शुक्रवार, जनवरी 24, 2014

केजरीवाल की तेजी कहीं उम्मीद की भ्रूणहत्या न कर दे

केजरीवाल की तेजी कहीं उम्मीद की भ्रूणहत्या न कर दे
वीरेन्द्र जैन
       अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी आज एक व्यक्ति या पार्टी का नाम नहीं अपितु एक उस  उम्मीद का नाम है जो लम्बे समय से छले जाते नाउम्मीद लोगों ने एक बार फिर से बाँधी है। राजतंत्र से निकल कर आये देश ने लोकतंत्र का अर्थ अपने शासक के चयन का अधिकार समझा और पुराने राजा की जगह अपनी पसन्द का ‘राजा’ चुनने लगे, व समय समय पर उन्हें बदल कर देखने लगे, जबकि लोकतंत्र में जनता की भूमिका को बदलना चाहिए था, जो यथावत प्रजा बनी रही। समय समय पर निराशा की अवस्था में जनता ने कभी समाजवाद और गरीबी हटाओ वाली नई कांग्रेस से, सम्पूर्ण क्रांति का नारा देने वाले जय प्रकाश नारायण से, तो कभी स्वच्छ सरकार और रोजगार का अधिकार देने का वादा करने वाले वीपी सिंह से उम्मीदें बाँधी थीं पर यथास्थिति ने उनके प्रयासों को अपने में वैसे ही समाहित कर लिया जैसे कि कुछ हलचल के बाद कबीर नानक जैसे भक्त कवियों और आर्यसमाज व रामकृष्ण मिशन जैसे सामाजिक आन्दोलनों को पचा लिया गया था।
        बताया जाता है कि आम आदमी पार्टी के कनाट प्लेस स्थित कार्यालय में डेड़ सौ से अधिक आईटी प्रशिक्षित कर्मचारी मनोयोग से काम करते हुये सभी उपयोगी जानकारी एकत्रित करते हैं और नीतियां व कार्यक्रम बनाते हैं जिनमें मीडिया से लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यक सूचनाओं का भंडार रहता है। यही कारण है कि अरविन्द केजरीवाल को मात्र एक युवा उत्साही, हवाई आदर्शवादी, या नौसिखिया राजनीतिज्ञ भर नहीं समझा जा सकता। कोई उन्हें किताबी राजनीतिज्ञ कह कर भले ही अवमूल्यित करने की कोशिश करे किंतु आईआईटी से निकले इस व्यक्ति ने इनकम टैक्स कमिश्नर, आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में मैगसेसे पुरस्कार विजेता, अन्ना के आन्दोलन के सूत्रधार और फिर उचित अवसर देख कर एक राजनीतिक पार्टी के गठन, विधानसभा चुनाव में सफल भागीदारी और फिर दिल्ली में सरकार बनाने तक की सीढियां क्रमशः चढी हैं। अब यह साफ है कि अन्ना हजारे केवल एक गान्धी टोपीधारी, स्वच्छ छवि, अनशन विशेषज्ञ मुखौटे के रूप में चुने गये थे जिन्होंने अपने गाँव और प्रदेश में समाज सुधार के कुछ महत्वपूर्ण काम किये थे। अनुभव को ऊर्जा से अधिक महत्व देने वाले हमारे समाज में उनकी छवि एक बुजुर्ग नेतृत्व के रूप में प्रभावकारी तो थी किंतु जनलोकपाल आन्दोलन का सारा संचालन केजरीवाल मित्र मण्डल के पास ही था।
       यह आन्दोलन जानसमझ कर चलाया गया कि लोकपाल विधेयक का विचार दशकों से लम्बित है और कई बार सरकारें बदलने के बाद भी इसे पास नहीं किया गया क्योंकि ऐसा करना अनेक शासकों, प्रशासकों के पक्ष में नहीं है। विसंगति यह थी कि इसके महत्व से कोई इंकार ही नहीं कर सकता था इसलिए इस विधेयक में भांजी मारने वाले राजनेता भी मौखिक रूप से इसकी पक्षधरता करते नजर आते थे। राजनेताओं का यही दोहरापन इस आन्दोलन की जान था क्योंकि इसके स्वरूप पर मतभेद रखने के बहाने जो इसे पास ही नहीं होने देना चाहते थे वे इसका खुला विरोध नहीं कर पा रहे थे। केजरीवाल ने सोचे समझे ढंग से इसे गैरराजनीतिक रखा और हर आन्दोलन को हड़पने का प्रयास करने वाले संघ परिवार से परोक्ष मदद लेकर भी सार्वजनिक रूप से उसके नेताओं को मंच पर नहीं चढने दिया व उमा भारती, रामदेव आदि को कार्यकर्ताओं ने खदेड़ दिया था भले ही बाद में अन्ना हजारे ने पत्र लिख कर खेद व्यक्त कर दिया हो। स्वामी अग्निवेश जैसे लोगों पर आन्दोलनकारियों ने सतर्क निगाह रखी और उनके फोन का वीडियो बना कर उसे सार्वजनिक कर दिया जिसके बाद वे लम्बे समय तक सार्वजनिक मंचों पर नहीं दिख सके। रामदेव ने अपना अलग मंच बना कर अपनी जो फजीहत करायी तो उसके बाद अनेक सरकारी विभागों का ध्यान उनके संस्थानों की ओर गया और जाँच के बाद कर चोरी के अनेक प्रकरण सामने आये। उनके गुरु के गायब होने की जाँच भी उन्हें सन्देह के घेरे में ले गयी जिससे उबरने के लिए उन्हें भाजपा का शरणागत होकर मोदी की अन्धभक्ति में ही बचाव का रास्ता दिखायी दिया। इसी दौरान उन्होंने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और अम्बानी परिवार से जुड़े कुछ आर्थिक खुलासे किये।
