सोमवार, जून 10, 2019

टुकड़े टुकड़े गैंग का सही पता


टुकड़े टुकड़े गैंग का सही पता
वीरेन्द्र जैन

जब किसी राजनीतिक दल के प्रचारकों द्वारा उछाले गये जुमले को देश का प्रधानमंत्री दुहराने लगे तो यह निश्चित है कि या तो मामला बहुत गम्भीर है या प्रधानमंत्री गैर गम्भीर है।
तीन वर्ष पहले एक वीडियो एक छात्र संगठन  द्वारा उछाला गया था, जिसमें देश के सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहरलाल यूनिवेर्सिटी में कुछ युवा अफज़ल गुरु की वरसी पर नारे लगाते हुए दिख रहे हैं, जिनमें से एक नारा, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’, भी है। कहा जाता है कि अफज़ल गुरु को फांसी मिलने के बाद जेएनयू के छात्रों का एक छोटा सा गुट जो संसद पर हुए हमले में अफज़ल गुरु को निर्दोष मान कर, प्रति वर्ष 9 फरबरी को यह खुला आयोजन करता रहा है। यही आयोजन उसने सन्दर्भित वर्ष 2016 में भी किया था। अंतर इतना था कि तब तक देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन चुकी थी। उल्लेखनीय यह भी है कि जे एन यू में देश की श्रेष्ठतम युवा मेधा अध्ययन और शोध करती है और विभिन्न विचारों के पुष्प एक साथ खिल कर एक सही लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान के सच्चे विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। इस विश्व विद्यालय की स्थापना के समय से ही यहाँ के छात्र संघ पर वामपंथी रुझान के छात्र संघों का प्रभुत्व रहा है जो भाजपा जैसे दक्षिणपंथी और काँग्रेस जैसे मध्यम मार्गी दलों व उनके छात्र संगठनों को अखरता रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही यह विश्व विद्यालय उनके निशाने पर आ गया था। उल्लेखनीय है कि भाजपा नेता व राज्यसभा के सांसद सुब्रम्यम स्वामी ने सरकार बनते ही जे एन यू को बन्द करने की मांग रख दी थी। इस विश्व विद्यालय में सन्दर्भित वर्ष में एआईएसएफ [सीपीआई] छात्र संगठन के कन्हैया कुमार छात्र परिषद के अध्यक्ष थे, और आइसा [ सीपीआई एमएल] के छात्र संगठन की शहला रशीद उपाध्यक्ष थीं। अन्य पदों पर भी वापपंथी छात्र संगठन के छात्र पदाधिकारी थे। जब सुनिश्चित तिथि को कश्मीरी छात्रों के गुट ने स्मृति कार्यक्रम का आयोजन किया तो संसद पर हमले के एक मृत्यु दण्ड प्राप्त आरोपी को देशद्रोही मानने वाले एबीवीपी [भाजपा] छात्र संगठन के लोगों ने पहले से वीडियोग्राफी की व्यवस्था के साथ उन्हें रोकने या उनसे टकराने की कोशिश की थी। छात्रों के बीच झगड़े की खबर सुन कर कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेता भी उपस्थित हो गये थे। एबीवीपी ने इसे अवसर की तरह लिया और उसकी शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने जो केन्द्र सरकार के अधीन होती है, कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था और उन पर ही आरोप लगा दिया कि उन्होंने “ भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा इल्लाह” के नारे लगाये। बाद में कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ जो वीडियो प्रस्तुत किया गया था उसमें छेड़ छाड़ की गयी थी इसलिए कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी। यदि ऐसे नारे लगाये गये थे तो नारे लगाने वालों को पुलिस कभी गिरफ्तार नहीं कर सकी। कन्हैया कुमार को जमानत के लिए ले जाते समय कुछ वकीलों ने पुलिस हिरासत