रविवार, अप्रैल 15, 2012

और वे जो मूर्ख नहीं हैं काटजू साहब .............


और वे जो मूर्ख नहीं हैं काटजू साहब ....                   
वीरेन्द्र जैन
                मैं आदरणीय मार्कण्डेय काटजू साहब के दृढ व्यक्तित्व और निर्भीक फैसलों का प्रशंसक रहा हूं। मैंने अपने ब्लाग पर उनके फैसलों के सम्बन्ध में जो लेख लिखा था वह मेरी अब तक की पोस्टों में सबसे अधिक पढी जाने वाली पोस्ट है। वे बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात साफ साफ कहते हैं और यह मुखरता लोगों को आकर्षित करती है। इस मुखरता से ऐसा लगता है कि वे अपनी लोकप्रियता की चिंता किये बिना अपने विचार से समाज को मथना चाहते हैं। आज के दुहरे चरित्र वाले समाज में ऐसे नेतृत्वकारी लोगों की सबसे अधिक जरूरत है।
      एक लोकतांत्रिक समाज में यह भी जरूरी है कि हम दूसरे के विचारों को भी सुनने और समझने के लिए उतना ही स्थान दें जितना कि हम अपने विचारों के लिए चाहते हैं। दुनिया में कोई पुस्तक अंतिम पुस्तक नहीं हो सकती और कोई विचार अंतिम विचार नहीं हो सकता। देश और काल के अनुसार विचारों में सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। भारत में जन्म लेने वाले धर्म इसीलिए दूसरे धर्मों से अधिक लोकतांत्रिक हैं क्यों कि उनके यहाँ कोई पुस्तक अंतिम पुस्तक नहीं है और कोई अवतार, तीर्थंकर अंतिम नहीं है अपितु एक के विचारों को सुधारते हुए दूसरे अनेक लोग क्रमशः आते रहे हैं और अपनी बात रखते रहे हैं। महावीर स्वामी का अनेकांत तो लोकतंत्र का मूलमंत्र है जिसमें सत्य को देखने वाले के दृष्टिकोण पर ही निर्भर माना गया है और किसी एक विचार पर जोर नहीं दिया गया है। मैं उम्मीद करता हूं कि काटजू साहब जिस दृड़ता के साथ अपनी बात रखते हैं उतनी ही उदारता से दूसरे की बात भी सुनना पसन्द करते होंगे।
      सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में अपने फैसलों और प्रैस परिषद के अध्यक्ष के रूप में प्रैस, प्रैस मालिकों, और सरकारों के सम्बन्ध में निर्भीक  समीक्षात्मक बयानों के बाद अब उनका कहना है कि “भारत के नब्बे प्रतिशत लोग मूर्ख हैं, क्योंकि उनके दिमाग में अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता और जातीयता भरी हुयी है। वे इसी आधार पर वोट देते हैं, ऐसे ही लोगों ने फूलन देवी तक को लोकसभा में इसलिए पहुँचा दिया था कि वह पिछड़ी जाति की थी।“  उनका यह बयान वोटों से जुड़ा है इसलिए यह लोकतांत्रिक पद्धति से भी जुड़ा है, और उस पद्धति से चुनी गयी हमारी विभिन्न सरकारों पर भी टिप्पणी करता है। परोक्ष में यह बयान एक राजनीतिक बयान है। हमने जब लोकतांत्रिक पद्धति पर विचार किया था तब भी यह प्रश्न उठा था कि एक सुशिक्षित और एक कम पढे या निरक्षर को भी उसी ताकत के एक वोट का अधिकार देना कितना उचित है। याद कीजिए अकबर इलाहाबादी का वह शेर जिसमें उन्होंने कहा था कि-
” जम्हूरियत वो तर्जे हुकूमत है कि जिसमें
बन्दों को गिना करते हैं तौला नहीं करते।“
      भले ही उन्होंने अपने बयान को केवल एक उदाहरण तक ही सीमित रखा है पर उनके बयान की सीमा दूर तक जाती है। उसमें सबसे अधिक विकासशील होने का दावा करने वाला राज्य गुजरात और वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आते हैं। बिहार जैसे सम्भावनाशील राज्य में दो बार मुख्यमंत्री बनने वाली राबड़ी देवी भी आती हैं। झारखण्ड के निर्दलीय मुख्यमंत्री मधु कौड़ा भी आते हैं और आजन्म कारावास की सजा पाये केन्द्रीय मंत्री भी आते हैं। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुने जाने वालों में भाजपा, शिव सेना, अकाली दल, मुस्लिम लीग, जातीय आधार पर चुनाव जीतने वालों में मायावती, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, से लेकर सैकड़ों छोटे छोटे दल आते हैं। जो इन घेरों में सीधे सीधे नहीं आते उनमें से भी कितने लोग ऐसे हैं जो ढोंगी बाबा, वैरागियों, गुरुओं. मठों, मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, से आशीर्वाद लेकर चुनाव के मैदान में उतरते हैं। ऐसे लोग जीतने के बाद तथा धर्म निरपेक्ष संविधान की शपथ लेने से पहले और बाद में अपनी जीत के लिए इन्हीं अवैज्ञानिक धर्मस्थलों की कृपा और बाबाओं के आशीर्वाद को जिम्मेवार बतलाते हैं। ऐसा करते समय वे उन्हें समर्थन देने वाली जनता और चुनाव प्रचार करने वाले कार्यकर्ताओं तक को भूल जाते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि