी बहिन की जुझारू लगन और मीडिया के स्टिंग आपरेशन द्वारा एकत्रित सत्य के आधार पर जो जन दबाव बनाया जाता है तो सरकार को उच्च न्यायालय में अपील के लिए विवश होना पड़ता है और सत्ता, पैसा, और संगठन होते हुए भी मंत्री पुत्र को सजा होती है। छह-सात साल तक चले इस घटनाक्रम को देश की जनता ने बार बार भूलने और फिर याद करने की हालत में एक कमजोर प्रभाव की तरह ग्रहण किया हुआ था। इसके फिल्मीकरण के द्वारा जब दर्शक इसे तीन घंटे में देखता है तो उसके मानस पर यह गहरा प्रभाव जरूर पड़ता है कि भले ही व्यवस्था बहुत खराब हालत में है किंतु जन जागरूकता और सक्रियता से उसे ठीक रास्ते पर लाया जा सकता है।

फिल्म एक बहुत ही सशक्त माध्यम है जो बिना शोर किये भी कम से कम समय में बहुत सारी बातें एक साथ कह सकता है। इस फिल्म के माध्यम से कथा में गूंथ कर जो कहा गया है वह विचारणीय है। पहला सवाल मीडिया और उसकी भूमिका का है। स्मरणीय है कि लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए गान्धीजी ने हमेशा ही इस माध्यम का सहारा लिया था। सबसे पहला अखबार उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में निकाला था इसके बाद भी वे यंग इंडिया और हरिजन नामक अखबारों के सम्पादक रहे। दाण्डी मार्च की सफलता के पीछे बीबीसी के वे दो पत्रकार भी थे जिन्हें लगातार अपने साथ रख कर उन्होंने दुनिया भर तक अपनी बात पहुँचायी थी। अपनी कहानियों, उपन्यासों के माध्यम से हिन्दी उर्दू की दुनिया में धाक जमाने वाले सुप्रसिद्ध लेखक प्रेमचन्द ने भी जागरण अखबार का सम्पादन सम्हाला था तथा आज भी उनके लिखे सम्पादकीय इस क्षेत्र के लिए मानक हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर के सभी प्रमुख नेताओं ने किसी न किसी तरह से मीडिया से जुड़ाव रखा। यह फिल्म भी बताती है कि न्याय पाने हेतु जनदबाव बनाने के लिए भी मीडिया ही सहारा बनेगा, भले ही आज का मीडिया पूंजी केन्द्रित होने के कारण अपने आर्थिक लाभ हानि की दृष्टि से ही घटनाओं को उछालने और दबाने का काम कर रहा हो। यह फिल्म, मीडिया में स्टिंग आपरेशन के महत्व को भी बताती है, और उसकी अनिवार्यता को प्रकट करती है।

फिल्म नारी स्वातंत्र और उसकी यौनिकता के अधिकार की ओर भी इशारा करती है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला पत्रकार, आत्मविश्वास से अपने पिता से फोन पर कहती है कि वह अपनी चिंता खुद कर लेगी। वही अपने सहयोगी के साथ अपनी मर्जी से सेक्स सम्बन्ध भी बनाती है और अपनी प्रोफेशनल जरूरत पर सेक्स के बेहद निजी क्षणों को त्याग कर मिशन पर निकल जाती है। स्मरणीय है कि इसी देश में पिछले साल एक पिता ने अपनी पत्रकार पुत्री की इसलिए हत्या कर दी थी क्योंकि वह दूसरी जाति के लड़के के साथ सादी करना चाहती थी। अपने प्रोफेशन के लिए समर्पित वह पत्रकार अपनी थकी हुयी सहयोगी को रात के दो बजे भी काम पर निकलने के लिए कहती है और जब वह समय की बात करती है तो वह कहती है तुम कोई दफ्तर में काम करने वाली लड़की नहीं हो जो दस से पाँच तक काम करे। अपने चैनल प्रमुख से अपनी स्टोरी के लिए लड़ जाने वाली पत्रकार यह भी साबित करती है कि पत्रकारिता एक्टविस्म भी है, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है।

यह फिल्म गवाहों सबूतों वकीलों दलीलों के बोझ से दबी न्याय व्यवस्था देश की राजधानी में तीन सौ सुशिक्षित सम्पन्न और सम्भ्रांत लोगों के सामने हुयी ह्त्या के प्रकरण पर गवाही न मिलने की कटु सच्चाई को सामने लाकर एक ओर समाज की भयग्रस्तता को प्रकट करती है तो दूसरी ओर मृतक की सहयोगी द्वारा गवाही देने के दौरान वकील द्वारा पूछे गये उसके कपड़ों के रंग के बेहूदे सवालों के जबाब में खीझ कर अपने अंडर गार्मेंट्स तक के बारे में बता कर अपना गुस्सा प्रकट करती है। फिल्म याद दिलाती है कि न्याय मँहगे वकील, पैसों के लालच और हिंसा की धमकियों से डरे हुए गवाहों, पुलिस को घूस देकर बदल दिये गये सबूतों की दम पर टिका है व जिसने वैध या अवैध किसी भी तरह से पैसा कमा लिया हो तो वह न्याय को अपनी जेब में डाल कर चलता है। मीडिया और सोशल एक्टविस्म की सुविधा दूर दराज के इलाकों को कहाँ उपलब्ध है जो कभी कभी जेसिका जैसे प्रकरण में संयोग से मिल जाती है। इस संयोग को भी फिल्म में बताया गया है कि देश के एक हवाईजहाज के अपहरण हो जाने की घटना के कारण प्रारम्भ में जेसिका का प्रकरण उपेक्षित हो जाता है और मीडिया द्वारा तभी उठाया जाता है जब उसके पास कोई बड़ी स्टोरी नहीं होती।