       अन्ना हजारे बहुत ही सरल और गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं इसलिए उन्हें यह गलतफहमी हो गयी थी कि लोकपाल का सारा आन्दोलन उनके विचार और नेतृत्व का परिणाम है जब कि यह सच नहीं था। आन्दोलन के दबाव में जब सरकार लोकपाल विधेयक लायी तो केजरीवाल ने उसे कमजोर विधेयक बता कर उसका विरोध किया ताकि आन्दोलन ज़िन्दा रहे। इस पर स्वाभाविक रूप से संसद के पक्ष और विपक्ष द्वारा यह कहा गया कि कानून बनाने का अधिकार संसद का होता है और अपनी पसन्द का विधेयक लाने के लिए आन्दोलनकारियों को चुनाव का सामना करते हुए संसद में पहुँच कर अपना विधेयक लाना होगा। यह सलाह उन्हें राजनीतिक दल बनाने का नैतिक आधार देती थी इसलिए उन्होंने राजनीतिक दल बनाने की मजबूरी दर्शाते हुये आम आदमी पार्टी की नींव रख ली और इस विचार से असहमत अन्ना हजारे के मुखौटे से मुक्ति पा ली। आन्दोलन का शेष बचा समर्थन भी केजरीवाल ने अपना लिया। यूपीए गठबन्धन के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खुलासे और मँहगाई के कारण जो लोग कांग्रेस से नाराज थे वही लोग भाजपा की राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार और कुप्रशासन से भी नाराज थे ऐसे में एक भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन करने वाली तीसरी बेदाग अछूती पार्टी की ओर उम्मीद से देखा जाना स्वाभाविक ही था। आम आदमी पार्टी ने अपना पहला चुनाव केवल दिल्ली विधानसभा के लिए लड़ने की समझदारी दिखायी जबकि उसी समय पाँच विधान सभाओं के चुनाव हो रहे थे। वे जानते थे कि दिल्ली में राजनीतिक वोट अधिक है जबकि पिछड़े राज्यों में जाति, धर्म, क्षेत्र,  धन और भय के प्रभाव से पड़ने वाले वोट राजनीतिक आधार पर दिये गये वोटों को निर्मूल कर देते हैं और यही कारण है कि वामपंथी यहाँ कभी सफल नहीं हो सके। दिल्ली में 28 विधान सभा सीटों की विजय के बाद उनका राजनीतिक पक्ष पूरे देश में चर्चा का विषय बना जबकि 350 से अधिक सीटों पर जीतने वाली भाजपा की जीत का राजनीतिक मूल्यांकन नहीं हुआ। दिल्ली में उन्होंने प्राप्त किये 29 प्रतिशत वोटों में साढे ग्यारह प्रतिशत मत कांग्रेस के व ढाई प्रतिशत मत भाजपा के मतों में से जुटाये। आम आदमी पार्टी ने दक्षिण और वाम दोनों से ही दूर रहने की नीति अपनायी ताकि किसी की पक्षधरता का नुकसान दूसरी ओर से न उठाना पड़े। रहन सहन, सादगी, संघर्ष और ईमानदारी में वे वामपंथियों जैसे दिखे तो नई आर्थिक नीतियों में वे दक्षिणपंथियों के पक्ष में खड़े हुये। भाजपा और कांग्रेस दोनों से ही उन्होंने सरकार बनाने के लिए सहयोग न लेने का संकल्प दुहराया और खुद मांगी भी नहीं। कांग्रेस द्वारा स्वयं दिये सहयोग को स्वीकारने से पहले दूसरे चुनाव खर्च से बचने के नाम पर जनता से पूछने का विकल्प दिया। लालबत्ती की गाड़ी न लेने, बड़े बंगले न लेने, कम वेतन लेने, के साथ साथ उन्होंने रामलीला मैदान में शपथ लेने का प्रदर्शन किया व शपथ के बाद जो गाना गाया उसके बोल थे- इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा। यह गाना साम्प्रदायिक सद्भाव वाला फिल्मी गाना है जिसके बोल साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाली भाजपा को लक्ष्य बनाते हैं। बाद में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के नाम पर पुलिस और केन्द्र सरकार से टकराव लिया और कांग्रेस से दूरी का संकेत भी दिया। इसके लिए धरना स्थल का चुनाव भी वह स्थान रखा जहाँ देश के सबसे बड़े पर्व का आयोजन होना था और मीडिया समेत देश भर से लोग जुटने वाले थे।            
       आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयारी में जुटी आम आदमी पार्टी के सबसे प्रमुख सहयोगी गैर सरकारी संगठन हैं जिनकी संख्या देश के प्राथमिक स्कूलों से भी अधिक है और जो देशव्यापी हैं। सदस्यता अभियान सब के लिए खुला और निःशुल्क है व उसके बहाने लाखों लोगों के मोबाइल नम्बर प्राप्त कर लिये गये हैं और उम्मीदवारी के लिए भी एक हजार लोगों के पते व मोबाइल नम्बरों सहित जनप्रस्ताव की शर्त रखी गयी है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के साथ एसएमएस सम्पर्क की सुविधा स्थापित हो गयी है, यह नई तकनीक का उपयोग है। उग्र वामपंथ के कुछ संगठनों की सहानिभूति भी इस पार्टी के साथ है जो  प्राथमिक रूप से व्यवस्था विरोधी प्रतीत होती है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनेताओं की सादगी मध्यमवर्ग को खूब भाती है। अपनी जीत के लिए बार बार भगवान, खुदा और वाहेगुरु का आभारी होना धार्मिक लोगों को लुभाता है। सब मिला कर यह पार्टी एक शोले जैसी फिल्म है जिसमें सारे फिल्मी मसाले डाल दिये गये हैं।
       इतने सारे कोणों से काम करने वाला व्यक्ति सीधा सरल दिख सकता है, हो नहीं सकता। उसने मध्यमवर्ग में उम्मीदों के जीएम बीज बोये हैं और वह फसल काटने की बहुत जल्दी में प्रतीत होता है। यह फसल स्वास्थ के लिए कैसी होगी यह भविष्य के गर्त में है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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गुरुवार, जनवरी 09, 2014