काटजू साहब का बयान हमारी लोकतांत्रिक पद्धति को उसकी कमजोरियों के कारण खारिज करता है और परोक्ष में उस पद्धति से चुनी गयी सरकारों को भी खारिज करता है। उनकी इन पंक्तियों के बीच में छुपी पंक्तियों से ध्वनि निकलती है कि इस देश के बहुमत को धन व बाहुबल से प्रभावित करके व धोखों से भ्रमित करके वोट गिरवा लिये जाते हैं। इस तरह से जुटाये गये समर्थन से चुने गये दलों [गिरोहों] द्वारा फौज और पुलिस के बल से नियंत्रित किया जा रहा है और जो कुछ निहित स्वार्थों के लिए काम कर रहा है। न्याय व्यवस्था में आयी कमजोरियों पर तो काटजू साहब पहले ही कठोर टिप्पणियां कर चुके हैं।
      बिडम्बना यह है कि काटजू साहब जिस दस प्रतिशत को साम्प्रदायिकता, जातिवाद, और अन्धविश्वास से मुक्त मान कर सही मतदाता मानते हैं, उनमें से अधिकांश इस मतदान की निरर्थकता से अवगत हैं और इसीलिए मतदान करने ही नहीं जाते हैं। जो जाते हैं उनमें से भी बड़ी संख्या में लोग खुद भी अन्धविश्वास, जातिवाद और साम्प्रदायिकता के दुष्प्रभाव में हैं। हमने जिस राज्यसभा को कथित दस प्रतिशत मतदाताओं के मतों से चुनवाने की व्यवस्थाएं की हैं उनमें कैसे कैसे लोग कैसे कैसे चुने जाते हैं इसका नमूना तो अभी झारखण्ड में स्थगित किये गये राज्यसभा चुनाव में देख ही चुके हैं या शाहों के शासन के बिना भी शाही इमाम बने घूमते इमाम बुखारी द्वारा अपने रिश्तेदारों को राज्यसभा और विधान परिषद में भेजने के लिए की गयी कवायद से चल जाता है। वैसे भी ऐसा कौन सा बड़ा उद्योग समूह नहीं है जिसके दो चार लोग राज्यसभा या लोक सभा में नहीं हों। झारखण्ड जैसे छोटे राज्य तो इसकी मण्डी बन चुके हैं जहाँ सेदूर दूर से आकर उद्योगपति स्वयं या अपने पालतू लोगों को चुनवा देते हैं। किसी भी दल में उम्मीदवारी के लिए कोई तयशुदा घोषित आचार संहिता नहीं है और हाईकमान के नाम पर सौदेबाजों को भेज दिया जाता है व प्राप्त धन को चुनावों में झौंका जाता है। विजय माल्या जैसे धन कुबेरों को कर्नाटक में सक्रिय सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिल जाता है।
      काटजू साहब के बयान से जो स्वर निकलता है वह व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन की माँग करता है। पिछले कुछ चुनाव आयुक्तों के सतत सफल प्रयासों के बाद भी चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है जो लोगों को राजनीतिक रूप से चेतना सम्पन्न करके ही किया जा सकता है पर तात्कालिक व्यवस्था से लाभांवित होने वाले व्यवस्था नहीं बदलवाना चाहते हैं। जिन साम्प्रदायिक और जातीय दलों को जनता की राजनीतिक चेतना से नुकसान की सम्भावना है वे इसे विकसित ही नहीं होने देना चाहते।
      हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चुनौती आने पर इसी नब्बे परसेंट ने  जातीयता और साम्प्रदायिकता को भुला कर तानाशाही को परास्त किया था। इसके लिए 1977 में और 1989 को याद किया जा सकता है जब इसने कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया था और साम्प्रदायिक दलों को अवसर नहीं दिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जातिवाद, साम्प्रदायिकता, और अन्धविश्वास, सही राजनीतिक कार्यक्रम के अभाव में स्थान बनाते हैं। ये ही क्यों इस अभाव में तो पुराने राजे महराजे, राजमाताएं, राज पुत्रियां, लोकप्रिय फिल्मी कलाकार, मशहूर क्रिकेट या हाकी खिलाड़ी, साधु साध्वियों के भेष में रहने वाले राजनेता भी चुनावों की दिशा को मोड़ देते हैं।
      काटजू साहब की चिंताएं सही हैं पर उन्हें निर्धनों की मजबूरियों को भी समझना चाहिए। गान्धीजी के बाद कोई भी राजनीतिक दल या नेता ऐसा नहीं हुआ जिसने राजनीति के साथ साथ सामाजिक सुधार के अलोकप्रिय काम को हाथ में लिया हो। जातिवाद या अन्धविश्वास के सहारे सत्ता से जुड़ने का प्रयास करने वाले ही नब्बे प्रतिशत को ऐसा ही बनाये रखना रखना चाहते हैं, अपितु उन्हें अधिक से अधिक इसमें उलझाना चाहते हैं। वैसे यह सूचना का युग है और अगर काटजू जैसे लोगों का समूह सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुमत तक अपना सन्देश पहुँचा सका तो बेचैन जनता तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की टीम तक को समर्थन देने के लिए उतावली देखी गयी है।
वीरेन्द्र जैन
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म.प्र. भाजपा - प्र्देश कार्यसमिति की बैठक में उमा भारती की अनुपस्थिति