पैसे वालों के चरित्र का चित्रण करते हुए न केवल उनके द्वारा गवाही देने से बचने के लिए सफेद झूठ बोलने को ही दर्शाया गया है अपितु रेस्त्राँ की मालकिन द्वारा चाकलेट खाते हुए मगरमच्छी आँसू बहाने का दृष्य़ भी बहुत कुछ कह जाता है। फिल्म में एक कंट्रास्ट बहुत जोरदार है। जहाँ एक ओर मृतका की माँ हत्यारों को सजा न मिलने के सदमे से अस्पताल में दम तोड़ रही होती है वहीं हत्यारे अपने छूटने की खुशी में वैष्णोदेवी की यात्रा कर रहे होते हैं और जयकारा लगा रहे होते हैं। फिल्म बताती है कि न्याय पाने में अंततः जन दबाव ही काम आता है और मृतका के परिवार द्वारा चर्च में की गयी प्रार्थनाएं और हत्यारों के परिवार द्वारा की गयी तीर्थ यात्राएं कोई काम नहीं आतीं। एक ओर पुलिस की भूमिका में पुलिस इंस्पेक्टर को न्याय के पक्ष में सम्वेदनशील बताया गया है जो मारपीट करके न पूछने के एवज में मंत्री से भी पैसे ले लेता है तो दूसरी ओर उच्च न्यायालय के सामने पेश करने के लिए सबूत भी खुद ही देता है। इसी पुलिस का दूसरा पक्ष बड़े अधिकारियों द्वारा दबाव में सबूतों को बदलवाने के काम का प्रकटीकरण भी है।

फिल्म यह सन्देश देने में सफल है कि इस मरणासन्न व्यवस्था को सामाजिक सक्रियता से सुधारा भी जा सकता है।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629

सोमवार, जनवरी 10, 2011

राजनीतिक दलों में लेवी प्रणाली का महत्व


राजनीतिक दलों में लेवी प्रणाली का महत्व
वीरेन्द्र जैन
कोई भी व्यवस्था अपना स्वरूप अकेले नहीं गढ सकती। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, की तरह व्यवस्था का शरीर भी विधायिका, पुलिस, प्रशासन, न्याय, और फौज से मिल कर ही बनता है। यदि किसी एक क्षेत्र में विकृति आती है तो दूसरा क्षेत्र उस पर लगाम कस कर उसे बहकने से रोक सकता है। किंतु जब विकृति को सारे क्षेत्रों से मदद मिलने लगती है तो पूरा तंत्र प्रभावित हो जाता है। आज भ्रष्टाचार की भी यही दशा है। राजनेताओं के भ्रष्टाचार उनके जिन्दा रहने की मूल आवश्यकताओं के लिए किये गये पथ विचलन नहीं हैं, अपितु इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की हवस में अधिक से अधिक समय तक सत्ता प्रतिष्ठानों की कुर्सी पाने, उसे बनाये रखने, और उसके लिए आर्थिक संसाधनों को जोड़ने की होड़ का हिस्सा होते हैं। यही होड़ प्रकारांतर आदत में बदल जाती है। भ्रष्टाचार की व्यापकता को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि किसी सुधारात्मक उपाय से कोई बात बनने जा रही है फिर भी लोकतंत्र के प्रति आस्थावानों द्वारा सुधारात्मक उपाय किये ही जाने चाहिए। लोकतंत्र में सत्ता पाने के लिए जनता से उनका वोट रूपी समर्थन प्राप्त करना होता है जिसके लिए राजनीतिक दल न केवल उन्हें भावनात्मक रूप से भटकाते हैं अपितु उन्हें कुछ राशियां भी भेंट करने लगे हैं। ये राशियां उन्हें पूंजीपतियों से प्राप्त होती है, इसके बदले में पूंजीपति उनसे ऐसी नीतियां बनाने की अपेक्षा करते हैं जिससे उन्हें दिये गये धन से कई गुना लाभ हो। रोचक यह है कि ये पूंजीपति यह राशि किसी एक दल को नहीं देते हैं अपितु इसे स्वीकार करने वाले तमाम सत्तामुखी सम्भावित दलों को देते हैं। हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना यह है कि हमारे देश के कुछ प्रमुख बड़े दल अपने सदस्यों के सहयोग से न चलकर पूंजीपतियों के चन्दों से चलते हैं और अपने हिसाब किताब को गोपनीय रखना अपना विशेषाधिकार मानते हैं। जो दल पूंजीपतियों के चन्दे से चलेंगे उनसे यह अपेक्षा व्यर्थ है कि वे उनके विरोध और जनता के पक्ष में नीतियां बना सकेंगे। अतः पहली जरूरत यह है कि राजनीतिक दलों की अर्थ व्यवस्था पारदर्शी हो।