घोषित पीएम पद प्रत्याशी का अघोषित चुनाव क्षेत्र

घोषित पीएम पद प्रत्याशी का अघोषित चुनाव क्षेत्र 

वीरेन्द्र जैन
       भले ही उस पर भाजपा में घमासान मच चुका हो किंतु उन्होंने अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बहुत पहले से ही घोषित करके छोड़ दिया था, और कहीं नकली लालकिला और कहीं नकली संसद का मंच बनवा कर हुंकार, ललकार रैलियां करवाने लगे थे। जब दो दिन पहले राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जैटली यह कहते हुये पाये गये थे कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दस से अधिक लोग योग्य हैं, वही जैटली दो दिन बाद कहने लगे थे कि यदि भाजपा को हिट विकेट होने से बचना है तो मोदी को तुरंत ही प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका से तीन महीने का पब्लिक रिलेशन और इमेज मैनेजमेंट का कोर्स किया हुआ है और अपनी इमेज निर्मित कराने के लिए उन्हें देश के सबसे मँहगे वकील राम जेठमलानी की सेवायें पहले से ही मिले हुयी थीं बाद में एकदम से अरुण जैटली भी उनके पक्ष में कूद पड़े थे और उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करवा दिया था।
       हमारे देश में चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित किये जाने की परम्परा नहीं रही है क्योंकि चुनाव के बाद बहुमत में आने वाले दल या गठबन्धन के नेता का चुनाव होता है जिसे ही राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। गत दो दशकों से देश में गठबन्धन सरकारों का दौर चल रहा है और ये गठबन्धन आम तौर पर चुनाव के बाद ही अपना सही स्वरूप ग्रहण कर पाते हैं। इन गठबन्धनों में सम्मलित होने वाले विभिन्न दल अपने अपने घोषणा पत्रों के अनुसार अपनी शर्तें रखते हैं व नेता के चयन में भी उनकी भूमिका उनके दल के कार्यक्रम के अनुसार होती है। स्मरणीय है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार बनी थी तब भाजपा को राममन्दिर, समान आचार संहिता, व धारा 370 की समाप्ति जैसी प्रमुख मांगों को वापिस लेना पडा था तथा गठबन्धन को बाहर से समर्थन देने वाली तेलगुदेशम ने केवल अटल बिहारी के नेतृत्व में सरकार बनने पर ही समर्थन देने की शर्त रखी थी। वी पी सिंह की सरकार बनते समय भी बड़ा ड्रामा हुआ जब देवीलाल को नेता चुना गया था और उन्होंने अपनी टोपी उन्हें पहना दी थी। उसी दौरान वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाये जाने का चन्द्रशेखर द्वारा विरोध करने पर राम जेठमलानी ने उनके घर के बाहर धरना दे दिया था व उनके समर्थकों ने उनसे हाथापाई की थी जिसमें इस प्रसिद्ध वकील के कपड़े तक फट गये थे। यूपीए-एक के समय जब कांग्रेस के सांसदों ने सर्वसम्मति से श्रीमती सोनिया गान्धी को अपना नेता चुन लिया था तब उन्होंने अपना ताज श्री मनमोहन सिंह को सौंप दिया था। अब भी कोई दल बिना दूसरे दलों से गठबन्धन किये सरकार नहीं बना सकता इसलिए गठबन्धन सरकारों के युग में चुनाव के पूर्व नेता घोषित कर देना अव्यवहारिक है। यदि यह मान भी लिया जाये कि भाजपा बिना किसी गठबन्धन के सरकार बना लेने के आत्मविश्वास का प्रभाव मतदाताओं पर छोड़ने की कूटनीति अपना रही है तो उन्हें साथ ही साथ लोकसभा के प्रत्याशियों की सूची भी जारी करना चाहिये थी और उन प्रत्याशियों द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से नेता का चुनाव करवाना चाहिये था। लोकसभा में दल के नेता पर मुहर भले ही हाईकमान लगाता हो किंतु उसे चुनने का अधिकार तो प्रतिनिधियों का ही होता है। अडवाणी समर्थक यह मानते हैं कि मोदी को ऐसा प्रत्याशी घोषित करने का कदम सैद्धांतिक रूप से अलोकतांत्रिक है, जिसका एक नुकसान तो जेडी-यू के साथ गठबन्धन भंग होने और बिहार में सरकार से बाहर होने के रूप में हो ही चुका है।
       जिस व्यक्ति को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित कर दिया है और तब से ही लगातार देश भर में उसकी आमसभाएं व रैलियां आयोजित करवायी जा रही हैं उसका चुनाव क्षेत्र अभी तक घोषित नहीं किया है। यह कैसी विडम्बना है कि जिसको प्रधानमंत्री चुनवाने के लिए देश भर में घुमाया जा रहा हो उसके लिए कोई चुनाव क्षेत्र ही निर्धारित न किया जा पा रहा हो। दिल्ली में भाजपा द्वारा सरकार बना सकने में असमर्थ रहने और आम आदमी पार्टी के तेज उभार व आकर्षण से मोदी के चुनाव क्षेत्र का चयन और मुश्किल हो गया है। आम आदमी पार्टी, पार्टी से अधिक एक आन्दोलन है और उसका लक्ष्य लगभग सभी स्थापित राजनीतिक दलों को बेनकाब करना है। वे भाजपा के विपरीत सत्ता की अन्धी वासना से दूर हैं और नुकसान पहुँचाने की क्षमता रखते हैं। आम आदमी पार्टी के कारण ही भाजपा की दिल्ली सरकार नहीं बन सकी। उसके नेता अरविन्द केजरीवाल ने अभी घोषित किया हुआ है कि वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे किंतु राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुके केजरीवाल नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे भले ही वे देश में कहीं से भी चुनाव लड़ें । इसका उन्हें राजनीतिक लाभ मिलेगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल गुजरात के मुख्यमन्त्री मोदी को मुख्यमंत्री पद से स्तीफा देने के बाद चुनाव लड़ने की चुनौती भी दे सकते हैं, इससे केजरीवाल का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर गुजरात में नेतृत्व का संकट खड़ा हो जायेगा।
       एक बोधकथा कहती है कि एक बार एक गाँव में सूखा पड़ा तो गाँव के सारे लोग मिलकर पास के चर्च के पादरी के पास गये। उस पादरी ने रविवार को सारे गाँव वालों से एकत्रित होने के लिए कहा ताकि बरसात के लिए प्रभु से सामूहिक प्रार्थना की जाये। अगले रविवार को पूरे गाँव वाले एकत्रित हो गये तो पादरी ने पूछा कि किस किस को प्रार्थना के बाद बरसात होने का भरोसा है? उत्तर में सबने हाथ उठा दिये। फिर पादरी ने हँसते हुये पूछा- तो फिर आप लोगों के छाते कहाँ हैं? उस प्रार्थना सभा में आया कोई भी व्यक्ति छाता लेकर नहीं आया था। यदि भाजपा और मोदी को अपनी जीत का भरोसा होता तो प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित होते ही गुजरात मुख्यमंत्री पद से स्तीफा दे दिया होता।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, जनवरी 05, 2014