म.प्र. भाजपा
प्रदेश कार्यसमिति की बुन्देलखण्ड में बैठक और उमा भारती की अनुपस्थिति
वीरेन्द्र जैन
      मध्यप्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देखने वाली भाजपा ने अपनी कार्यसमिति की बैठक, अयोध्या के बाद रामलला का दूसरा स्थान माने जाने वाले ओरछा में की और इस बैठक में भाजपा को बुन्देलखण्ड में जगह दिलाने वाली उमा भारती को झांकने भी नहीं दिया गया। उल्लेखनीय है कि  मध्यप्रदेश की सरकार उमा भारती को कश्मीरी पंडितों की तरह पहले ही प्रदेश निकाला दिला कर गदगद थी और उसके बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्हें चरखारी से टिकिट दिला कर जिताने में चौहान सरकार ने सारी ताकत झोंक दी थी। जिन शिवराज सिंह चौहान पर सुश्री भारती उनकी हत्या कराने का आरोप लगा चुकी थीं, उन्हीं उमा भारती के साथ पहला सार्वजनिक मंच चरखारी में ही साझा किया और भरपूर प्रचार किया। स्मरणीय है कि दिल्ली में हुयी उनकी वापिसी के समय न तो प्रदेश भाजपा का कोई नेता उपस्थित था और ना ही प्रदेश में उनकी वापिसी पर कोई स्वागत समारोह ही किया गया था। उनके विधायकों तक को विधायक दल में सम्मलित करने में महीनों की देर हुयी। नितिन गडकरी को भी जब समझ में आ गया था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार नहीं बनाने जा रही तो उन्होंने उदारता दिखाते हुए जीतने की दशा में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद देने की घोषणा कर दी थी ताकि मतदाता भ्रम में पढ कर उन्हें जिता दे। बिडम्बना यह रही कि जिस मध्य प्रदेश में 2003 में उन्होंने पूरा बहुमत पाया था व कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के बाद वे बहुमत विधायकों का समर्थन पाकर लगातार इस बात के लिए चीखती चिल्लाती रहीं कि मुख्यमंत्री का फैसला लोकतांत्रिक ढंग से बहुमत विधायकों के आधार पर ही होना चाहिए पर उनकी पुकार अरण्यरोदन होकर रह गयी थी। उन्हीं उमा भारती को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में हार सुनिश्चित मान लेने के बाद मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी का झुनझुना पकड़ा दिया था। ऐसा करके सभी कुटिलता से मुस्करा रहे थे, इसलिए ये घोषणा निर्विरोध रही। भाजपा नेताओं का यह सम्मलित प्रयास रंग लाया, उमा भारती चरखारी से चुनाव जीत गयीं, जिससे शिवराज सिंह ने माना कि उनका काँटा निकाल दिया गया है। अब वे इस प्रतीक्षा में मौन साधे हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री होने व घोषित मुख्यमंत्री पद प्रत्याशीके आधार पर उन्हें उत्तर प्रदेश विधान सभा में पार्टी के नेता का पद मिल जाये, पर यह सम्भव नहीं दिखता। इस तरह अब वे घर की हैं न घाट की।
      पवित्र नगरी घोषित ओरछा में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक रखने के पीछे रामलला से पुनर्जुड़ाव का विचार भर नहीं रहा, अपितु उमा भारती के बाद उनका बुन्देलखण्ड में नेता विहीन हो जाना भी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों से संकेत मिलता है कि अलग बुन्देलखण्ड राज्य का विरोध करने के बाद इस क्षेत्र में उन्होंने अपनी लोकप्रियता तेजी से खोयी है। वे फायर ब्रांड कहलाने वाली अतिमुखर उमा भारती की भौतिक उपस्थिति तो नहीं चाहते थे पर उनके प्रभाव का स्तेमाल जरूर कर लेना चाहते थे सो उन्होंने शिवराज सिंह के साथ उमाभारती को पोस्टर में स्थान देने की कृपा जरूर की। स्मरणीय है कि इस प्रदेश सरकार के पितृ पुरुष सुन्दरलाल पटवा ने उमा भारती की आलोचना त्रिया चरित्र कह के की थी, जो अंततः पूरे महिला वर्ग की आलोचना थी।
      भाजपा के चेहरा चाल चरित्र की कहानियाँ तो आज देश भर में ‘सत्य-कथाओं’ को पीछे छोड़ रही हैं, पर इस आयोजन के दौरान ही ओरछा के जिले टीकमगढ नगर पलिका की एक भाजपा पार्षद रानी सोनी ने नगर पालिका और भारतीय जनता युवा मोर्चे के अध्यक्ष राकेश गिरि गोस्वामी पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके वार्ड में विकास कराने की माँग के बदले में गलत इरादे से साथ आने की शर्त रखते हैं। रानी सोनी उमा भारती की बड़ी प्रशंसक रही हैं। जब उसकी बात नहीं सुनी गयी तो उसने प्रैस कांफ्रेंस के दौरान चीख चीख कर गुहार की व  न्याय न मिलने की स्थिति में आत्महत्या करने की धमकी दी। भाजपा का संकट यह है कि अगर उसने चरित्र के आधार पर कार्यवाही करने की कोशिश की तो फिर पूरी पार्टी में इक्का दुक्का युवक ही बचेंगे। 1 नवम्बर 2011 से लेकर 29 फरबरी 2012 के बीच 120 दिन में ही प्रदेश में 103 बलात्कार के मामले प्रकाश में आये हैं और शायद ही कोई ऐसा मामला रहा हो जहाँ किसी भाजपा नेता ने आरोपी की सिफारिश में फोन न किया हो। शहला मसूद कांड में उभर कर आये भाजपा के नेतओं को लोकसभा में भाजपा की नेता सुषमा स्वराज सीबीआई जाँच से पहले ही क्लीन चिट दे चुकी हैं जबकि इसमें स्थानीय विधायक ही नहीं राष्ट्रीय नेता भी सन्देह के घेरे में हैं। अगर मामला स्थानीय पुलिस के पास रहता तो अब तक संजय जोशी कांड की तरह आरोपियों को क्लीन चिट मिल ही चुकी होती। मालवा क्षेत्र की संघ की दो महिला कार्यकर्ता तो स्वयं सेवकों द्वारा दैहिक शोषण की शिकायत भागवत से करने के बाद अब न्याय की उम्मीद खो चुकी हैं। दर्जनों मंत्रियों और मन्दसौर के जिला अध्यक्ष आदि से लेकर स्थानीय स्तर के नेताओं की सैकड़ों कहानियाँ जनता की जुबान पर हैं।
      कार्यसमिति में पधारे प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति के कारण बड़ी संख्या में संवाददाता वहाँ मौजूद थे, पर उनसे बेपरवाह भगवा तौलियाधारी भाजपा कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ ने देशी विदेशी मदिरा की दुकानों की अच्छी बिक्री करवाई। ओरछा के पाँच होटलों के पास बार लाइसेंस हैं और ये सभी भाजपा नेताओं से भरे रहे। इस डिजिटल युग में प्रत्येक गतिविधि रिकार्ड होती रहती है क्योंकि सुरक्षा के नाम पर जगह जगह डिजिटल कैमरे लगे होते हैं। ओरछा के पास पत्थरों की बहुतायत है इसलिए यहाँ पत्थर से गिट्टी तोड़ने वाले क्रेशर बहुतायत में हैं जो सीमित लाइसेंस से कई गुना पत्थर निकालने के रूप में खनिज माफियाओं की गिरफ्त में है। इन माफियाओं ने बदले में समुचित लक्जरी वाहन समेत सभी सुख साधन उपलब्ध कराये हुए थे। जिस गाँव में कभी राहुल गान्धी ने रोटी खायी थी और रात बितायी थी उसी में भाजपा अध्यक्ष ने भी भोजन किया। परा उन्होंने  किसी दलित के घर की रोटी नहीं खायी अपितु ग्वालियर से बुलवाये गये हलवाई द्वारा बनायी गयी रसोई से भोजन किया जिसमें  तरह तरह के लजीज व्यंजन थे।
      भाजपा के प्रदेश महामंत्री की प्रैस कांफ्रेंस में तेरह बार बिजली गुल हुयी और जिसने सरकार के प्रबन्धन की स्थिति बता दी। वैसे तो पूरे कार्यक्रम के दौरान जनरेटर लगे थे जिन्होंने एयर कंडीशंड पंडाल में कोई तकलीफ नहीं होने दी, पर बिजली का आना जाना तो पता चलता ही रहा। ऐसे संकेत बार मिल रहे हैं कि शिवराज सिंह चौहान से मुख्यमंत्री पद छूट रहा है। गत दिनों एक समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित  महिलाओं पर केन्द्रित एक पत्रिका के विमोचन के अवसर पर उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री का पद तो आना जाना है पर मैं बेटियों को बचाने के लिए जिन्दगी भर काम करता रहूंगा। कार्यसमिति की बैठक के समाप्त होने वाले दिन मुख्यमंत्री देर रात में संघ के भोपाल मुख्यालय समिधा में गये और विशेष चर्चा में भाग लिया। स्मरणीय है कि चुनाव के लिए भाजपा ने दिन गिनना शुरू कर दिया है और छवि सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत इसी दिन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल ने प्रदेश नेतृत्व को विवादस्पद मंत्रियों, विधायकों के स्थान पर साफ सुथरी छवि वालों को जगह देने देने की घोषणा की थी जब कि मुख्य मंत्री के सबसे निकट के 14 मंत्रियों पर बेहद गम्भीर आरोप हैं। आयकर विभाग उनके निकट के लोगों के यहाँ छापा मारकर करोड़ों रुपये, सोना, और कागजात बरामद कर चुका है । इन्हें लोकसभा का चुनाव होने तक मंत्री बनने से रोक लिया गया था, पर उसके बाद तो उन्होंने दोनों हाथों से लूट मचा दी थी।
      पूरा प्रदेश साँस रोके किसी बड़ी करवट की प्रतीक्षा कर रहा है।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