यदि राजनीति को भ्रष्टाचार की गंगोत्री मान कर चला जाये तो सबसे पहला सुधार भी यहीं से करना पड़ेगा। प्रत्येक दल की अर्थ व्यवस्था को उसके सदस्यों के सहयोग तक सीमित करना होगा। इसके लिए आवश्यक होगा कि दलों में उसके सदस्यों से आय के अनुपात में लेवी लेने की व्यवस्था हो और उसे कानूनी रूप दिया जाये। हमारे देश के ही एक बामपंथी दल में ऐसी व्यवस्था है जहां आय के अनुसार सदस्यों से लेवी ली जाती है जो इस प्रकार है-
रु.300/- प्रति माह आय वाले सदस्य को 0.25 रु. प्रति माह्
रु 301/- से 500/- प्रति माह आय वाले सदस्य को रु.0.50 प्रति माह
रु.501/- से 1000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को रु.1.00 प्रति माह
रु1001/- से 3000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 1%
रु3001/- से 5000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 2%
रु5001/- से 7000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 3%
रु7001/- से 8000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 4%
और रु8000/- से ऊपर प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 5%
इस व्यवस्था के अनेक लाभ हैं, जिनमें सबसे पहला तो यह कि दल में सदस्यता का उचित रिकार्ड रहता है और बोगस सदस्यता की सम्भावना क्षीण रहती है। इसके द्वारा सदस्यों की आय का भी रिकार्ड पार्टी के पास रहता है जिससे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के संकेत तुरंत मिल सकते हैं। यह जानना रोचक हो सकता है कि आन्ध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाय एस रेड्डी के पुत्र और इस समय कांग्रेस के विद्रोही सांसद जगन मोहन रेड्डी ने इस वर्ष के लिए रु.84 करोड़ आयकर जमा किया है जिसके अनुसार इस वर्ष उनकी आय रु.500 करोड़ से अधिक होना संभावित है यदि कांग्रेस में सदस्यों की आय के अनुसार लेवी प्रणाली होती तो जगन मोहन को रु.25 करोड़ की लेवी जमा करना पड़ती। यदि लेवी सदस्यता की आवश्यक शर्त होती है तो पार्टी के लिए अधिक राशि देने वाला भी आय के अनुसार कम राशि देने वाले के समान ही होगा और अधिक आर्थिक सहयोग के नाम पर कोई अमर सिंह किसी कम आय वाले लोहियावादी सदस्य से श्रेष्ठ नहीं हो सकता व हेमामालिनिओं, जया बच्चनों और जयाप्रदाओं को राजनीति में प्रवेश से पहले गहन चिंतन करना होगा । दलीय लोकतंत्र के साथ लेवी प्रणाली होने से दल पर पूंजी वाले लोग वर्चस्व नहीं बना सकते जैसा कि अभी लोकसभा में 300 से अधिक करोड़पतियों के पहुँचने से पता चलता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सभी दलों में पैसे वालों को टिकिट मिलने में प्राथमिकता मिल जाती है, और सब जीतने के लिए धन झोंकने में समर्थ उम्मीदवारों पर दाँव लगाना चाहते हैं। स्मरणीय है कि गत लोकसभा चुनाव में स्वघोषित करोड़पति प्रत्याशियों की संख्या 1054 से अधिक थी। लेवी प्रणाली होने से पूंजीपति को सभी दलों को चन्दा देने की जगह किसी एक दल की सदस्यता ग्रहण करनी होगी और किसी एक दल को ही अपनी आय के अनुसार लेवी देनी होगी। ऐसी स्तिथि में देश की राजनीति और सदन पूंजीपतियों के दुष्प्रभाव और दबाव से कुछ हद तक मुक्त रह सकेंगे।
जब राजनीति भ्रष्टाचार से मुक्त होगी तो वह प्रशासन के भ्रष्टाचार की अनदेखी भी नहीं कर सकेगी, और ना ही उसे न्यायपलिका को भ्रष्ट करने का विचार आयेगा। आज हमारी व्यव्स्था को जो क्रोनी केपटलिस्म, और बनाना स्टेट का नाम दिया जा रहा है, लेवी प्रणाली लागू होने पर ऐसे निन्दक आरोपों से भी मुक्ति मिल सकेगी। जब सभी प्रमुख दलों पर पूंजीपति अधिकार करते जा रहे हैं तो राजनीति को उनकी दया दृष्टि और उनके अहसान से बचाने का यही तरीका हो सकता है कि लेवी प्रणाली को रजिस्टर्ड दलों में सदस्यता की आवश्यक शर्त बनायी जाये और चन्दे की दम पर उन्हें बँधुआ बनाने के दबाव से मुक्ति दिलायी जाये। एक आत्मनिर्भर पार्टी ही सच्ची वैचारिक राजनीति कर सकती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