मोदी के गुब्बारे में झाड़ू की सींक

मोदी के गुब्बारे में झाड़ू की सींक
वीरेन्द्र जैन

       पाँच राज्यों में हो चुके विधानसभा चुनावों के बाद देश लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है और दिल्ली विधानसभा के परिणामों में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता ने बहुत सारे समीकरण उलट दिये हैं।
       2004 के आम चुनावों में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की पराजय के बाद सत्ता से दूर हुयी भाजपा लगातार विक्षिप्तों जैसी हरकतें करती रही है और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए अलोकतांत्रिक ढंग से हाथ पैर मारती रही है। जब 2009 के आम चुनाव में भी सत्ता उनके हाथ नहीं आयी तो उनकी बौखलाहट अपनी सारी हदें पार कर गयी। उल्लेखनीय है कि 2004 में यूपीए की पहली सरकार बनी तो उसे बाम मोर्चे का समर्थन प्राप्त करना पड़ा था। बाम मोर्चा की यह नीति रही है कि उसने जब भी किसी गठबन्धन को समर्थन दिया है तो वह सरकार में शामिल हुए बिना बाहर रह कर ही दिया है। वे ऐसी किसी सरकार में सम्मलित नहीं होते हैं जो पूरी तरह से उनके कार्यक्रम पर कार्य नहीं करती। बाममोर्चा अपने समर्थन से पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय कर लेता है जिसके आधार पर ही अपना समर्थन जारी रखता है। यही कारण था कि भाजपा को यह भरोसा नहीं था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यह सरकार साझा कार्यक्रम पर अमल कर सकेगी और पाँच साल चल पायेगी इसलिए वे इस दौरान लगातार अपने कार्यकर्ताओं को मध्यावधि चुनावों हेतु तैयार रहने के लिए कहते रहे। दूसरी ओर वे हर असहमति पर बामपंथियों को समर्थन वापिस लेने की चुनौती देते रहे। उनके दुर्भाग्यवश बामपंथियों ने गैरज़िम्मेवाराना व्यवहार नहीं किया और सरकार लगातार चार साल तक न केवल चली अपितु उसने सूचना के अधिकार को कानूनी रूप देने से लेकर मनरेगा जैसी रोजगार गारंटी देने वाली परिवर्तनकारी योजनाएं भी प्रारम्भ कीं। पाँचवें साल में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के विपरीत अमरीका के साथ परमाणु समझौते के सवाल पर बाम मोर्चा ने समर्थन वापिस लिया तो समाजवादी पार्टी ने समर्थन देकर सरकार को अपनी अवधि तक चलने दिया और भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सरकार चलते रहने की खीझ में उसने भाजपा ने संख्या बल के आधार पर संसद को न चलने देने की नीति अपनायी व दोनों कार्यकाल में उसकी कार्यवाही को निरंतर स्थगित कराते रहे। इस दौरान औसत बैठकों की संख्या 127 से घटकर 73 दिन रह गयी। जो सदन कभी 118 तक विधेयक पास करने का रिकार्ड बना चुके थे वे अब 18 विधेयकों तक सीमित हो गये। सदन में शोर गुल करके गर्भगृह तक आकर नारे लगाने का दृश्य आम हो गया।     
       दूसरे कार्यकाल में बामपंथियों के सहयोग की जरूरत नहीं पड़ी किंतु उनके जिम्मेवारीपूर्ण नियंत्रण के हटने से सरकार में शामिल गठबन्धन के सहयोगी दलों ने न केवल अपनी पसन्द के मंत्रालय ही चुने अपितु उन मंत्रालयों में मनमानी भी की जिसका रोग गठबन्धन के प्रमुख दल कांग्रेस के कतिपय मंत्रियों तक भी पहुँचा। भ्रष्टाचार के आरोपों का इतना असर हुआ कि सीएजी के बताये सम्भावित लाभ में कमी को भी भ्रष्टाचार मान लिया गया। भ्रष्टाचार के ये रोगाणु भाजपा शासित कर्नाटक, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी प्रकट हुये जिसके परिणाम स्वरूप पहले तीन राज्यों में भाजपा पराजित हो गयी, और कांग्रेस पुनः सत्तारूढ हुयी। इन चुनाव परिणामों ने भाजपा की बौखलाहट को और बढा दिया और उसने चुनाव जीतने के लिए वापिस जनसंघ वाले युग में लौटने का खतरनाक फैसला किया। आगामी आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी की जगह कट्टरता के लिए बदनाम गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का चुनाव कर लिया जिन्होंने तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव जीतकर भाजपा में रिकार्ड बना लिया था। इसके बाद वे देश भर में आम सभाएं करते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बीज बोने लगे। मोदी के सहारे अपनी नैया पार लगाने की सोच रखने वाली पार्टी ने मोदी को लोकप्रिय करने के लिए न केवल विदेशी प्रचार एजेंसी का ही सहारा लिया अपितु सोशल मीडिया में हजारों नकली एकाउंट बना कर मोदी को लोकप्रिय करने व कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ कुत्सित प्रचार करने लगे। अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन की तर्ज़ पर गुजरात में स्टेच्यू आफ यूनिटी की योजना बनायी गयी जिसका आकार अमेरिका की विश्व प्रसिद्ध स्टेच्यू आफ लिबर्टी से बड़ा रखने की घोषणा हुयी। इस स्टेच्यू के लिए प्रत्येक घर से लोहा एकत्रित करने की योजना उसी तरह बनायी गयी जैसी की प्रत्येक घर से ईँटें एकत्रित करने के बहाने देश भर में प्रचार और सर्वेक्षण का काम किया गया था। इसके विपरीत अपनी गुरुता, वरिष्ठता, गम्भीरता और सत्ता जनित आलस्य के वशीभूत कांग्रेस ने उनके किसी अभियान का उत्तर नहीं दिया, और न ही प्रतियोगिता में उतरे। इतना ही नहीं उसने अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी तक घोषित नहीं किया जिससे भ्रम की स्थिति बनी रही। इसी बीच पाँच विधानसभाओं के चुनाव हुये जिनमें से एक राज्य उन्होंने कांग्रेस से छीन लिया व दो में सत्ता बनाये रखी।
       इन विधानसभा चुनावों में मिजोरम में कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाये रखी तो मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ में उसने मतों के प्रतिशत में वृद्धि की। राजस्थान और दिल्ली में उसका मत प्रतिशत घटा। पाँच में से तीन राज्यों में सरकार बनने का श्रेय भी मोदी के सिर बाँधने की कोशिश की कोशिश हुयी ताकि उसका लाभ चुनावों में मिले। पश्चिमी चुनाव प्रचार की तर्ज पर मोदी के मुखौटे, आम सभाओं में मोदी के नाम की तख्तियां उठाने वाले व नारे लगाने वाले दो हजार लोगों की टीम प्रत्येक सभा में भिजवायी जाने लगी। प्रैस के कुछ हिस्से को पेड न्यूज द्वारा भीड़ की अतिरंजित संख्या बताने व ऐसे फोटो प्रसारित करने के लिए तैयार किया गया जिससे भीड़ बड़ी दिखे। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए मोदी की आम सभा में उस विधायक का सम्मान भी किया गया जिसने नकली वीडियो बनाकर मुज़फ्फरनगर में दंगा भड़काने में मुख्य भूमिका अदा की थी और जिसे उसके लिए गिरफ्तार किया गया था। मोदी की आम सभाओं की कुर्सियां तक नीलाम होना प्रायोजित किया गया जिससे लोगों में उनके प्रति दीवानगी का भ्रम बने। ऐसा भ्रम बना भी और नई सूचना तकनीक व प्रबन्धन को कैरियर बनाने वाली युवा पीढी प्रभावित भी हुयी थी पर केजरीवाल के उदय ने मोदी के सारे उफान पर पानी डाल दिया।
       पुराने औद्योगिक राज्य गुजरात में औद्योगिक विकास की निरंतरता से चमत्कृत जो युवा पीढी कांग्रेस को पुराने जमाने की पार्टी मानने लगी थी और मोदी के नकली प्रचार से प्रभावित होने लगी थी उसे आयकर विभाग के कमिश्नर पद से त्यागपत्र देकर आये आईआईटी डिग्री वाले अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम की सादगी और लगन ने प्रभावित किया है। दिल्ली में कांग्रेस की एंटी इनकम्बेंसी और बढती मँहगाई के आधार पर जो भाजपा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थी उसके ढाई प्रतिशत मत घट गये हैं। यह तब हुआ है जब भाजपा के पक्षधर सर्वेक्षण कर्ता केजरीवाल की आप पार्टी की  उपेक्षा कर रहे थे व उसकी वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने प्रचार के अंतिम दिन लोगों से आम आदमी पार्टी को वोट देकर अपना वोट बेकार न करने की सलाह दी थी।
       चलती ट्रेन में एक व्यक्ति खिड़की पर पैर टिकाये अधलेटा गुनगुना रहा था कि अचानक उसके पाँव की चप्पल नीचे गिर जाती है तो वह बिना देर किये हुये दूसरी चप्पल भी नीचे फेंक देता है, ताकि जिसको भी मिले तो उसके काम तो आये। कांग्रेस ने आप पार्टी को समर्थन देकर ऐसी ही समझदारी दिखायी है। नितिन गडकरी और प्रभात झा के आरोप तथा भाजपा पक्ष के प्रचारकों की प्रतिक्रियाएं साफ संकेत दे रही हैं कि इस समझदारी ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी नाम के फुलाये गये गुब्बारे में झाड़ू की सींक चुभो कर फोड़ दिया है।           
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, दिसंबर 24, 2013

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार में मंत्रिमण्डल अयोग्य, मुख्यमंत्री योग्य

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार में मंत्रिमण्डल अयोग्य, मुख्यमंत्री योग्य
वीरेन्द्र जैन