हाफिज सईद के लिए घोषित इनाम के कई आयाम सम्भव हैं


            हाफिज़ सईद के लिए घोषित इनाम के कई आयाम सम्भव हैं
                                                                      
 वीरेन्द्र जैन
                काल का अपना महत्व होता है। कोई घटना किस काल में घटित होती है उससे उसके बहुत सारे अर्थ प्रकट होते हैं। पिछले दिनों सच्ची घटना पर आधारित बहुचर्चित फिल्म ‘नो वन किल्लड जेसिका’ में बताया गया है कि यदि एक मीडिया हाउस में किसी बड़ी स्टोरी की गतिविधियां चलती हैं तो बहुत सारी दूसरी खबरें दबी रह जाती हैं, यदि जेसिका लाल की हत्या का फैसला कारगिल के युद्ध के समय आया होता तो शायद इतिहास बनाने वाली वह कहानी दबी ही रह जाती। पिछले दिनों सन्युक्त राज्य अमेरिका ने 26/11/2008 के मुम्बई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद की सूचना देने वाले के लिए एक करोड़ डालर अर्थात लगभग पचास करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनाम घोषित किया है। घटना के चालीस महीने बाद हुयी इस घोषणा के समय से सवाल उठता है कि भारत में घटित इस घटना पर यह इनाम अमेरिका ने अब क्यों घोषित किया। स्मरणीय है कि पाकिस्तान की सार्वभौमिकता का उल्लंघन करते हुए ओसामा बिन लादेन को मारने में सफल हुए अमेरिका को अपेक्षाकृत एक छोटे आतंकी को मारने के लिए बड़ी इनामी राशि का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है।
      किसी भी आतंकी हमले का कोई न कोई छुपा लक्ष्य रहता है । 26/11 की घटनाओं पर दृष्टि डालने पर हम पाते हैं कि कसाब से भरपूर पूछताछ के बाद भी अभी तक हम इस हमले के लक्ष्य का खुलासा नहीं कर सके हैं। यह आतंकी हमला दूसरे हमलों की तरह नहीं था जिसमें आतंकवादी चोरी छुपे कहीं बम रख कर उसमें विस्फोट कर देते हैं जिससे आम निर्दोष नागरिकों की म्रत्यु होने से पूरे क्षेत्र में बड़ी अफरा तफरी मच जाती है, जिससे सरकार के खिलाफ माहौल बन जाता है। इसमें आतंकी भी जहाँ तक सम्भव होता है सुरक्षित रहता है। किंतु 26/11 का उक्त हमला एक ऐसा हमला था जिसमें एक देश दूसरे देश के सामारिक मह्त्व के स्थानों को नष्ट करने के लिए करता है और इसमें भाग लेने वाले जाँबाज अपनी जान की परवाह किये बिना अपना लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। सामाजिक शांति भंग करने वाले आतंकी हमले गोपनीय ढंग से ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर किये जाते हैं जहाँ ज्यादा से ज्यादा जनता के लोग मारे जाएं और बदले में वे आपस में ही लड़ने लगें। पर सम्बन्धित घटना में दस केन्द्रों पर गोली बारी हुयी जिसमें सार्वजनिक स्थान पर अँधाधुन्ध गोली बारी का क्षेत्र छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन ही था जिसमें 58 निर्दोष नागरिक मारे गये थे। इसके अलावा पुलिस से हुए सीधे सामने में, टाइम्स आफ इंडिया बिल्डिंग के पीछे हमलों में 9 पुलिसमैन, कामा हास्पिटल में किये हमले में 5 पुलिस मैन, मारे गये थे। आतंकियों के काउंटर अटैक में ताज होटल में एक कमांडो, और नरीमन हाउस में एक कमांडो मारा गया था। दोनों ओर से चली गोलियों में मेट्रो सिनेमा के पास दस और लेओपेड कैफे के पास दस लोग मारे गये थे। विले पार्ले के पास कार विस्फोट में एक व्यक्ति मारा गया था व मुम्बई हार्बर में चार बन्दी बनाये गये लोग मारे गये थे। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर अंधाधुन्ध हमला शायद लक्ष्यित स्थानों से सुरक्षा बलों का ध्यान भटकाने के लिए किया गया था। इसमें मरने वाले सभी समुदायों के लोग थे, जिसमें दस मुस्लिम भी थे। इससे ये संकेत मिलते हैं कि आतंकियों का लक्ष्य कुछ भिन्न था।
      मूल हमला ताज और ओबेराय होटलों तथा इजरायलियों के रहने वाला क्षेत्र नरीमन हाउस था। इस बात को याद करना जरूरी है कि आतंकियों ने ताज और ओबेराय होटलों में सबसे पहले बन्दूक की नोक पर विदेशियों और विशेष रूप से अमेरिकियों व ब्रिटिश नागरिकों को अलग होने के आदेश दिये थे, व इटली के नागरिक को छोड़ दिया था। ताज होटल में तीस, ओबेराय होटल में तीस और नरीमन हाउस में छह लोग मारे गये थे। मरने वालों में 28 विदेशी थे जिनमें चार अमेरिकन, दो इजरायली-अमेरिकन, एक ब्रिटिश, और दो इजरायली नागरिक थे। विशेष रूप से केन्द्रित हमले के कारण यह आशंका निर्मूल नहीं है कि हमलावरों को इनमें किसी अभियान के सिलसिले में ठहरे अमेरिका और ब्रिट्रेन की गुप्तचर एजेंसियों के सदस्यों के शामिल होने की उम्मीद हो।  स्मरणीय है कि अमेरिका ने आतंकियों को मारने के अभियान में सबसे आगे बढ कर अपनी सुरक्षा एजेंसी के सदस्यों को मदद के लिए भेजने की पेशकश की थी जिसे भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया था। यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या तब तक अमेरिका को लादेन के पाकिस्तान में छुपे होने का पता लग चुका था और क्या उसकी सुरक्षा एजेंसियां ताज होटल मुम्बई को हैड क्वार्टर बना कर इजरायलियों के साथ कोई योजना बना रही थीं  जिसकी भनक पाकिस्तान में रह रहे आतंकियों को लग चुकी हो! स्मरणीय है कि इससे ठीक पहले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में विदेशियों के ठहरने वाले मेरिअट होटल में आत्मघाती बम से विस्फोट और आगजनी हो चुकी थी जिसमें चालीस जानें गयी थीं और पूरे होटल में आग लग गयी थी। 26/11 के बाद में भी अमेरिका में स्वतंत्र रूप से जाँच चली जिसमें उन्होंने जेम्स हेडली चेज को गिरफ्तार किया, पूछ्ताछ की व भारत की पूछ्ताछ पर बड़ी मुश्किल से राजी हुआ।
      अमेरिका द्वारा इतना बड़ा कदम उठाने से ऐसा लगता है कि यह घटना और इसमें मारे गये अमेरिकन इजरायली और ब्रिटिश नागरिक अमेरिका के लिए कुछ विशेष महत्व रखते थे, अन्यथा कई दूसरी आतंकी घटनाओं में भी अमेरिकन नागरिक मारे गये हैं। यदि अमेरिका किसी विशेष अभियान के लिए मुम्बई को हैड क्वार्टर बना कर काम कर रहा था तो क्या यह बात भारत की जानकारी में थी और उसका खुलासा अब तक क्यों नहीं हुआ? अब जब ओसामा बिन लादेन की म्रत्यु को भी लगभग एक साल होने को आ रहा है तब अचानक हाफिज सईद की सूचना के लिए पचास करोड़ रुपयों का इनाम कई सवाल खड़े करता है। हाफिज सईद तो ओसामा की तरह छुप कर भी नहीं रहता, वह पाकिस्तान में सरे आम बड़ी बड़ी रैलियां करता है व पाकिस्तान के सत्ता तंत्र व कई राजनीतिक दलों का उसे समर्थन प्राप्त है। मुम्बई हमलों के बाद पाकिस्तान में उसे गिरफ्तार भी किया गया था पर बाद में बिना कोई केस दर्ज कराये उसे छोड़ दिया गया था। क्या अमेरिका समझता है कि इस धन के लालच में कोई उसे मार देने  का दुस्साहस करेगा। जबकि यह तय है कि इस दुस्साहस के बाद पाकिस्तान की सरकार उसे सुरक्षा नहीं दे पायेगी। अमेरिका जो पाकिस्तान का पुराना दोस्त रहा है वह पाकिस्तान से सीधे सीधे क्यों नहीं कह सकता कि वह हाफिज सईद को गिरफ्तार करके उस पर मुकदमा चलाये। यह स्पष्ट नहीं कि अमेरिका इस घोषणा से किसको बहलाना चाहता है? या भारत को यह सन्देश देना चाहता है कि अब वह पाकिस्तान का मित्र नहीं है और अफगानिस्तान से निकलने के बाद वह उसे पाकिस्तान को सौंप कर नहीं जाने वाला।
      निश्चित रूप से इस इनाम के गूढार्थ हैं जो बाद में सामने आयेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, अप्रैल 05, 2012