मंगलवार, दिसंबर 28, 2010

बिहार में विधायक निधि की समाप्ति- फैसला जेडी[यू[ का या एनडीए का

बिहार में विधायक निधि की समाप्ति
ये फैसला जेडी[यू] का है या एनडीए का?
वीरेन्द्र जैन
बिहार में नितीश कुमार ने सत्ता में वापिस लौटते ही चुनावों के दौरान किये गये वादे के अनुसार विधायक निधि समाप्त करने का फैसला ले लिया। इस क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए इस फैसले की व्यापक सराहना हुयी है। यह विषय उस समय भी चर्चा में आया था जब तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी सांसद निधि समाप्त करने पर विचार करने के लिए कहा था। स्मरणीय यह भी है कि जब वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में गठित द्वित्तीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सरकार से यह सिफारिश की थी कि वह सांसद विधायक निधि को समाप्त कर दे, तब इस सिफारिश का समर्थन करते हुए भाकपा के महासचिव ए.बी. बर्धन ने कहा था कि बामपंथी दल तो शुरू से ही इस योजना के विरोधी रहे हैं। इस तरह देखा जाये तो इस निधि के दुरुपयोग को देखते हुए देश के अधिकांश दल सैद्धांतिक रूप से इस निधि के खिलाफ मुखर रहे हैं किंतु इसकी समाप्ति के साहस करने का श्रेय नितीश कुमार को जाता है।
बिहार में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद जहाँ सारे समाचार पत्र और टिप्पणीकार इसे नितीश की जीत बता रहे थे वहीं भाजपा इसे एनडीए की जीत बता रही थी और वह मानती है कि बिहार में नितीश के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी है। यदि इसे सच माना जाये तो बिहार में विधायक निधि समाप्त करने का फैसला एनडीए का हुआ न कि जेडी[यू] का। एनडीए में सबसे बड़ा दल भाजपा है जिसे राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। इस तर्क से गुजरात, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखण्ड और पंजाब में भी एनडीए की सरकारें हैं। जब एक राज्य में विधायक निधि समाप्ति करने के बाद सभी ओर से साधुवाद मिलता है तो इस नीति को दूसरे एनडीए शासित राज्यों तक भी फैलाया जाना चाहिए। पर क्या कारण है कि उपरोक्त राज्यों को तो छोड़ ही दीजिए बिहार में भी इस नीति को लागू करवाने का श्रेय भाजपा को नहीं मिल रहा है। क्या भाजपा बिहार में सचमुच इस नीति को लागू करवाने के पक्ष में रही या यह नितीश कुमार का एक पक्षीय फैसला था? यदि यह एनडीए का फैसला है और भाजपा अपने को एनडीए में सम्मलित दलों का नेता मान कर चलती है तो उसे अपने द्वारा शासित राज्यों में भी इसे तुरंत ही लागू करवाना चाहिए अन्यथा यह केवल नितीश कुमार का ही फैसला माना जायेगा। पिछले दिनों जब सांसद निधि बेचने वाले सांसदों को स्टिंग आपरेशन में पकड़ा गया था तब उसमें छह में से तीन फग्गन सिंह कुलस्ते, चन्द्रप्रताप सिंह, और राम स्वरूप कोली तो भाजपा के थे। फग्गन सिंह कुलस्ते तो उस दौरान भाजपा के सचेतक और अनुसुचित जाति मोर्चे के अध्यक्ष भी थे। यदि यह तर्क दिया जाये कि उनके इस काम में पार्टी की जिम्मेवारी नहीं बनती है तो वह इसलिए गलत होगा क्योंकि उसके बाद भाजपा ने उन्हें फिर से टिकिट देकर यह सन्देश दिया कि उनका काम पार्टी की निगाह में गलत नहीं है। श्री फग्गन सिंह कुलस्ते तो परमाणु विधेयक पर बहस के दौरान फिर से चर्चा में आये थे जब उन्हें भाजपा के अन्य दो सांसद अशोक अर्गल, और महावीर भगौरा के साथ सदन में एक करोड़ रुपयों को लहराते देखा गया। यह जिज्ञासा सहज ही हो सकती है कि अगर यह रकम सचमुच ही यूपीए के किसी घटक ने दी थी तो उसने इसके लिए श्री फग्गन सिंह कुलस्ते का चुनाव ही क्यों किया। उल्लेखनीय यह भी है जिस दृष्य को देश के चालीस लाख लोग देख रहे थे उस घटना के बारे में कोई भी जाँच अभी तक नहीं हो पायी है कि वो एक करोड़ रुपये सचमुच किसने दिये थे और वे कहाँ से आये थे। आज भ्रष्टाचार के बारे में बहुत बातें हो रही हैं किंतु यह कोई पता नहीं लगाना चाहता कि पूरे एक करोड़ की रकम को खर्च करने के पीछे किसका क्या हित हो सकता था और चारे की तरह डाल दी गयी इस रकम को खर्च करने वाले ने उसके पीछे अपना कितना हित साधा होगा। यह मामला तो देश की सुरक्षा और दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दों से भी जुड़ा हुआ था। इसी तरह पैसे लेकर सवाल पूछने के लिए किये गये स्टिंग आपरेशन में भाजपा सांसद प्रदीप गान्धी को भाजपा ने छतीसगढ में चुनावों का प्रभारी बनाया था। जब स्वयं उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष रंगे हाथों देश की रक्षा के लिए उपकरण सप्लाई के नाम पर किये गये स्टिंग में पकड़े गये थे तो उनकी गैर राजनीतिक पत्नी को राजस्थान के सुरक्षित क्षेत्र से सांसद चुनवा कर उनके पद त्याग की भरपाई की थी। जब भाजपा ने स्पेक्ट्रम घोटाले में जेपीसी जाँच की माँग पर पूरा सत्र नहीं चलने दिया तो यह जरूरी हो जाता है कि वह भ्रष्टाचार के बारे में अपने पत्ते साफ साफ खोले अन्यथा यह भ्रष्टाचार का खुलासा नहीं, अपितु प्रतियोगिता का हिस्सा हो कर रह जायेगा।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