एक लोक कथा के अनुसार दूल्हा का एक हाथ टूटा हुआ है, सिर पर बाल नहीं हैं, सुनाई कम देता है, भेंगा है, रंग गहरा काला है पर फिर भी उसे सुन्दर बताया जा रहा है क्योंकि उसका गुणगान करने वाले बहुत वाक्पटु हैं। मध्य प्रदेश की भाजपा की सरकार के तीसरी बार चुने जाने पर ही ऐसा ही गुणगान किया जा रहा है।
      प्रदेश की सरकार को मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रि परिषद चलाती है जो लोकतांत्रिक ढंग से अपने फैसले लेती है, जिसे कार्यपालिका लागू करती है। किसी भी सरकार की उपलब्धियां उसके मंत्रिमण्डल के सामूहिक प्रयास का फल माना जाता है और उसी तरह उसके अलोकप्रिय फैसलों के लिए भी पूरी मंत्रिपरिषद जिम्मेवार होती है। किंतु पिछले वर्षों से यह देखा जा रहा है कि प्रदेश की सारी प्रचारित उपलब्धियों का श्रेय मुख्यमंत्री को दिया जाने लगा है जिसके परिणाम स्वरूप जनता के कटु अनुभवों का नुकसान तो सम्बन्धित विभाग के मंत्रियों को उठाना पड़ता है और प्रचार में खर्च किये गये अटूट धन का सारा लाभ मुख्यमंत्री की छवि चमकाने में लग जाता है। गत विधान सभा चुनावों में मंत्रिपरिषद के एक तिहाई वरिष्ठ मंत्रियों की पराजय और नये मंत्रिमण्डल में कुछ पुराने मंत्रियों को स्थान न दिये जाने से जो चित्र उभरता है वह सरकार के पिछले कार्यकाल के बारे में ऐसी कहानी कहता है जो सरकारी प्रचार से भिन्न है।   
1-      प्रदेश के वित्त योजना, आर्थिक और सांख्यकी तथा वाणिज्यिक कर मंत्री श्री राघव जी से एक असामाजिक अपराध के आरोप में त्यागपत्र ले लिया गया था। त्यागपत्र देने के बाद वे गायब हो गये थे और एक मकान से पुलिस ने उन्हें तलाश कर गिरफ्तार किया था। उनके निकटतम कुछ लोग जिन पर कुछ आर्थिक अनियमिताओं के आरोप भी थे, लगातार फरार रहे और चुनावों में अपनी भाजपा सरकार बन जाने के बाद ही आत्म समर्पण किया।
2-      प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा अपना चुनाव क्षेत्र बदलने के बाद भी हार गये। उससे पहले भी वे जमीन से जुड़े एक प्रकरण में मंत्रिमण्डल से हटाये जा चुके थे और लम्बे समय तक मंत्रिमण्डल से बाहर रह कर मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की आलोचना करते रहे थे।
3-      उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा चुनाव हार गये। उनके चुनाव हार जाने के बाद ही करोड़ों रुपयों का व्यापम घोटाला उजागर हुआ जिसके बारे में पुलिस की खोजबीन से बचने के लिए वे अंतर्ध्यान हो गये। पूर्व मुख्यमंत्री उमाभारती ने सार्वजनिक बयान में कहा कि वे मुख्यमंत्री और संग़ठन के प्रिय व्यक्तियों में से एक हैं, मेरे भाई के समान हैं अतः उन्हें फरार न रह कर उपस्थित हो जाना चाहिए।
4-      राजस्व व पुनर्वास मंत्री करण सिंह वर्मा, चुनाव हार गये।
5-      किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री राम कृष्ण कुसमारिया खुद तो चुनाव हार ही गये उनके  साथ उनके ही विभाग के राज्य मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह भी चुनाव हार गये। स्मरणीय है कि संघ से जुड़े किसान संघ ने चुनावपूर्व वर्ष में हजारों किसानों के ट्रैक्टरों के साथ मुख्यमंत्री बंगला घेर लिया था और लगातार दो दिन तक घेरे रहे थे। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री स्वय़ं को किसान का बेटा बतलाते हैं।
6-      आदिमजाति और अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री हरिशंकर खटीक चुनाव हार गये हैं जो स्रकार के अनुसूचित जाति और जनजातियों के मंत्रालय के काम के बारे में मतदाताओं की प्रतिक्रिया का सूचक है।
7-      पशु पालन, मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री अजय विश्नोई भी मतदाताओं द्वारा नकार दिये गये हैं। स्मरणीय है कि इससे पूर्व भी मंत्रिमण्डल से हटाये गये थे व उनके रिश्तेदारों के यहाँ आयकर विभाग की सर्च हो चुकी है। उनके साथ विभाग के राज्य मंत्री दशरथ सिंह भी पराजित हो गये।  
8-      सामान्य प्रशासन, नर्मदा घाटी विकास, और विमानन के राज्यमंत्री के एल अग्रवाल चुनाव हार गये हैं।
9-      किसान ही नहीं श्रमिकों के कल्याण के श्रम मंत्री जगन्नाथ सिंह को भी मतदाताओं ने हरा दिया है।     
10-   लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह ने तो भविष्य की सम्भावनाएं देखते हुए पहले ही हथियार डाल दिये थे और चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया था।
11-   परिवहन एवं जेल मंत्री रहे जगदीश देवड़ा चुनाव तो जीत गये किंतु लक्ष्मीकांत शर्मा की तरह शिवराज सिंह का दिल नहीं जीत पाये इसलिए उन्हें नये मंत्रिमण्डल में जगह नहीं मिली।
12-   स्कूल शिक्षा मंत्री रही अर्चना चिटनीस भी नये मंत्रिमण्डल में शामिल होने की योग्यता प्रमाणित नहीं कर सकीं।
13-   महिला एवं बाल विकास मंत्री रंजना बघेल भी लाड़ली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना के व्यापक प्रचार का श्रेय मुख्यमंत्री से नहीं छीन सकीं और नये मंत्रिमण्डल में जगह नहीं बना सकीं।
14-   पर्यटन, खेल और युवा कल्याण मंत्री तुकोजी राव पंवार जिन्हें पिछली बार महिला निर्वाचन अधिकारी के साथ असंयत व्यवहार के बाद भी मंत्री बना दिया गया था पर इस बार मंत्री के योग्य नहीं पाया गया।
15-   गृह परिवहन और जेल के राज्यमंत्री बार बार यह शिकायत करते रहे कि पुलिस के थानेदार तक उनकी नहीं सुनते इसलिए उन्हें मंत्रिमण्डल में न लेकर अपने रिश्तेदारों की सेवाओं के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया गया।
16-   लोक स्वास्थ और परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा, आयुष, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास जैसे मंत्रालयों के राज्य मंत्री महेन्द्र हार्डिया अपने केबिनेट मंत्री नरोत्तम मिश्रा का सहयोग नहीं कर सके इसलिए उन्हें मंत्रिमण्डल में स्थान नहीं दिया गया।
17-   वन और राजस्व विभाग में राज्यमंत्री रहे जय सिंह मरावी के मूल्यांकन ने उन्हें पुनः मंत्री बनाये जाने के योग्य नहीं पाया।
18-   नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के राज्यमंत्री मनोहर ऊँटवाल जिनके विशेष कर्तव्य अधिकारी के व्यवहार के कारण एक व्यक्ति ने ज़हर खा लिया था मंत्रिमण्डल में स्थान नहीं पा सके।
19-   स्कूल शिक्षा मंत्री नानाभाऊ मोहोड़ भी अपनी केबिनेट मंत्री की तरह पुनः पद सुशोभित करने से वंचित रखे गये।     
   पूरे प्रदेश में झाड़ूमार जीत का दावा करने वाली पार्टी ने 51 में से 32 जिलों से कोई मंत्री नहीं बनाया है वहीं नये मंत्रिमण्डल के सात मंत्री ऐसे हैं जिन पर लोकायुक्त में प्रकरण लम्बित हैं। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनावों में अच्छी उपलब्धि दिखाने का चारा डाल कर मंत्रियों के कुछ पद रिक्त रखे गये हैं। देखना होगा कि इस चारे में कितने विधायक फंसते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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बुधवार, दिसंबर 18, 2013