चुनावी निष्कर्ष और भारतीय लोकतंत्र


चुनावी निष्कर्ष और भारतीय लोकतंत्र
वीरेन्द्र जैन
      हमारे देश में चुनावों में विजय की सम्भावनाओं और चुनाव परिणामों के बाद उनके निष्कर्ष निकालने के तरीके बहुत किताबी हैं। जबकि सच तो यह है कि जनता की लोकतांत्रिक चेतना और राजनीतिक दलों में कार्य प्रणाली का विकास् अभी बहुत ही प्रारम्भिक अवस्था में है तथा निरंतर जारी चुनाव सुधारों के काम में अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकी है। बड़ी संख्या में निरक्षरता, हर समय बदलती रहने वाली चुनाव प्रणाली का अज्ञान, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रवाद, सामंतवाद, लोकप्रियतावाद, धनबल, बाहुबल, सत्तारूढ नेताओं से उम्मीदें, पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग, आतंकवाद, आदि अनेक कारण हैं जो चुनावों को प्रभावित करते हैं और जिनकी गणना कर निष्कर्ष निकालना फिलहाल सम्भव नहीं है। लाल बुझक्कड़नुमा हमारे चुनाव विश्लेषक राजनीति के गूढ सिद्धांतों, चुनावी घोषणाओं, और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के आधार पर जीत हार का फैसला सुनाते रहते हैं जो आम तौर पर सही नहीं होता और जहाँ तुक्का लग जाता है वहाँ वे उसमें सफलता का प्रतिशत निकाल यह नहीं बताते कि जहाँ वे गलत सिद्ध हुए हैं वहाँ कौन सी सिद्धांतिकी लागू कर रहे हैं।
      हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के बारे में विश्लेषणों की बाढ आ गयी है और ये विश्लेषण मतदाता की जगह विश्लेषणकर्ता की पसन्दगी या कल्पना पर आधारित हैं। अगर पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों में से एक उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के विश्लेषणों को देखें तो हम पाते हैं कि इनके द्वारानिम्नांकित निष्कर्ष निकाले गये हैं-
·         बहुजन समाज पार्टी साफ हो गयी है
·         लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक वोट दिया है
·         कांग्रेस का सूफड़ा साफ हो गया है
·         राहुल गान्धी की कलई खुल गयी है
·         हार के लिए कांग्रेस के प्रभारी दिग्विजय सिंह जिम्मेवार
·         कांग्रेस का बुन्देलखण्ड पैकेज, मुस्लिम आरक्षण का शगूफा, और बुनकरों को दिया पैकेज बेअसर
·         अखिलेश के नेतृत्व को पसंद किया गया है
·         समाजवादी पार्टी को व्यापक समर्थन मिला है
आदि आदि आदि
    आइए अब निष्कर्षों की हकीकत देखें-
·         बहुजन समाज पार्टी को इन चुनावों में उत्तर प्रदेश में सैंतीस लाख पचहत्तर हजार वोट पिछले चुनावों से ज्यादा मिले हैं, अगर इसे किसी सरकार की लोकप्रियता को पैमाना माना जाये तो विश्लेषक लोग किस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे? क्या इसका मतलब ये नहीं निकाला जा सकता कि एक एक करोड़ छियानवे लाख बीएसपी के मतदाताओं को मायावती के भ्रष्ट प्रशासन से कोई शिकायत नहीं थी। इसके बाद भी उनके न केवल अस्सी उम्मीदवार जीते हैं, जो भाजपा और कांग्रेस के कुल विधायकों की संख्या से ज्यादा हैं, अपितु 209 उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर रहे हैं।
·         जब चारों प्रमुख दलों के सदस्यों पर लगभग समान अनुपात में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं तो यह कैसे माना जा सकता कि लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक वोट दिया है
·         प्रत्येक दक्षिण पंथी, मध्यममार्गी पार्टी चुनावों के दौरान अपने समर्थकों में उत्साह बनाये रखने के लिए न केवल जीत का अपितु सरकार बनाने का भी दावा करती है जबकि उसके नेता सच्चाई से खूब परिचित होते हैं। कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया था। उसने राष्ट्रीय लोकदल के लिए बारह प्रतिशत सीटें छोड़ी थीं और फिर भी पिछले चुनावों में प्राप्त कुल वोटों से लगभग दुगने वोट पाये और सीटों में भी तीस प्रतिशत की बढोत्तरी दर्ज की, जबकि उसे केन्द्र में सत्तारूढ होने की एंटी इंकम्बेंसी, गठबन्धन के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खुलासे, मँहगाई की वृद्धि आदि समस्याओं से भी सामना करना पड़ा।
·         राहुल गान्धी स्टार प्रचारक थे इसलिए उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ से प्रैस को गलतफहमी होना स्वाभाविक थी और यही कारण है कि भीड़ को देखकर ही विभिन्न संचार माध्यमों ने भी कांग्रेस को लगभग अस्सी सीटें मिलने की उम्मीद की थी। राहुल गान्धी सीधे चुनाव में नहीं थे जबकि अखिलेश, मायावती, उमाभारती आदि पूर्व से ही घोषित मुख्यमंत्री की तरह थे। उल्लेखनीय यह भी है कि बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, राज बब्बर, अजरुद्दीन, पी एल पूनिया, ही नहीं सोनिया गान्धी के निर्वाचन क्षेत्र से भी कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका।
·         यद्यपि इसमें कोई सन्देह नहीं कि दिग्विजय सिंह ने भी उत्तर प्रदेश के प्रभावी होने के नाते काफी मेहनत की और धर्मनिरपेक्ष एजेंडे को सामने रख कर ही कांग्रेस के मत प्रतिशत में वृद्धि करवायी, पर इस प्रयास में वे सीधे सीधे साम्प्रदायिक शक्तियों के निशाने पर आ गये। ये शक्तियां किसी भी तरह कांग्रेस के अन्दर और बाहर दिग्विजय सिंह को नुकसान पहुँचाना चाहती हैं इसलिए चुनाव परिणामों में हुए सुधार को न देख कर इस हार को पूरी तरह से उन पर थोपना चाहती हैं। सच तो यह है कि उन्होंने सदैव ही स्थिति में सुधार का दावा भर किया था जो मिली है।
·         बुन्देलखण्ड पैकेज चुनावों से एक साल डेढ साल पहले आया था पर उसे भी मुस्लिम आरक्षण और बुनकरों को दिये गये पैकेज के साथ जोड़ कर उसके बेअसर होने की तरह देखा जा रहा है। चुनावों से पहले दिये गये प्रलोभनों का असर अगर होता तो मायावती द्वारा अठारह मंत्रियों के निष्कासन का लाभ भी उन्हें मिलना चाहिए था जो नहीं मिला। कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में सचमुच ही उस संगठन का अभाव था जो सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू करवाने और उसका लाभ पार्टी को दिलवाने में समर्थ होता है । वहाँ यह पार्टी, पद पाकर सत्ता के लाभ उठाने की आकांक्षाओं से भरे लोगों की जमात होकर रह गयी है। न उसके पास जाति का आधार है, न साम्प्रदायिकता का इसलिए वह उक्त आधार पर सक्रिय कर दिये गये मतदाताओं के बीच पिछड़ने के लिए अभिशप्त थी।
·         यह मानना सही नहीं है कि अखिलेश के व्यक्तितत्व को पसन्द किया गया है इसलिए समाजवादी पार्टी की जीत हुयी है। अखिलेश के व्यक्तित्व का ऐसा कोई भी गुण चुनावों तक सामने नहीं आया था जिसके कारण उसे दूसरों की तुलना में तरजीह मिलती। अमर सिंह को पार्टी से दूर करने में भी अखिलेश के चाचा रामगोपाल आदि की भूमिका रही, आजम खान को वापिस पार्टी में लाने में भी अमर सिंह का निष्काषन और मुलायम सिंह के झुकने की भूमिका रही। डीपी यादव को पार्टी से दूर रखने में जरूर उनका नाम लिया जाता है किंतु दूसरे वैसे ही बाहुबलियों को टिकिट देने और मंत्री बनने से न रोक पाने के कारण यह कार्य भी निष्प्रभावी हो गया।
·         समाजवादी पार्टी के नाम के साथ भले ही समाजवादी शब्द जुड़ा है और कभी गाहे बेगाहे वे लोहिया का नाम ले लेते हैं किंतु मुलायम सिंह को नेता मानने वाली इस यादववादी पार्टी का पार्टी संगठन, पार्टी लोकतंत्र, सिद्धांतों आदि से दूर का भी रिश्ता नहीं रहा। अमर सिंह के इशारे पर अपने जनसमर्थन को चन्द पूंजीपतियों के घर गिरवी रख कर इसने समाजवाद से दूरी बना ली थी। इस पार्टी की जीत कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी की एंटी इंकम्बेंसी, भाजपा के बहुमुखी पतन, और विश्वसनीय विकल्प के अभाव से मिले समर्थन की अप्रत्याशित,  लाटरीनुमा जीत है। इसमें यादव मुस्लिम जातिवादी वोटों का गठजोड़ मददगार हुआ होगा।     
      लोकतंत्र को चुनावों में मिले वोटों भर से आँका गया तो भूल हो जायेगी। मूल्यांकन तो तब होगा जब कोई सतारूढ पार्टी, पार्टी-कार्यक्रम के अंतर्गत प्रस्तावित समाज सुधार या अपनी सरकार द्वारा लायी गयी किसी योजना को कार्यकर्ताओं की मदद से सफलतापूर्वक लागू करा के दिखा दे। उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस सरकार द्वारा मनरेगा, या शिक्षा के अधिकार की निर्बल वर्ग की हितैषी अच्छी योजनाएं लायी गयी हैं किंतु सत्तारूढ दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा कोई रुचि न लेने के कारण भ्रष्टाचार की शिकार होती जाती हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी तब जीती मानी जायेगी जब वह पार्टी में भरे हुए बाहुबलियों की ऊर्जा और उत्साह को समाजवादी पार्टी के किसी समाज हितैषी कार्यक्रम में लगा सकने में सफल हो सके। बरना ये आँधी के आम हैं तथा हर बार आँधी नहीं आती। 
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 29, 2012