सोमवार, दिसंबर 20, 2010

उमा भारती का प्रदेश निकाला


उमाभारती का प्रदेश निकाला वीरेन्द्र जैन
राष्ट्रभक्ति का त्रिपुण्ड लगाये फिरने वाला संघ परिवार देश की गम्भीर से गम्भीर परिस्तिथि में भी सत्ता की राजनीति के सस्ते हथकण्डे अपनाने से बाज नहीं आता। कश्मीर में विदेशी घुसपैठियों और अलगाववादी तत्वों ने अपने मिशन को पाने के लिए वहाँ जो साम्प्रदायिक तनाव पैदा किया था उसके दुष्परिणाम स्वरूप कुछ हजार कश्मीरी पण्डितों को घाटी छोड़कर प्रदेश के दक्षिणी हिस्से जम्मू और कुछ को दिल्ली में शरण लेनी पड़ी थी। इस दुखद स्तिथि को संघ परिवार एक हथकण्डे की तरह से लगातार भुनाने में लगा है और इस सम्वेदनशील राज्य में अलगाववादियों के मंसूबों को पूरा करने में मददगार हो रहा है। इन विस्थापित नागरिकों को गत दो दशक से सरकार की ओर से प्रतिमाह आर्थिक मदद दी जाती है जो चार हजार रुपये प्रतिमाह, नौ किलो गेंहूँ, दो किलो चावल, और एक किलो चीनी तक सीमित है। धरती की जन्नत छोड़कर आने वालों को दस गुणा बारह का टीन की छत वाला एक आश्रय उपलब्ध कराया गया है। भले ही देश के नागरिकों की औसत आमदनी से यह सहायता दुगुनी होती है, किंतु अपने वतन से विस्थापित हुओं के लिए इस राशि को कितना भी बड़ा दिया जाये पर उनके जबरन विस्थापन के दर्द का मुआवजा नहीं बन सकता। केन्द्र में किसी भी दल की सरकार रही हो वह यह चाहती रही है कि शरणार्थियों की तरह रह रहे इन विस्थापितों को अपने स्थान पर वापिस लौटने का मौका मिले। यह स्थिति केन्द्र में भाजपा के शासन काल में भी नहीं बदल सकी थी। अंतर केवल इतना है कि जब केन्द्र में भाजपा सरकार नहीं होती तब वे इस दुखद स्थिति पर गैरजिम्मेवाराना राजनीति करते हुए इसे साम्प्रदायिक भेदभाव फैलाने का आधार बना लेते हैं इससे स्थिति और कठिन हो जाती है और सुधार की सम्भावनाओं को ठेस लगती है।
इसी संघ परिवार की राजनीतिक शाखा भाजपा, अपनी एक वरिष्ठ नेता उमा भारती को उनके अपने प्रदेश से निकाला दे रही है, जबकि उमा भारती को उसी तरह मध्य प्रदेश पसन्द है जिस तरह तस्लीमा नसरीन को बंगाल की धरती पसन्द है। सुश्री उमाभारती बचपन से ही जनता के प्रिय काव्य रामचरित मानस को कंठस्थ करने के लिए लोकप्रिय हो गयी थीं। भाजपा ने जब सत्ता पाने के लिए अयोध्या में रामजन्म भूमि मंदिर के बहाने राजनीतिक अभियान छेड़ा था तो सभी तरह की उपलब्ध लोकप्रियता को वोटों में भुनाने की जुगत भिड़ाई थी। सुश्री भारती की लोकप्रियता का राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्हें उनके धार्मिक कार्य से विमुख करके पार्टी में सम्मलित कर लिया गया था और लोकसभा का टिकिट दे दिया गया था। स्मरणीय है कि सुश्री भारती भाजपा के पास टिकिट माँगने नहीं गयी थीं अपितु भाजपा की नेता विजया राजे ने आगे आकर उन्हें उसी तरह टिकिट दिया था, जिस तरह बाद में हेमा मलिनी, स्मृति ईरानी, दीपिका चिखलिया, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, दारा सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान, धर्मेन्द्र, अरविंद त्रिवेदी,आदि आदि को दिया गया था। कहा जाता है कि औपचारिक शिक्षा कम लेने के कारण उनके जन्म वर्ष का उचित रिकार्ड उपलब्ध नहीं था और उनकी उम्र उस समय लोकसभा सदस्य हेतु उम्मीदवार के लिए तय उम्र की सीमा से कम थी, पर इस पर कोई ध्यान ही नहीं गया। उन्हें उनकी लोकप्रियता, प्रवचन कला में प्रवीणता, वाक पटुता और भगवा वस्त्रों के प्रभाव के कारण बाबरी मस्जिद ध्वंस अभियान में आगे आगे रखा गया था, जिसमें वे अभी भी अभियुक्तों की सूची में हैं। उन्होंने अपनी लोकप्रियता के कारण चुनाव में लगातार विजयश्री प्राप्त की और कभी लोकसभा में दो की संख्या तक सिमिट गयी भाजपा की सीटों की बढोत्तरी में अपना अतुल्य योगदान दिया व दूसरी कई सीटों के लिए भी प्रचार कार्य किया। जब केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी तो भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को उन्हें मंत्री बनाना पड़ा। किंतु केन्द्र में मंत्री बनने के लिए तो वे लोग सबसे आगे लगे थे जो चुनाव जितवाने में सबसे पीछे रहते हैं, इसलिए उमाभारती को मंत्री पद से मुक्त करके मध्य प्रदेश में भेज दिया गया क्योंकि उस समय प्रदेश में विधानसभा चुनाव