आन्दोलन, पार्टी और प्रशासन के भेद व ‘आप’ का असमंजस

आन्दोलन, पार्टी और प्रशासन के भेद व ‘आप’ का असमंजस

वीरेन्द्र जैन
       दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने में आया गतिरोध भारतीय लोकतंत्र में नयी घटना है। ये इस बात का संकेत भी है कि अब कुछ ऐसा नया घट रहा है जिसे परम्परागत तरीकों से हल नहीं किया जा सकता। अब तक हमारे राजनीतिक दल किसी तरह चुनाव में वोट हस्तगत करके बहुमत के आधार पर सत्तारूढ हो जाया करते थे और स्पष्ट बहुमत न आने की दशा में भी वांछित संख्या में निर्दलीयों या दूसरे दलों के सदस्यों से समर्थन प्राप्त कर लेते थे। जिन्हें शासन करना नहीं आता था वे भी नौकरशाही के सहारे चार छह महीने खींच कर अपने अपने घर भर लेते थे, पर मौका कोई नहीं छोड़ता था। दलबदल विरोधी कानून आ जाने के बाद भी कई ऐसे छेद थे जिनमें से समर्थन देने वाले आते जाते रहते थे या त्यागपत्र देकर बहुमत की राह आसान कर देते थे। यह पहली बार हुआ है जब त्रिकोणीय मुकाबले में जीत के ऐसे आंकड़े सामने आये हैं कि सैद्धांतिक समझौता किये बिना कोई सरकार बना सकने की स्थिति में नहीं था व समझौते का अर्थ जनता के सामने नग्न हो जाने के बराबर था। आम आदमी पार्टी के सामने मुसीबत यह थी कि उसने सत्तारूढ कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वन्दी बताते हुये चुनाव लड़ा था और उसके प्रमुख नेता ने मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ कर उन्हें हराया भी था, इसलिए वे उनके साथ तुरंत सरकार बना नहीं सकते थे व कांग्रेस से तीन गुना अधिक सीटें जीत कर विजयी होने के कारण सरकार में सम्मलित हुए बिना बाहर से समर्थन देना भी सम्भव नहीं था। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया था किंतु उसने अपने साम्प्रदायिक एजेंडे और मोदी जैसे नेताओं को आगे करने के कारण अपनी हालत अछूतों जैसी बना ली है जिसे उनके पुराने सहयोगी जेडी[यू] का इकलौता विधायक भी समर्थन देने पर सहमत नहीं हो सकता। यह दुर्लभ घटना है जब भाजपा सबसे बड़े दल होने के बाद भी गठबन्धन सरकार नहीं बना पायी अन्यथा उनके पास तो खरीद फरोख्त की अच्छी क्षमता और अभ्यास दोनों हैं।
       आम आदमी पार्टी का जन्म एक आन्दोलन से हुआ है, या यह कहना ज्यादा सही होगा कि एक आन्दोलन ने जनता के समर्थन को देखते हुए पार्टी बनाने, चुनाव लड़ कर विधान सभा में अपनी बात रख कर आन्दोलन को आगे बढाने का फैसला किया था। उन्हें शायद यह कल्पना भी नहीं थी कि चुनाव परिणाम उन्हें सरकार बनाने की कगार पर ला पटकेंगे। आन्दोलन करने, चुनाव लड़ने वाली पार्टी बनाने और सरकार चलाने वाली पार्टी के चरित्र में बहुत अंतर होता है। आज की बहुजन समाज पार्टी भी किसी समय एक आन्दोलन हुआ करती थी जो दलित और पिछड़ी जातियों के मानव अधिकारों को पाने, दलित समाज को आत्महीनता से उबार कर आत्म सम्मान बढाने के लक्ष्य को लेकर आगे बढी थी। यही कारण था कि उन्हें दलित समाज का व्यापक समर्थन तुरंत मिला था, पर जैसे ही वह चुनावी और सरकार बनाने वाली पार्टी में बदली तो उसका चरित्र ही बदल गया। बहुजन समाज पार्टी एक आन्दोलन से अपने समर्थन का सौदा करने वाली फर्म में बदल गयी और सत्ता के मायाजाल में उन्हीं तत्वों से सौदा करने के लिए विवश हो गयी जिनके खिलाफ उसने आन्दोलन शुरू किया था। एक राजनीतिक दल बनकर सरकार चलाने के बाद उसने उन लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया जिनके हित के नाम पर उन्होंने आन्दोलन शुरू किया था। उनकी पार्टी पर भी उनके शत्रु समुदाय का नियंत्रण हो गया। ताजा चुनावों तक उनका समर्थन छीझ चुका है, उनकी सीटों और वोटों दोनों में गिरावट आयी है। उनके अन्ध समर्थक रहे लोग अब इस सोच के साथ अपने मतों का सौदा करने का अधिकार उन्हें नहीं देना चाहते कि अगर मतों का सौदा ही करना है तो वे स्वयं ही यह काम क्यों न करें।    
       आम आदमी पार्टी का नेतृत्व बहुजन समाज पार्टी की तुलना में अधिक शिक्षित और तकनीकी है। उसके पास दूसरों के अनुभवों से सीखने का अवसर है इसलिए अचानक सरकार बनाने का संयोग आ जाने पर खुशी की जगह उसके हाथ पाँव फूल गये। भविष्य के परिणामों की कल्पना करके उन्होंने सरकार बनाने की जल्दी करने की जगह अपने अन्दोलन को तब तक खींचना ठीक समझा जब तक उन्हें पूर्ण बहुमत मिल जाये या संसद में संतोषजनक प्रतिनिधित्व मिल जाये। विडम्बना यह है कि वे यह सच अपने मतदाताओं को नहीं बता सकते इसलिए उन्हें देर करने के लिए तरह तरह के बहाने बनाने पड़े। ये बहाने उनका पहला राजनीतिक पाठ है या कहें कि आन्दोलन से चुनावी पार्टी में बदलने का पहला कदम है। असम गण परिषद के छात्र आन्दोलन के सरकार में बदलने के बाद के अनुभवों द्वारा वे यह भी जानते हैं कि चुनावों की जीत से केवल मंत्रियों के नाम भर बदलते हैं पर व्यवस्था वही रहती है और उन्हें अपेक्षाकृत अधिक जागरूक शिक्षित मध्यमवर्ग का जो समर्थन मिला है वह व्यवस्था बदलने के लिए मिला है। सबसे बड़ा दल होते हुये भी सरकार न बना पाने से कुंठित भाजपा और पराजय से आहत कांग्रेस उन्हें जल्दी से जल्दी असफल होते देखना चाहेगी इसलिए इन दोनों ही दलों के समर्थन पर उन्हें बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।
       आन्दोलन से सरकार बनाने का एक अनुभव कम्युनिष्टों का भी है जो कैडर आधारित संगठन होने के कारण कम से कम क्षति के शिकार हुये किंतु सरकार चलाने के बाद उनके आन्दोलन में कोई बढोत्तरी देखने को नहीं मिली। भले ही उन्होंने भ्रष्टाचार को सहन नहीं किया और चिन्हित व्यक्तियों के खिलाफ उचित समय पर कार्यवाहियां करके आरोपियों को बाहर का रास्ता दिखाया किंतु इन कार्यवाहियों का होना इस बात का प्रमाण भी है कि सरकार में आने के बाद उनके आसपास भी ऐसे लोग पैदा हुये जिन्होंने आन्दोलन को कमजोर किया। डीएमके, एआईडीएमके का आन्दोलन भी सरकार से जुड़ने के बाद समाप्त हुआ है। 
       आदर्श स्तिथि यह होगी जब आन्दोलनकारी, चुनावी पार्टी भी सफलतापूर्वक चलाने और अधिक अच्छी सरकार चला कर दिखा सकेंगे। देखना होगा कि ऐसी स्थिति कब तक निर्मित होती है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, दिसंबर 09, 2013