राष्ट्रीय मान्य दल का मुकुट और ज्वलंत मुद्दे पर मौन


राष्ट्रीय मान्य दल का मुकुट और ज्वलंत मुद्दे पर मौन
वीरेन्द्र जैन
      सरकार ने बलवंत सिंह राजोआना की सजा स्थगित कर दी है।
      इस सजा के स्थगन के लिए पंजाब की  भाजपा- अकालीदल गठबन्धन सरकार के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति प्रतिभादेवीसिंह पाटिल से अपील की थी।
      ऐसी अपील करने के लिए उन्हें शिरोमणि गुरुद्वारा समिति ने आदेश दिया था।
      पंजाब सरकार भारत देश का ही एक राज्य है, और भारत देश अपने संविधान के अनुसार एक धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है। पंजाब में एक चुनी हुयी गठबन्धन सरकार है जिसमें भाजपा नामक एक राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल है और अकाली दल नामक एक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल है। राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए या राजग नामक गठबन्धन है जिसमें ये दोनों दल सम्मलित हैं। पंजाब राज्य में राज्य स्तरीय अकाली दल के विधायक संख्या में अधिक हैं इसलिए सरकार बनाने में उसका नेतृत्व रहता है किंतु राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा बड़ा राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल है और नेतृत्व उसका रहता आया है। भाजपा एक हिन्दूवादी दल है और अकालीदल सिखों की पार्टी है। आज से पच्चीस साल पहले सिखों के एक आतंकवादी गुट ने अलग खालिस्तान बनाने के लक्ष्य को लेकर अनेक आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया था। ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने पंजाब के गैर सिखों पर भी अन्धाधुँध हमले किये थे, राष्ट्रीय नेताओं और फौज के अधिकारियों की हत्याएं की थीं फौज की एक टुकड़ी से विद्रोह भी करवा दिया था। पंजाब के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी मारे गये थे। धर्मस्थलों को अड्डा बना लेने के कारण केंन्द्रीय सरकार को आपरेशन ब्ल्यू स्टार करना पड़ा था जिसके प्रतिशोध में देश की लोकप्रिय प्रधानमंत्री की हत्या हुयी थी व जिसके प्रतिशोध के नाम पर देश भर में हजारों बेकसूर सिखों की निर्मम हत्याएं हुयी थीं। अटूट सम्पत्ति और राष्ट्रीय हितों की बरबादी के साथ साथ दोनों तरफ से लगभग पचास हजार लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया है। इस दौरान हिन्दूवादी भाजपा को भी कुछ नुकसान उठाना पड़ा था तथा अकाली दल ने दोहरी भूमिका निभा कर अपने को सुरक्षित रखा था।
       हाल ही में हुए चुनावों में जीत कर आने के बाद भाजपा-अकालीदल गठबन्धन ने उस संविधान की शपथ खाने के बाद सरकार चलाना शुरू की है जिसमें लिखा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। सरकार का कोई भी फैसला पूरे मंत्रिमण्डल का फैसला होता है, इसलिए यह तय है कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंतसिंह की हत्या करने वाले आतंकी बलवंत सिंह को फाँसी की सजा से बचाने के लिए अपील करने वालों में भारतीय जनता पार्टी भी सम्मलित है। उल्लेखनीय यह भी है कि यह फैसला सिख धर्म की सर्वोच्च संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा समिति के आदेश पर लिया ग्या है अर्थात यह धर्मनिरपेक्ष राज्य की रक्षा करने की शपथ का भी उल्लंघन है। रोचक यह है कि भाजपा की तीन प्रमुख माँगों में सभी नागरिकों के लिए एक समान आचार संहिता की माँग भी है जो मुख्य रूप से मुसलमानों को शरीयत के कानून के अनुसार चलने की विशेष छूट के विरोध में है। क्या शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धन समिति के आदेशों के अनुसार चलने वाली सरकार में शामिल होकर और उसके आदेशों पर सहमति व्यक्त करने के बाद उसे समान नागरिक आचार संहिता का सवाल उठाने का हक है?
      कुछ ही महीनों पहले सरकार के खिलाफ भाजपा का प्रमुख मुद्दा आतंकवाद हुआ करता था और इस बहाने से वह सरकार को कटघरे में खड़ा किया करती थी। पर बाद में यह रहस्य खुला कि जिन घटनाओं को अलगाववादी व मुस्लिम आतंकियों के नाम मढ दिया जाता था वे दर असल हिन्दू आतंकियों का कारनामा था। उसके बाद से आतंकवाद, भाजपा का प्रमुख मुद्दा नहीं रहा। बाद में अफजल और कसाब की फाँसी को टालने के नाम पर भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा करती रही और इसे तुष्टीकरण का सस्ता हथकण्डा बतलाती रही। पर अब यही पार्टी न केवल एक ऐसे आतंकी की फाँसी को माफ करने के लिए की गयी अपील में सम्मलित है जिसने अपना अपराध स्वीकार किया है अपितु उसे इसके लिए कोई खेद नहीं है। देशभक्ति का त्रिपुण्ड पोते फिरने वाली भाजपा यह काम पंजाब की सरकार में थोड़ी सी जगह बचाने के लिए कर रही है। एक ओर कश्मीर के अलगाववादियों के खिलाफ कठोर हिंसा का तर्क देने वाली यह पार्टी खालिस्तान आन्दोलन के आतंकियों के लिए फाँसी न दिये जाने की अपील में सम्मलित है। दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचार का विरोध और अपनी सरकारों को न केवल कुतर्कों से बचाने की कोशिश करना अपितु संरक्षण देना भी उसकी प्रकृति में शामिल है।
      जरूरी है कि देशहित के मसलों पर टुच्ची राजनीति न करके सारे दल एक जुट हों और सरकार को कठोर कदम उठाने के प्रोत्साहित करें। जो लोग दूसरों के बच्चों को देश के नाम पर जान देने को भड़काते रहते हैं वे ही अपनी छोटीमोटी सीट के लिए बेपेन्दी के लोटे की तरह लुड़कते रहते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय मान्यता के लिए यह जरूरी शर्त हो कि वह ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दे पर अपने दल की प्रतिक्रिया तुरंत दे । जो ऐसा नहीं करें, उनकी मान्यता को समाप्त किये जाने की जरूरत है।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, मार्च 25, 2012