में जीत दिला सकने की जिम्मेवारी लेने वाला कोई नहीं था। वे केन्द्र का मंत्री पद छोड़ना नहीं चाहती थीं उन्होंने पहले तो इंकार किया तथा उसके बाद अपनी अस्वीकार्य योग्य शर्तें रख दीं। परिस्तिथि का तकाजा था कि वे शर्तें भी भाजपा नेतृत्व द्वारा स्वीकार कर ली गयीं, जिनमें टिकिट बाँटने का अधिकार और जीतने की स्तिथि में मुख्यमंत्री पद की पुष्टि की शर्त भी सम्मलित थी। संयोग से चुनाव जीत लिया गया था और वचन बद्धता में अनचाहे उमाजी को मुख्यमंत्री का पद देना पड़ा था। किंतु लोकप्रियता को केवल सत्ता हथियाने के लिए उपयोग करने वाले भाजपा नेतृत्व को यह हजम नहीं हो सका व उन्हें स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया गया। सलाहकारों के नाम पर चार व्यक्तियों का घेरा डाल दिया गया और बाद में तो एक बहाने से उनका स्तीफा ले ही लिया गया और वह कारण समाप्त हो जाने के बाद भी नहीं लौटाया गया। उन्होंने लाख कहा कि यह सरकार उनके बच्चे की तरह है जिसे जबरन छीन लिय गया है, उन्होंने अपने समर्थन में विधायकों के बहुमत होने का परीक्षण कराने को कहा किंतु किसी बात पर ध्यान नहीं दिया गया। सत्ता की ताकत और लालच से उनके जनान्दोलनों को गति नहीं पकड़ने दी गयी। चुनावों में उन्हें हरवाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया गया, यहाँ तक कि उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री पर उनकी हत्या करवाने के प्रयास का आरोप भी लगाया था। उनकी वापिसी के विचार पर भाजपा हमेशा दो फाड़ रही और एक पक्ष ने उनका आँख मूंद कर विरोध किया जिस कारण उनके लिए भाजपा का दरवाजा सुई के छेद से भी छोटा होता गया। पर जो दल कुछ कूटनीतियों के आधार पर विकसित होते हैं उनको अपनी योजनाओं के भागीदारों को दूर कर पाना सम्भव नहीं होता। जो दबाव अमर सिंह का मुलायम सिंह पर बना हुआ है लगभग वैसा ही दबाव उमाभारती का बाबरी मस्जिद ध्वंस के सहअभियुक्तों पर बना हुआ है। इसलिए उनको वापिस लेने पर अडवाणीजी तैयार हो गये हैं, किंतु वे उन्हें मध्यप्रदेश में कदम नहीं रखने देना चाहते। इस शर्त को उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाने के नाम पर छुपाया जा रहा है। एक सन्यासी की कोई जाति नहीं होती इस कारण से उमाभारती की लोधी या पिछड़ीजाति के नेता के रूप में कोई पहचान नहीं है, जब भी वे कल्याण सिंह के सामने खड़ी होंगीं तो यूपी में उन्हें पीछे ही रखा जायेगा। यूपी में पहले से ही पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, कार्यरत हैं तो कलराज मिश्र, लालजी टंडन समेत, महंत अवैद्यनाथ समेत दर्जन भर बड़े स्थानीय नेता पूर्व से ही हैं, जो भाजपा को चौथे नम्बर पर बमुश्किल बनाये हुये हैं, ऐसे में उमाभारती से कुछ आशा करके जिम्मेवारी सौंपी जा रही है यह मानना हास्यास्पद ही होगा। दर असल उन्हें अपने प्रदेश, मध्यप्रदेश से निकाला दिया जा रहा है क्योंकि उन्होंने प्रदेश भाजपा में जो गुट विकसित कर दिया है वह शिवराज सरकार के लिए खतरा बनता जा रहा है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी, बाबूलाल गौर, उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय,वरिष्ठ सांसद सुमित्रा महाजन जैसे कद के नेता उनकी वापिसी का समर्थन कर चुके हैं। दूसरी ओर शिवराज सिंह, और प्रभात झा जैसे लोग उन्हें पास भी फटकने नहीं देना चाहते। कहा जाता है कि शिवराज सिंह ने तो उन्हें प्रवेश देने की स्तिथि में स्तीफा देने की धमकी दे दी थी। यही कारण है कि उमाभारती को भाजपा में पुनर्प्रवेश देने के लिए प्रदेश से निकाला जा रहा है और उनके समर्थक यह कह रहे हैं कि एक बार प्रवेश हो जाने के बाद प्रदेश में नेता तो वही रहेंगीं, आवाज उनकी ही रहेगी भले ही वह कहीं से लगायी जाये। प्रदेश के मुख्यमंत्री आतंकित होकर अडवाणीजी के सामने दया की गुहार कर रहे हैं, और अडवाणीजी कह रहे हैं कि वे [उमाजी] राष्ट्रीय नेता नहीं हैं उनका “उपयोग” तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों तक ही किया जायेगा, जहाँ उनका कोई महत्व नहीं है। यदि भाजपा नेता के रूप में उनका मध्यप्रदेश में प्रवेश रोका गया तो यह स्तिथि कश्मीरी पंडितों की स्तिथि से भिन्न नहीं होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