मताभिव्यक्ति और मतदान, सन्दर्भ म.प्र. विधानसभा चुनाव

मताभिव्यक्ति और मतदान, सन्दर्भ म.प्र. विधानसभा चुनाव  
वीरेन्द्र जैन

      लोकतंत्र नागरिक को मत व्यक्त करने की आजादी देता है। यही आज़ादी सरकार चुनने के लिए प्रत्येक नागरिक को आम चुनाव में मत देने का अधिकार देती है। किंतु देखा गया है कि सरकार बना कर सत्ता पर अधिकार करने की वासना पालने वाले तत्व चुनावों को ऎन केन प्रकारेण प्रभावित करने के लिए नागरिकों के स्वतंत्र विचारों को दुष्प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग मतदाता की वैचारिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर उसे एक सौदागर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और इसी प्रभाव में सरल मतदाता त्वरित ठोस लाभ के लिए अपने मत चन्द रुपयों, कम्बलों, या शराब की बोतलों के बदले बेच कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पथभ्रष्ट कर देते हैं।

      गत दिनों हुये विधानसभा चुनावों में दिल्ली विधानसभा चुनाव के अंतिम दिन भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने अपनी प्रैस कांफ्रेंस में कहा कि उन्हें विश्वास है कि दिल्ली के मतदाता आम आदमी पार्टी को वोट देकर अपना वोट व्यर्थ नहीं करेगा। उनका यह कथन अलोकतांत्रिक है क्योंकि मतदान का अर्थ अपने विचार को आकार देने वाले उम्मीदवार को समर्थन देकर अपने मत की अभिव्यक्ति करना होता है। उम्मीदवार का प्रतिनिधि के रूप में चयन तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार अधिक मत मिलने का सहज परिणाम होता है। यदि कोई किसी खास उम्मीदवार को जीतने वाला बता कर सरल मतदाता को भ्रमित करने की कोशिश करता है तो वह लोकतांत्रिक भावना को भ्रष्ट करता है। ओपीनियन पोल या प्रीपोल सर्वेक्षण, जो कभी कभी ही संयोग से ठीक निकल आते हैं, भी इसी तरह का भ्रम पैदा कर मतदाता को भटकाने का काम करते हैं।

      उपरोक्त विधानसभा चुनावों में यदि हम नमूने के तौर पर मध्य प्रदेश का उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने गत विधानसभा चुनावों में जीती 143 सीटों की तुलना में 22 सीटें अधिक जीतकर यह संख्या 165 तक पहुँचा ली है। दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सीटें पिछले चुनाव में जीती 71 सीटों से घट कर 58 तक पहुँच गयी हैं। इन चुनावों का विश्लेषण करते हुए हमारे विद्वान समीक्षक भी चुनावी जीत को ही आधार बना कर ही कांग्रेस की नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं जबकि चुनावों में जहाँ कोई उम्मीदवार तीस हजार वोट पाकर ही चुनाव जीत जाता है जैसे मेहगाँव से भाजपा प्रत्याशी मुकेश सिंह चौधरी तो कोई अस्सी हजार वोट पाकर भी चुनाव हार जाता है, जैसे मल्हारगढ विधानसभा क्षेत्र से काँग्रेस के श्यामलाल जोकचन्द। ये आँकड़े बताते हैं कि बहुदलीय चुनावों में जीत हार से केवल सरकार बनाने का अधिकार मिलता है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को पिछले आम चुनाव से पचास लाख वोट अधिक मिले हैं जो कुल मतदान का 39.3% हैं और 7% अधिक हैं फिर भी उसकी सीटें कम हुयी हैं क्योंकि अधिक मतदान और गैर भाजपा गैर कांग्रेस दलों के मतों में आयी जबरदस्त गिरावट के कारण भाजपा को 48.7% वोट मिले हैं जो पिछले आम चुनावों में मिले मतों से 69 लाख अधिक हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि छह लाख उन्नीस हजार वोट नोटा अर्थात उपरोक्त में से किसी को नहीं को दिये गये हैं जो कुल मतों के लगभग दो प्रतिशत हैं। यह संख्या कम से कम दस विधायकों को औसत विजयी बनाने के बराबर है। चौबीस विधान सभा क्षेत्रों में तो जीत हार का अंतर उन चुनाव क्षेत्रों में नोटा को गये वोटों से भी कम है।

      उल्लेखनीय है कि 2012 में हुये उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ बहुजन समाज पार्टी को गत चुनावों की तुलना में चौंतीस लाख वोट अधिक मिले थे फिर भी वे कम सीटें पाकर सत्ताच्युत हो गये थे। इसी तरह पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में बाम मोर्चा भी नौ लाख वोट अधिक पाकर भी सत्ता से दूर हो गया था।  

      अधिक सीटों की जीत के धूम धड़ाके में यह बात भुला दी जा रही है कि मध्य प्रदेश के दस मंत्री चुनाव में हार गये है ये मंत्री शिवराज मंत्रिमण्डल द्वारा बहु प्रचारित विकास के आंकड़ों के प्रमुख सूत्रधार रहे हैं। इन मंत्रियों में उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा, राजस्व व पुनर्वास मंत्री करण सिंह वर्मा, किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री राम कृष्ण कुसमारिया, और इसी विभाग के राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह, आदिमजातिऔर अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री हरि शंकर खटीक, पशु पालन, मछुआ कल्याण एवं मत्सय विभाग, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री अजय विश्नोई, सामान्य प्रशासन, नर्मदा घाटी विकास, और विमानन के राज्यमंत्री के.एल अग्रवाल, श्रम मंत्री जगन्नाथ सिंह, और दशरथ सिंह लोधी चुनाव हार गये हैं। लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह ने चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया था, और वित्त, योजना, आर्थिक विकास, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास मंत्री राघव जी की कथा तो सब को पता ही है। जीत की संख्याओं के आगे ये मंत्रिपरिषद के सदस्यों की यह पराजय शासन के बारे में कुछ संकेत देती लगती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वीरेन्द्र जैन                                                         
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शुक्रवार, दिसंबर 06, 2013