जेल अधिकारियों के पास दौलत के खजाने - एक विचारणीय प्रश्न


जेल अधिकारी के पास दौलत के खजाने – एक विचारणीय प्रश्न  
वीरेन्द्र जैन
                मध्य प्रदेश में शायद ही कोई सप्ताह ऐसा जाता हो जब किसी अफसर, इंस्पेक्टर, क्लर्क, चपरासी, ठेकेदार, व्यापारी, नेताओं के दलाल आदि के यहाँ आयकर या लोकायुक्त का छापा न पड़ता हो या और उस छापे में अकूत धन सम्पत्ति आदि न बरामद होती हो। बरामद की गयी ये अनुपातहीन सम्पत्ति रिश्वत, कमीशन, आदि के द्वारा अर्जित की जाती है जो या तो अदालत दर अदालत लम्बे चले मुकदमों के बाद वापिस उसी व्यक्ति के पास पहुँच जाती है, या मामूली जुर्माने आदि लगा कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। प्रदेश की जेलें अभी तक दण्डित भ्रष्टाचारियों को कैद रखने के लिए तरस रही हैं। वह सम्पत्ति कैसे कैसे और किस किस के गलत काम कर कर के अर्जित की गयी होती है उसकी कोई पूछ परख नहीं की जाती ताकि भविष्य में उसके रोकने की व्यवस्थाएं की जा सकें। दण्ड देने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी होता है कि दूसरा कोई व्यक्ति वैसी ही गलती करने से डरे, किंतु रोचक यह है कि पकड़े गये व्यक्ति के बाद आने वाला उसका उत्तराधिकारी भी वैसे ही कामों में संलग्न हो जाता है और यदा कदा कुछ समय बाद उनमें से कुछ ऐसे ही पकड़े भी जाते हैं, जिसे वे खेल भावना की तरह लेते हुए कानून के छिद्रों से बच निकलने के रास्ते तलाशने कोई बड़ा वकील करने लगते हैं। स्मरणीय है कि देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त ने सेवा निवृत्ति के अगले दिन ही कहा था कि देश का हर तीसरा आदमी [सरकारी कर्मचारी] भ्रष्ट है। उन्होंने यह भी कहा था कि कुल तीन प्रतिशत भ्रष्टाचारी ही जाँच के दायरे में आ पाते हैं और उनमें से भी कुल चार प्रतिशत पर कानूनी कार्यवाही होती है।
      पिछले दिनों जिन आईएएस आफीसर्स, डिप्टी कलेक्टर्स्, इंजीनियर्स, रजिस्ट्रार, आरटीओ, निरीक्षक, आडीटर्स, स्टोरकीपर्स, एकाउंटेंट, पटवारी, चपरासी, आदि के यहाँ से छापों में जो करोड़ों की रकमें और सम्पत्तियाँ मिली हैं उनके बारे में तो एक अनुमान सा रहता है कि ये सम्पत्तियां कैसे भुगतान की फाइलें रोकने, काम में अड़ंगा लगाने, गलत फैसले लेने, झूठे बिल बनाने आदि के द्वारा बनायी जाती हैं। अगर कोई सरकार चाहे तो पूरा हिसाब करके सारे लेने और देने वालों को एक घेरे में ला सकती है पर ये काम सरकार के कामों की प्राथमिकताओं में नहीं आता जिसका कारण भी मंत्रियों की अनुपात हीन सम्पत्ति वृद्धि को देख कर अनुमानित किया जा सकता है।
       पिछले दिनों इन्दौर की सेन्ट्रल जेल अधीक्षक के यहाँ छापे में जितनी बड़ी मात्रा में सम्पत्तियां मिली हैं वे चौंकाने वाली हैं। इस छापे में पकड़ में आयी सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग पन्द्रह करोड़ है। इनमें भोपाल की पाश कालोनी में तीन आलीशान मकान, एक गर्ल्स हास्टल, चार दुकानें पाँच प्लाट, 14 एकड़ कृषि भूमि व इन्दौर के विकास प्राधिकरण की योजनाओं में दो प्लाट सम्मलित हैं। छापे के दौरान ही सम्बन्धित अधीक्षक के लड़के ने दो लाख रुपयों की पोटली बना कर खिड़की से सड़क पर फेंक दिये जिसे दो पुलिस कानिस्टबलों द्वारा देख लिये जाने से वे बरामद हो गये। अगले दिन जब उनका लाकर खोला गया तो उसमें ग्यारह लाख रुपये बरामद हुये। सवाल उठता है कि जिस जेल अधीक्षक द्वारा कुल अर्जित वेतन 39 लाख के आस पास ही बैठता हो उसके पास 15 करोड़ कीमत की सम्पत्तियां सरकार और कानून को किस तरह से चूना लगा कर एकत्रित हो गयीं!
      जेल जाने के अनुभवों से सम्पन्न विभिन्न व्यक्तियों से जानकारी करने पर ज्ञात हुआ है कि अदालतों द्वारा बमुश्किल दी गयी सजा को धता बता कर ही ये सम्पत्तियां अर्जित की जाती हैं। मुकदमों को लम्बे समय तक टालने के बाद जो भी व्यक्ति जेल पहुँचता है वह अगर पैसे वाला या प्रभावशील हुआ तो जेल में जाते ही बीमार बन जाता है जिससे उसे सिक यूनिट में भेज दिया जाता है जहाँ उसे लेटने के लिए पलंग, कूलर, तथा डाक्टरों द्वारा बताया गया खाना मिलने लगता है, जो जेल में मिलने वाले पशुओं के भोजन के समतुल्य भोजन की तुलना में बहुत शानदार होता है। इस सुविधा की कीमत चुकायी जाती है जो किसी भी पाँच सितारा होटल के कमरे व भोजन से कई कई गुना होती है। पद और पैसे वाले व्यक्ति को जेल के कैदियों से अपनी सुरक्षा भी करना पड़ती है क्योंकि जेल अधिकारियों की मिली भगत से ऐसी परिस्तिथियां बना दी जाती हैं जिस कारण वे ऐसी सुरक्षा लेने के लिए विवश हो जाते हैं। बताया गया है कि जब पुराने खूंखार कैदी गालियां बकते हैं या उन पर हमला कर देते हैं तो जेलर की भाषा में इसे कैदियों की आपसी लड़ाई माना जाता है। अपने खूंखार तरीके से आतंक पैदा करने वाले कुछ कैदी हर जेल में जेलर द्वारा पाले जाते हैं जिनके साथ समझौता करा के जेलर उचित सुविधा शुल्क लेकर अमीर कैदी को, सुरुचिपूर्ण भोजन घर या होटल से मँगवाने की सुविधा दे कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पैसा मिलने पर आदतन अपराधी कैदियों को मोबाइल भी उपलब्ध करा दिया जाता है जिससे वे जेल में बैठे हुए ही जेल से बाहर के दौलतवानों को डराते धमकाते रहते हैं और धर्मस्थल बनवाने आदि के नाम पर पैसे वसूल करते रहते हैं। जाहिर है कि इस वसूली के लिए अपराधी का एजेंट जेलर साहब के लिए भी उचित व्यवस्था करता है। कुछ जिलों में तो अपराधियों को रहजनी करने के लिए रात में छोड़ा भी जाता है ताकि वे कमाई करके ला सकें और पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी नहीं कर सके। गाँव के कई लाइसेंसधारी तो अपनी बन्दूक भी इस काम के लिए किराये पर चलवाते हैं। जब जेलर अपराधी के जेल के अन्दर होने की पुष्टि कर रहा हो तब उसके खिलाफ रिपोर्ट कैसे हो सकती है। सर्वसुविधा सम्पन्न जेल उनकी सुरक्षागाह बनी रहती है।
      कैदियों के भोजन से खूब कमाई की जाती है क्योंकि उन्हें जेल के नियामानुसार भोजन नहीं दिया जाता। बहुत सारे न्यायाधीश तो जेल में गये बिना ही सब ठीक होने की निरीक्षण रिपोर्ट दे देते हैं, जो कैदियों द्वारा बतायी गयी दशा से मेल नहीं खाती।  कैदियों द्वारा किये गये काम का पूरा भुगतान उनके जेल से छूटने पर दिया गया बताया जाता है पर जो आम तौर पर कैदी से दस्तखत लेने के बाद जेल अधिकारियों के पास ही रह जाता है। प्रभावशाली कैदियों को सुविधा शुल्क चुका कर बिना अदालती अनुमति के छुट्टियां मिलती रहती हैं। जो जितना खूंखार अपराधी होता है उसकी छुट्टी उतनी ही मँहगी होती है। देश विरोधी आतंकी घटनाओं के सम्बन्ध में कैद लोगों की उनके लोगों से मुलाकात करा देने की कीमत भी बहुत होती है।       
      एक जेलर का भ्रष्टाचार इसलिए अधिक गम्भीर है क्योंकि इससे समाज में जेल जाने के प्रति भय कम हो जाता है। जब पैसे से जेल में सारी असुविधाओं को निर्मूल किया जा सकता है तो व्यक्ति नैतिक होने की जगह सारा ध्यान किसी भी वैध अवैध तरीके से धन कमाने में लगा देता है। आंकड़े गवाह हैं कि सवर्ण जातियों और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को कम से कम सजाएं मिल सकी हैं तथा जिन्हें कभी भूले भटके मिलती भी हैं उन्हें उनके घर जैसी सुविधाएं मिलती रही हैं। कभी किसी ने मजाक में जेल को ससुराल कहा था किंतु उपरोक्त घटना बताती है कि पैसा होने पर यह सचमुच ससुराल जैसी बन सकती है। बताया गया है कि कतिपय कारागारों में तो सतत जुआ चलता रहता है और सट्टे के नम्बर भी लगते रहते हैं।
      जिस जेल के जेलर के यहाँ छापा मारकर इतनी बड़ी रकम पकड़ी जाती है उसमें ही कुछ खूंखार आतंकी भी बन्द रहते आये हैं। यदि पैसे की दम पर कोई आतंकी जेल से भागने में सफल हो जायेगा तो हमारे जाँबाज सुरक्षा बलों के सदप्रयासों को ठेस लग सकती है । इसलिए जरूरी है कि इस तरह के भ्रष्टाचार के अपराध में पकड़े गये आरोपियों से कठोर तरीके पूछताछ हो ताकि लोकतंत्र के तल में बैठ रही गन्ध से मुक्ति पायी जा सके। 
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शनिवार, मार्च 17, 2012