गुरुवार, दिसंबर 16, 2010

पारदर्शी समय ---आर पार दिखता है


पारदर्शी समय
वीरेन्द्र जैन


हमारे समय को सूचना क्रान्ति के युग की तरह पहचाना जा रहा है। यह नई तकनीक के कारण ही सम्भव हो सका है। भूमण्डलीकरण का विचार इसी कारण विस्तार पा सका है क्योंकि अब पुरानी तरह की सीमाबन्दी और गोपनीयता सम्भव नहीं रह गयी है। अमेरिका के सैटेलाइट आज एशिया के देशों के बाजारों के साइनबोर्ड तक पढ सकते हैं।
आज अपने देश में ही सैकड़ों चैनलों और हजारों अखबारों के लाखों सम्वाददाता व कैमरामैन चौबीसों घन्टे किसी सामान्य असामान्य गतिविधि को कैमरे में कैद करने और उसे समाचार बना दुनिया भर में प्रसारित करने के लिए सक्रिय हैं। मोबाइलों में ही नहीं पैनों में भी कैमरे लगे हुये हैं और मोबाइल फोनों की संख्या पैंसठ करोड़ का आंकड़ा पार गयी है। इससे राजनीति का स्वरूप भी बदल रहा है। गत वर्षों में इन समाचार चैनलों के सम्वाददाताओं ने देश की एक सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष को रक्षा सौदों के लिए सिफारिश करने हेतु नोटों की गिड्डियां दराज में डालते व डालरों में मांगते दिखा कर अपना पद छोड़ने के लिए व तत्कालीन रक्षामंत्री को त्यागपत्र देने के लिए को विवश कर दिया था। इन्हीं संवाददाताओं ने संसद सदस्यों को सवाल पूछने और सांसद निधि से धन आवंटन के लिए रिश्वत लेते दिखा कर पद छोड़ने को मजबूर कर स्वयं को लोकतंत्र में सचमुच चौथा पाया होने के प्रमाण दिये थे। एक सांसद कबूतरबाजी के लिये रंगे हाथ दबोचे गये थे। स्टिंग आपरेशनों में सैकड़ों भ्रष्टाचारी जनता के सामने लाये जा चुके हैं और अनेकों के पकड़े जाने की सम्भावनाएं पैदा की जा चुकी हैं। पुलिस के अधिकारियों को हत्या की सुपारी लेते और उसे कानूनी रूप देने की तरकीब स्पष्ट करते हुये कैमरों में दिखाया गया है। जेल के कैदियों को अवैध सुविधाएं पहुंचाने वाले डाक्टर भी कैमरों की कैद में आकर निलंबित हो चुके हैं। सेना में व्याप्त भ्रष्ट्राचार को भी न्यूज चैनल दिखा ही चंके हैं। एक स्वयं सेवक के अंतरंग संबन्ध तो देश भर ने सीडी द्वारा देखे ही थे धर्म परिवर्तन के बहाने राजनीति करने वाले एक मंत्री तो जाम उठा कर पैसे को खुदा बताते और रिश्वत की गिड्डियां लेते देश भर में मीडिया के द्वारा देखे गये थे। देश के एक प्रभावशाली नेता की सीडी और टेलीफोन पर सौ घन्टों से अधिक की बातचीत के टेप भी चर्चित रहे हैं। उन टेपों को ट्रम्प कार्ड की तरह स्तेमाल करने के उद्देश्यवश उसी दल में विरोधी गुट के नेता लिये घूमते रहे। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री की पत्नी को नोट गिनने की मशीन बेचने वाले ने ही मशीन खरीदते समय वीडियो रिकार्डिंग करा के उनके प्रदेश के एक मंत्री को बेच दी थी, जो मुख्यमंत्री को ब्लेकमेल करता रहा।
आयकर विभाग वालों ने गत वर्ष में पिछले वर्ष से डेढ गुना अधिक राजस्व वसूली की है जिसमें सेवा कर की भी बड़ी राशि सम्मिलित है। आज सरकारों में बैठे लोग भले ही अपने स्वार्थों के कारण काला धन निकलवाने में विलंब कर रहे हों पर सच तो यह है कि आज के समय में सरकार चाहे तो काले सफेद सभी तरह के धन के प्रवाह को देख सकती है और उचित नियंत्रण कर सकती है। चाहे तो स्विस बैंकों में जमा धन के बारे में पता कर सकती है।
अब चुनाव आयोग पहले जैसा औपचारिक ढंग से काम निबटाने वाला संस्थान नहीं है अपितु वह मन और वचन दोनों से ही नियमों की घोषित भावनाओं के पालन हेतु भरसक प्रयत्न रत है। न्याय भी अब आगे बढ कर प्रकरणों को दुबारा खुलवा कर सुनवाई करवा रहा है और सरकारों पर सख्त टिप्पणियां कर रहा है। सरकारों को मजबूर होकर जनता को सूचना का अधिकार देना पड़ा है, जो अभी भले ही वांछित गति नहीं पकड़ पाया हो पर इरादा होने पर इस दौर में उसे देर नहीं लगेगी। इससे नौकरशाही में एक दहशत सी है, भले ही भ्रष्टाचार के नितप्रति उद्घाटनों से वह बड़ा हुआ महसूस हो रहा हो।
यह पारदर्शी समय है। जिन मोबाइल फोनों ने अपराधियों को अनेक सुविधायें दी हैं उन्हीं में दर्ज रिकार्ड के कारण अपराधियों और उनके सम्पर्कों तथा सन्देहास्पदों की पिछली गतिविधियों का पता चल जाता है। मंत्रालयों, बैंकों, एटीएमों, पेट्रोलपम्पों, प्रमुख मार्गों और रेलवे स्टेशनों पर कैमरे लगे हैं। अब इंटरनेट से सारी दुनिया के नक्शे ही नहीं सड़कें और बाजार भी देखे जा सकते हैं। दुनिया के अरबों लोगों के प्रोफाइल इंटरनेट पर उपलब्ध हैं जिसकी विभिन्न साइटों पर लोग प्रतिदिन अपने मनोभाव उगलते रहते हैं। यह खुलने का समय है और जो खुद नहीं भी खुलना चाहते उन्हें समय खोल रहा है। कार्यालयों में आने जाने और हाजिरी व छुट्टियों के हिसाब का काम कम्प्यूटर से होने लगा है। मोबाइल पर फील्ड के अधिकारियों की लोकेशन समझी जा सकती है। कम्प्यूटर और नेट इस बात का स्थायी रिकार्ड रखते हैं कि आपने कब कब कितने बजे कितने समय तक कौन सी साइट देखी या किस फाइल पर काम किया। आज दुनिया वालों के दिलों और दिमागों को भी पढे और समझे जाने की ओर तेजी से प्रगति हो रही है। विकीलीक्स ने जिन रहस्यों से पर्दा उठाया है उससे अमरीका समेत दुनिया भर के नेता और सरकारें हिल गयी हैं।
यह आश्चर्यजनक है कि इस पारदर्शी समय में भी हमारे देश के राजनीतिक नेता सरेआम नंगा झूठ बोलने से गुरेज नहीं करते। ढीठतापूर्वक झूठ बोलते हैं और उस झूठ को एक कुलीन भाषा में पिरोने के लिए जाने माने वकीलों को प्रवक्ता बनाते हैं। लाखों लोगों द्वारा देखे गये अपराध को भी भाषायी कौशल से छुपाने की कोशिश करते हैं। ये लोग धर्म ग्रन्थों की शपथ लेकर जैसा सच बोलते हैं वह ''अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो'' जैसा सच होता है।
अब हम जितनी जल्दी यह स्वीकार लें उतना ही अच्छा होगा कि यह समय नंगे यथार्थ का समय है तथा भविष्य में कुछ भी ढका मुँदा नहीं रह जाने वाला है। कोई नहीं जानता कि कौन सा कैमरा किसे शूट कर रहा है, कौन सा टेप किसकी आवाज रिकार्ड कर रहा है, किसके खातों की नकल किसके पास है और तो और अब नारको टैस्ट से भी सच उगलवाया जा सकता है। महापुरुषों ने सदियों से जिस सत्य को बोलने के लिए उपदेश दिये हैं पर फिर भी मानव जाति जिस पर अमल नहीं कर रही थी आज तकनीक उस पर अमल कराने के की ओर बढ रही है।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629