संस्मरण के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे

संस्मरण
के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे
वीरेन्द्र जैन
के.पी.सक्सेना नहीं रहे। उनके स्वास्थ के बारे में चिंतित कर देने वाली खबरें बहुत दिनों से आ रही थीं। प्रमुख रूप से वे पत्र पत्रिकाओं के व्यंग्य लेखक के रूप में जाने जाते रहे पर उन्होंने जब भी लिखने का जो लक्ष्य बनाया उसमें सफलता पायी। पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय लेखन की ललक मुझे उनके लेखन से ही मिली और इस तरह वे मेरे मार्गदर्शक रहे। उनके लेखन की मात्रा, विषय वैविध्य और निरंतरता को देख कर आश्चर्य और ईर्षा होती थी।
      एक छोटे ‘ए’ क्लास बैंक हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक में नौकरी करते हुये देश के कोने कोने में पन्द्रह साल के दौरान मेरे दस ट्रासफर हुये, क्योंकि इस बैंक में अधिकारियों के ट्रांसफर पूरे देश में कहीं भी हो सकते थे। इसी काल में मुझे एक बार हरदोई जिले के बेनीगंज में पदस्थ होना पड़ा जो लखनऊ के निकट था, अतः मेरी शनिवार की शाम और रविवार लखनऊ में ही गुजरता था। उस दौर के लखनऊ के समकालीन लेखकों में के पी का नाम सर्वाधिक चमकीला नाम था। वे अमीनाबाद के पास गुईन रोड पर किराये से रहते थे। लखौरी ईंटों से बना वह बड़े दरवाजे वाला घर था। उनसे पहली मुलाकात करने से पहले मैंने उन्हें जो पत्र लिखा था उसे न मिलना उन्होंने बताया था, पर उसके बाद भी मेरे नाम और लेखन से परिचित होने की जानकारी देकर उन्होंने थोड़ा सुख दिया था जिससे उनके साथ जल्दी सहज हो सका था। बाद में उन्होंने ही मुझे सूर्य कुमार पान्डेय और अनूप श्रीवास्तव आदि से मिलवाया था जिनसे बाद में लम्बा सम्पर्क और मित्रता रही। अभी बाद के दिनों में वे रामनगर में रहने लगे थे जहाँ उनके पड़ोस में नागरजी के पुत्र का मकान था और कभी कभी नागरजी भी वहाँ आते रहते थे। एक बार वे मुझे नागरजी से मिलवाने भी ले गये थे।
      वे उन दिनों लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे और देश के प्रमुख राज्य की राजधानी के प्रमुख स्टेशन पर कार्यरत रहते हुए भी विपुल लेखन करते थे। उन दिनों आरक्षण की आज जैसी सुविधा नहीं थी तथा मुझे ट्रेन में स्थान दिलाने की व्यवस्था उन्होंने दर्ज़नों बार की। वे यह बताना भी नहीं भूलते थे कि उनके कार्यालय की जिस कुर्सी पर मैं बैठा हूं उसी पर परसों कमलापति त्रिपाठी बैठे थे। ऐसी बातें सुन कर गर्व होता था। उन्होंने मुझे यह भी बताया था कि इतना लेखन करने के बाद भी उन्होंने कभी लेखन के लिए नौकरी से छुट्टी नहीं ली। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, माधुरी आदि उस समय की राष्ट्रव्यापी लोकप्रिय पारिवारिक पत्रिकाएं थीं जिनके होली. दिवाली, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, आदि अवसरों पर निकलने वाले विशेषांक के पी की रचनाओं के बिना पूरे नहीं होते थे। वे लखनऊ के दो प्रमुख दैनिक अखबारों में साप्ताहिक स्तम्भ लिखा करते थे, और देश भर की हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं की माँग को पूरा करते थे। जब दूरदर्शन और इतने सारे प्राईवेट चैनल नहीं थे तब आकाशवाणी के हास्य व्यंग्य के रेडियो नाटक बहुत चाव से सुने जाते थे और के पी उनके प्रमुख लेखकों में से एक थे। बाद में उन्होंने टीवी के लिए भी लिखा। हास्य व्यंग्य के नाटकों के अलावा उन्होंने कुछ गम्भीर नाटक भी लिखे हैं जिनमें से एक पर कभी मेरे अनुजसम मित्र इंजीनियर राजेश श्रीवास्तव ने लघु फिल्म बनानी चाही थी। उनसे अनुमति लेने के लिए हम लोग उनके ग्वालियर प्रवास के दौरान प्रदीप चौबे के निवास पर गये थे पर उन्होंने यह कहते हुए अनुमति देने में असमर्थता व्यक्त की थी क्योंकि उस नाटक पर फिल्मांकन की अनुमति वे पहले ही ओमपुरी को दे चुके थे। उस नाटक के कई भाषाओं में हुए अनुवाद और उसके प्रभाव में घटित घटनाएं भी उन्होंने विस्तार से बतायी थीं जिससे उनके व्यक्तित्व के कुछ अनछुये पहलू ज्ञात हुये थे। शरद जोशी के साथ उन्होंने भी कवि सम्मेलनों में गद्य व्यंग्य पाठ प्रारम्भ किया था और अपने क्षेत्र में वर्षों सक्रिय रहे।
      बाद में वे फिल्म लेखन से जुड़े और लगान जैसी बहुचर्चित और बहुप्रशंसित फिल्म भी लिखी जो अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार लेने के साथ आस्कर पुरस्कार तक के लिए नामित हुयी थी। पिछले दिनों में कादम्बिनी के पुराने अंक पलट रहा था तो एक अंक में मुझे केपी सक्सेना का नींबू के गुणों पर लिखा एक लेख मिला। उससे मुझे याद आया कि उन्होंने धर्मयुग में रेलवे गार्डों की चुनौतीपूर्ण कार्यपद्धति से लेकर ‘शरबत का मुहर बन्द गिलास- दशहरी आम’ तक पर मुख्य लेख लिखा था। वे वनस्पति शास्त्र में स्नातकोत्तर थे।
      लखनऊ के दौरान हुयी मुलाकातों के दौर में एक बार उन्होंने कहा था कि वे ऐसे किसी पत्र पत्रिका के लिए नहीं लिखते जो लेखक को पारिश्रमिक नहीं देती। उनका कहना था कि पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में प्रकाशक को कागज़ वाला मुफ्त में कागज़ नहीं देता, कम्पोज़िंग सैटिंग वाला मुफ्त में काम नहीं करता, मुद्रक अपनी दर से भुगतान लेता है, डाकवाले अपना पूरा शुल्क वसूलते हैं और हाकर अपना कमीशन लेते हैं, तो फिर लेखक ही ऐसा क्यों रहे जो मुफ्त में अपनी रचना दे, और अपना अवमूल्यन कराये। उनके इन विचारों के प्रभाव में मैंने भी कई वर्षों तक ऐसी किसी पत्रिका के लिए नहीं लिखा जिसके परिणाम स्वरूप साहित्यिक [लघु] पत्रिकाओं से कटा रहा।
      एक बार वे अमीनाबाद में एक पत्रिका की दुकान पर अचानक मिल गये और तपाक से बोले कि बहुत दिनों से तुम्हरी कोई रचना नहीं पढी, आजकल कहाँ व्यस्त हो! विडम्बना यह थी कि उस सप्ताह और माह की अनेक प्रमुख पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित थीं जिन्हें मैंने वहीं दिखा भी दीं। फिर हँसते हुए बोले कि बुरा मत मानना मैं लिखने और नौकरी में इतना व्यस्त रहता हूं कि दूसरों की रचनाएं कम ही पढ पाता हूं, अब ये सारी रचनाएं पढूंगा।
      उनकी हस्तलिपि बहुत सुन्दर थी। बिल्कुल टंकित से छोटे सुन्दर और साफ स्पष्ट अक्षरों से उनका लिखा अलग से पहचाना जा सकता था। अपनी व्यस्तताओं के बाद भी वे पत्रों के उत्तर देने का समय निकाल लेते थे। उनके व्यंग्यों में लखनऊ की तहज़ीब उफनती थी जिनमें मिर्ज़ा नामक एक पात्र तो लखनऊ की मिलीजुली संस्कृति और मुहब्बत से सराबोर नौक झोंक का प्रतीक बन गया था। पुरस्कारों सम्मेलनों ने उनके दायित्व को बढाया और पद्मश्री मिलने के बाद उन्होंने लगान जैसी फिल्म लिखी।
      उनकी रचनाओं के संकलनों के पुस्तकाकार प्रकाशन तो बहुत हुये किंतु उन्होंने जो भी लिखा वह फुतकर ही लिखा। किताब के लिए लिखी गयी उनकी किताबें कम ही होंगीं। वे सरल, सहज, बोधगम्य और रोचक लिखते थे। उनकी रचनाएं एक बार में ही पढी जाने वाली संतुलित आकार की होती थीं। हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी और रवीन्द्र नाथ त्यागी, के बाद व्यंग्य लेखन में जो नाम आते हैं उनमें केपी का नाम प्रमुख नामों में एक है।
      श्री से. रा. यात्री की तरह ही वे अपने नाम के संक्षिप्तीकरण से इतने विख्यात थे कि बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि के.पी का पूरा नाम कालिका प्रसाद सक्सेना था जो किसी किताब या पत्र पत्रिका में कभी नहीं लिखा गया। जब भी उनका समग्र लेखन रचनावली के रूप में प्रकाशित होगा तो वह आकार में अनेक रचनावलियों को पीछे छोड़ देगा।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.]
मो. 09425674629