राजनीति को लम्पट युवाओं से बचाना जरूरी


राजनीति को लम्पट युवाओं से बचाना जरूरी

वीरेन्द्र जैन   
                पिछले दिनों हुए पाँच विधानसभा चुनावों में से उत्तर प्रदेश के चुनावों का अपना एक अलग महत्व है।  यह महत्व केवल इसलिए ही नहीं है कि वह देश का सबसे बड़ा राज्य है, अपितु इसलिए भी है कि इसमें चुनाव परिणामों के प्रति जो भी कयास लगाये जा रहे थे, या प्रीपोल सर्वेक्षण थे जिसमें गठबन्धन को अवश्यम्भावी बताया जा रहा था, उन सब को झुठलाते हुए मतदाताओं ने एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया जिसका नेतृत्व एक युवा के हाथों में दिया गया है। उल्लेखनीय है कि इन चुनावों में दो करोड़ युवा मतदाता नये जुड़े थे और राज्य के चतुष्कोणीय चुनाव में पुराने मूल्यों में विश्वास रखने वाली भाजपा को छोड़ कर शेष तीन पार्टियों का नेतृत्व भी युवा नेताओं के पास था। यही कारण है कि मतदान में हुयी तीव्र बढोत्तरी के बाबजूद भाजपा के मतों में दो प्रतिशत की कमी आयी है और उसकी सीटें ग्यारह प्रतिशत घट गयी हैं।
      इस नये दौर में यह तय लग रहा है कि भारतीय राजनीति में अगला युग युवाओं का ही होगा, किंतु मुख्यधारा की राजनीति में जो युवा आ रहा है क्या वह इतना विश्वसनीय है कि उसके हाथों में लोकतंत्र की बागडोर सौंपी जा सके? उत्तर प्रदेश के नये युवा मुख्यमंत्री अखिलेश के शपथ ग्रहण समारोह में जो दृष्य उपस्थित हुआ वह बहुत आशाएं नहीं जगाता। मुख्यमंत्री के समर्थन में आये युवाओं ने न केवल शपथ ग्रहण के मंच पर ही कब्जा कर लिया, शपथ ग्रहण की मेज को तोड़ दिया, डायस को गिरा दिया अपितु सजावट के लिए लगाये गये फूल पत्तियों को नोंच कर फेंक दिया। वे चयनित मंत्रियों की कुर्सियों पर बैठ गये और बार बार अपीलें करने के बाद भी नहीं उठे। नई सरकार को उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की घोषणा करनी पड़ी है। चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद इस प्रदेश के विभिन्न नगरों में निकाले गये विजय जलूसों में जिस तरह की उद्दंडताका प्रदर्शन हुआ उसमें गोली लगने से एक बच्चे की मौत तक हो गयी, और पूरे प्रदेश में गुण्डागिर्दी का भय व्याप्त हो गया। इन जलूसों में ऐसा लग रहा था जैसे लोकतांत्रिक चुनाव न जीता हो अपितु किसी राजा के सैनिकों ने युद्ध जीता हो और वे विजित देश को लूटने के लिए निकल पड़े हों। असल में यह उस पूरी राजनीतिक संस्कृति में विकसित हो गया दोष है जो कुछ अपवादों को छोड़ कर समस्त मुख्य धारा के दलों में व्याप्त हो गयी है।
      इन दिनों सक्रिय राजनीति में जो युवा जुड़ रहे हैं उनमें से अधिकांश उस आर्थिक वर्ग से आ रहे हैं जो अपनी विरासत के कारण बिना कुछ परिश्रम के समस्त सुविधाओं वाला जीवन जीने के प्रति आश्वस्त हैं और शौकिया राजनीति उनके लिए अपनी पहचान स्थापित करने, सत्ता हथियाने, अपने अहं को तुष्ट करने, विरोधियों को नीचा दिखाने, ऐयाशी से भरा जीवन जीने, सरकारी मशीनरी को गुलाम बनाने, व अपने परिवार के व्यापारिक औद्योगिक हितों को सुरक्षित रखते हुए सरकारी अनुदानों व दूसरे लाभों को अपने हित में हस्तगत करने के लिए है। इस युवा की दृष्टि न तो व्यापक है और न ही “सब जन सुखाय” वाली है। वह “जनता का, जनता के द्वारा जनता के लिए” सिद्धांत वाले शासन को अपने निजी हितों में उपयोग करना चाहता है। पिछड़े वर्ग की जो जातियां कभी अपने सवर्ण आकाओं के लिए लठैती करती रही थीं वही मण्डल कमीशन के बाद सत्ता के स्वाद और सुखों से परिचित हुयीं और उन्होंने दूसरों को सत्ता दिलाने के लिए अपना खून पसीना बहाने की जगह अपनी ऊर्जा का स्तेमाल खुद की  सत्ता पाने के लिए लगाना शुरू कर दिया। आज इन युवाओं के पास बड़े बड़े क्रैशर हैं, ट्रक हैं, डम्पर हैं, गाड़ियां हैं, ताकत से हथियाये ठेके हैं और भ्रष्ट अधिकारियों से अपने पक्ष में काम कराने के लिए धन है व राजनेताओं के लिए समर्थकों की भीड़ है। कुल मिला कर युवाओं का एक बड़ा लम्पट वर्ग राजनीतिक दलों में प्रवेश कर चुका है जो मूल्य विहीन समर्थन के लिए लालायित नेताओं पर दबाव बना सकने में सक्षम है। राजनीतिक सोच विहीन यह वर्ग सत्ता से जुड़ी किसी भी पार्टी या नेता के पास जा सकता है क्योंकि इसकी न तो कोई विचारधारा है और न ही कोई प्रतिबद्धता ही है। भाजपा जैसी कभी अनुशासित रही पार्टी में भी विभिन्न आर्थिक सामाजिक  अपराधों व अनैतिकताओं से जुड़े युवा  अपराधी आये दिन पकड़े जा रहे हैं।  
      इस लम्पट युवा वर्ग के उदय के पीछे राजनेताओं की मूल्यहीनता का भी बड़ा हाथ है। जो राजनेता किसी भी तरह चुनाव जीत कर सत्ता सुखों के लालच में वोटों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं वे ही इनके सारे सही गलत कामों में पक्ष लेकर उन्हें भी मूल्यहीन बनाते रहते हैं। दूसरा दोष हमारी न्याय प्रणाली का है जो सामाजिक आर्थिक अपराधों में दण्ड नहीं दे पाती व समाज में विचरण करते रहने वाले अपराधी युवाओं को गलत रास्ता चुनने को विवश कर देते हैं। लम्पट युवाओं की दिन प्रति दिन बढती फौज किसी न किसी राजनेता के संरक्षण में उसकी अनुगामिनी होती है। लम्पटों का यह गिरोह लोकतंत्र की मूल भावनओं से जुड़े युवाओं और दलों को नुकसान पहुँचा रहे हैं इसलिए इन पर अंकुश लगाना या रोकना बहुत जरूरी है। यह काम उनकी ऊर्जा के सार्थक स्तेमाल के द्वारा किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा और संकल्प से भरे युवा मुख्य मंत्री इस काम को हाथ में लेकर एक नई पहल कर सकते हैं। वे समाजवादी युवजन सभा जैसे युवा संगठन का गठन करके उसके प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं और युवाओं को कोई राजनीतिक कार्यक्रम सौंप सकते हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार से घिरे समाज में एक आन्दोलन छेड़ सकते हैं और अन्ध विश्वास व साम्प्रदायिकता के खिलाफ वैज्ञानिक दृष्टि विकसित कराने का काम कर सकते हैं। यदि लम्पट युवाओं के चरित्र परिवर्तन के लिए काम नहीं किया गया तो वे किसी भी दिन युवा नेतृत्व को संकट में डाल सकते हैं।
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