बुधवार, दिसंबर 08, 2010

यह ब्लेकमेलरों की भाषा है language of blackmailers


यह ब्लैकमेलरों की भाषा है

वीरेन्द्र जैन
कभी अपने आप को मुलायम सिंह का हनुमान और कभी टेलर बताने वाले अमर सिंह ने अब कहना शुरू कर दिया है कि अगर उन्होंने मुँह खोल दिया तो सपा नेता जेल में होंगे।
इन दिनों कोई एमरजैंसी नहीं लगी हुयी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और संघ के पूर्व सर संघ चालक समेत कोई भी कुछ भी बोल रहा है, तब फिर समाजवादी पर्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह को मुँह खोलने से कौन रोक रहा है? जहाँ तक मुलायम सिंह से उनकी पुरानी मित्रता का सवाल है तो उसे तो वे वैसे भी कब की तिलांजलि दे चुके हैं। वे भूल चुके हैं कि ठाकुर अमर सिंह के राजनीतिक उत्थान और उसके सहारे हुये उनके आर्थिक उत्थान में यादव जाति के समर्थन से नेता बने मुलायम सिंह यादव का समुचित योग दान रहा था, और मुलायम सिंह को राजनीति में अर्थजगत के महत्व को उन्होंने ही पहलवान मुलायम सिंह को समझाया था। इस दौरान वे मुलायम सिंह यादव को दो जिस्म एक जान कहते थे। इस अहसान फरामोशी का प्रमाण तो उनके निम्नांकित बयानों से ही मिल जाता है जिनका ना तो उन्होंने कभी खण्डन किया और ना ही ये कहा कि ये प्रैस ने तोड़ मरोड़ कर छाप दिये हैं-
-मुम्बई। अमर सिंह ने कहा कि सपा का अर्थ मुलायम सिंह और उनका परिवार है और कुछ नहीं।[पीपुल्स समाचार] -इलाहाबाद। समाजवादी पार्टी के पूर्व महा सचिव अमर सिंह ने रविवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव पर अब तक का सबसे करारा हमला बोला है। अमर ने कहा है कि उनके जीने से ज्यादा जरूरी है मुलायम सिंह यादव का मरना। मुलायम सिंह ने मुसलमानों को हमेशा धोखा दिया है। [दैनिक भास्कर 10 अगस्त 2010]
-रायबरेली। सोनिया के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में दंगल प्रतियोगिता के उद्घाटन में शामिल होने आये समाजवादी पार्टी के निष्कासित नेता अमर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गान्धी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जम कर तारीफ की साथ ही सोनिया गान्धी को अच्छे व्यक्तित्व वाली दुनिया की सबसे बेहतर नेता भी बताया। [पीपुल्स समाचार 1 सितम्बर 2010]
लखनउ। अमर सिंह ने यहाँ आयोजित “ देश के मौजूदा हालात और मुसलमान” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि चौदह साल तक जिनकी जबान को कुरान की आयत और गीता का श्लोक समझा उन्हीं ने हमें रुसवा किया। मुलायम सिंह ने ही कल्याण सिंह को सपा में शामिल किया। व्यक्तिगत रूप से में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह से बेहतर व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे साफ बात करते हैं और अपने कार्यों को स्वीकार करते हैं। कभी हमारे बगलगीर रहे मुलायम वर्ष 2003 में जनादेश की वजह से नहीं बल्कि मेरी कलाकारी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह सके थे। राज बब्बर को समाजवादी पार्टी में लाने और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ विष्णु हरि डाल्मियाँ के बेटे संजय डाल्मियाँ को पार्टी का कोषाध्यक्ष और सांसद बनाने वाले मुलायम सिंह ही हैं। [जनसत्ता 19 अक्टूबर 2010] नई दिल्ली। मुलायम सिंह मेरे घर पर कब्जा किये हुये हैं और खाली नहीं कर रहे हैं। महारानी बाग का यह घर मैंने ही मुलायम सिंह को दिया था जिसका किरायानामा राम गोपाल के नाम से बना हुआ है जो मुलायम सिंह के निकट के रिश्तेदार हैं [डीबी स्टार नवम्बर 2010] कभी सोनिया गान्धी को प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए विदेशी मूल का मुद्दा उछालने वाले अमर सिंह आज कल प्रति दिन मुलायम सिंह को कोसते रहते हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब वे मुलायम सिंह और उनके रिश्तेदारों, भाई भतीजों के खिलाफ असंसदीय भाषा में कुछ न कुछ नहीं कहते हों। अपने ताज बयान में वे कहते हैं “आजम खान यह समझ लें कि अगर मैंने मुँह खोल दिया तो मुलायम सिंह यादव मुश्किल में पड़ जायेंगे, उनको जेल जाना पड़ सकता है, जो आजम खान मुझे दलाल कह रहे हैं, पहले वे जरा यह बताएं कि मैंने उन्हें क्या क्या दिया है। मुझे सप्लायर कहने वाले समाजवादी पार्टी के अन्य नेता भी आगे आकर बताएं कि मैंने उन्हें या मुलायम सिंह को क्या सप्लाई किया है,”।
इतना सब कुछ कह लेने के बाद वे अब और क्या छुपाना चाहते हैं। यह राजनीतिज्ञों की भाषा नहीं अपितु ब्लेकमेलरों की भाषा है। वे सार्वजनिक रूप से पूर्व मित्र हो चुके जिन मुलायम सिंह यादव के मरने तक की कामना करते हैं उन्हें जेल जाने से वे क्यों बचाना चाहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी कोई बात कहने पर वे खुद किसी अधिक बड़े अपराध में सम्मलित पाये जायें और उसी से बचने के लिए वे गोलमाल भाषा में धमकी दे रहे हैं। अमर सिंह जैसे जनाधार विहीन नेता हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़े अभिशाप की तरह हैं जो जनता को निरी मूर्ख और स्मृतिहीन मानते हैं। ऐसे लोग ही लोकतंत्र को जोड़तोड़ और जनसमर्थन को कारपोरेट घरानों के यहाँ गिरवी रखवाने का काम करते हैं। लायजिनिंग का जो काम नीरा राडिया राजनीति में आये बिना करती रहीं वही काम अमर सिंह जैसे लोग राज्यसभा की सदस्यता से मिल चुकी विशिष्ट स्तिथि का दुरुपयोग करते हुये करते रहे हैं। देश के रक्षामंत्री पद पर रह चुके किसी नेता ने यदि जेल जाने लायक अपराध किया है तो उसे छुपाना और उसकी ओट में अपने राजनीतिक हित साधना भी अपराध है, जो अमर सिंह जैसे लोग डंके की चोट पर करते रहते हैं।
अपनी सामाजिक जिम्मेवारी समझते हुए सुप्रीम कोर्ट जिस तरह से राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को कटघरे में खड़ा कर रहा है, तब देश की सुरक्षा से जुड़े रहे किसी व्यक्ति कथित अपराध को छुपाने का अपराध करने वाले उसकी दृष्टि से अलक्षित क्यों हैं? जरूरत तो इस बात की है कि देश के सारे जनप्रतिनिधियों और उसकी पेंशन लेने वाले भूतपूर्व जनप्रतिनिधियों से यह शपथ पत्र लिया जाये कि कानून विरोधी किसी भी गतिविधि का पता चलते ही वे शीघ्रातिशीघ्र कानून की निगाह में लायेंगे और दोषी को सजा दिलाये जाने में कानून की भरपूर मदद करेंगे। ऐसा न करने पर वे स्वयं भी अपराध छुपाने के अपराधी माने जायेंगे।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629