में कन्हैया के साथ मारपीट की व कोर्ट परिसर में तिरंगे झंडे लहराये। इन्हीं वकीलों के फोटो भाजपा के बड़े बड़े मंत्रियों व नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये किंतु पुलिस हिरासत में कोर्ट ले जाते समय कन्हैया पर किये गये हमले के सन्दर्भ में की गयी किसी दण्डात्मक कार्यवाही की कोई खबर देश को नहीं मिली। इस सब से देश भर में धारणा यह बनायी गयी कि वामपंथी व उसके छात्र संगठन के छात्र देश द्रोही हैं और वे देश के टुकड़े करना चाहते हैं। भले ही अदालत की ओर से उन्हें कोई सजा नहीं मिली किंतु भाजपा पक्ष की ओर से इन्हें लगातार ‘टुकड़े टुकड़े गैंग” की तरह सम्बोधित किया गया। यहाँ तक कि चुनावी प्रचार सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी इस जुमले का प्रयोग किया गया। यह वैसा ही था कि जब भी कोई इस सरकार से सच जानने की कोशिश करता था तो उसे देशद्रोही कह दिया जाता था। उल्लेखनीय यह भी है कि देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, लेखकों की हत्या के बाद जब सरकारी दल के संगठनों द्वारा हत्या के आरोपियों का पक्ष लिया गया, उनको संरक्षण दिया गया तो उसके विरोध में अपने पुरस्कार वापिस कर देने वाले देश के प्रतिष्ठित लोगों को ‘अवार्ड वापिसी गैंग’ कह कर पुकारा गया और इस जुमले को चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी ने भी दुहराया।
कोई आन्दोलनकारी जब भी कोई नारा लगाता है तो वह चाहता है कि उसे और उसकी विचारधारा को उस नारे के साथ पहचाना जाये। कन्हैया कुमार जिस लोकतांत्रिक संगठन से सम्बन्धित था उसका राष्ट्रीय एकता से तो सम्बन्ध है किंतु वे किसी भी तरह से अलगाववाद से नहीं जुड़े हैं और न ही उनका ऐसा कोई इतिहास रहा है। यह सब जानते हैं कि देश की सबसे प्रमुख इंटेलीजेंस संस्था के प्रमुख के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री को तो इस सच का पता ही होगा। इसके बाद भी अगर वे देश के वामपंथियों के लिए टुकड़ टुकड़े गैंग और अवार्ड वापिसी गैंग जैसे जुमलों का प्रयोग करते हैं तो यह शर्म की बात है, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री से चुनाव प्रचार में भी गलतबयानी की उम्मीद नहीं की जाती। किसी अन्य प्रधानमंत्री ने कभी ऐसी भाषा या गलत जानकारी का प्रयोग नहीं किया
देशद्रोह के कानून के गलत स्तेमाल ने उस कानून का मखौल बना कर रख दिया है। कोर्ट का फैसला है कि एक लोकतांत्रिक देश में बिना किसी सैनिक तैयारी के सरकार के खिलाफ बोलना देशद्रोह नहीं होता। यदि किसी ने अति क्रोध में ऐसे नारे भी लगाये हैं तो उसे सजा देने के लिए दूसरी अनेक धाराएं हैं। बार बार बात बात में देशद्रोह का आरोप लगाना देश की सैनिक शक्ति का भी अपमान है।
दूसरी ओर यह सच है कि देश में विभाजन का खतरा बढ रहा है और उन असल ताकतों को पहचानने की जरूरत है जिनके कारण यह खतरा बढ रहा है। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में पाकिस्तान की मांग से पहले ‘ हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ का नारा आया था। यह नारा स्वयं में विभाजन के बीजारोपण करने वाला था, और हिन्दी के साथ मिल कर तो बड़े विभाजन के बीज बो रहा था। यही कारण था कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रभक्त महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन किया था और उसका मुख्यालय दक्षिण में बनाया था, जिससे दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को बढा कर राष्ट्रीय एकता अनायी जा सके। आज एक ऐसी सरकार है जो बार बार खुद की पहचान एक हिन्दूवादी सरकार की तरह कराने की कोशिश कर रही है। देश के अन्य अल्पसंख्यकों को जिस तरह से गौहत्या, लवजेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, आदि के नाम पर प्रताड़ित किया जाने लगा है और बात बात में उन्हें पाकिस्तान जाने को कहा जाने लगा ह। इसका परिणाम यह हुआ कि एक बड़ी आबादी अपने घर में ही खुद को पराया महसूस करने लगी है। इतना ही नहीं दलित जातियों को जिस तरह प्रताड़ित किया जाने लगा है, उससे लगता है कि गैरदलित जातियों के वर्चस्व के लोग सत्ता में हैं और वे कम होते रोजगार के अवसरों व सरकारी नौकरियों के कम होते जाने से जनित संभावित विरोध को आरक्षण से जोड़ना चाहते हैं, ताकि विरोध को विभाजित कर सकें। उत्तरपूर्व में वर्षों से चल रहे अलगाववादी आन्दोलनों को इस दौरान नयी हवा मिली है। आदिवासियों द्वारा अपने जंगलों और जमीनों के दोहन के खिलाफ किये गये प्रतिरोध को पुलिस दमन से दबाये जाने के प्रकरणों में वृद्धि हुयी है। विरोध करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी कह कर उस दमन को सही ठहराया जाता है। सीमा पर होने वाली हलचलों के समय पूरा देश एक साथ सरकार का सहयोग करता रहा है, किंतु अब देश के प्रमुख राजनीतिक दलों तक को सही सूचनाएं नहीं दी जा रही हैं, और पूछने पर उन्हीं को देशद्रोही व दुश्मन को खुश करने वाला बताया जाने लगा है। अपने चुनावी लाभ के लिए जातियों के विभाजन का लाभ लेने के लिए जातिवादी आधार पर टिकिट दिये जाते हैं। साक्षी महाराज को लोधी वोटों के आधार पर, व निरंजन ज्योति को मल्लाह वोटों के आधार पत टिकिट दिया गया। ठाकुर दिग्विजय सिंह के वोटों को काटने के लिए प्रज्ञा ठाकुर को लेकर आये। जहाँ जातियों के आधार पर चुनाव होते हैं, वहाँ चुनावों के दौरान पड़ी दरारें बाद तक बनी रहती हैं।
हाल ही मैं शिक्षानीति में हिन्दी को अनिवार्य करने के नाम पर दक्षिण में सोये हुए हिन्दी विरोध को फिर से कुरेद दिया गया है। उल्लेखनीय है कि चुनावों के दौरान अपने भाषण में सुप्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर ने सही कहा था कि समाज को विभिन्न कारणों से विभाजित करने वाली टुकड़े टुकड़े गैंग तो सत्ता में बैठे हुए लोग हैं जो अपनी गलत नीतियों, व गलत राजनीति से टुकड़ों टुकड़ों में बाँट रही हैं। टाइम पत्रिका ने अगर नरेन्द्र मोदी को डिवाइडर इन चीफ बताया है जो बिल्कुल निराधार तो नहीं है।    
यह जरूरी है कि चुनाव हो जाने के बाद देश में पदारूढ सरकार चुनावी मूड से बाहर निकले व प्रधानमंत्री अपने विभाग में बैठे सैकड़ों प्रतिभाशाली अधिकारियों से प्राप्त जानकारी लेकर ही अपनी बात कहने की आदत डालें, जिससे उनके भाषणों में होने वाली त्रुटियों को देश की त्रुटियों में न गिना जाये। राष्ट्रीय एकता सलामत रहे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मो. 09425674629

 

बुधवार, जून 05, 2019

कार्टूनिस्ट बालेन्दु परसाई के बहाने


कार्टूनिस्ट बालेन्दु परसाई के बहाने
वीरेन्द्र जैन

इस बिगड़ी हुयी दुनिया, समाज, राजनीति और राजनेताओं के दुर्गुणों को रेखांकित करने के लिए जब उन्हें और अधिक बिगड़ा हुआ दिखा कर उनके दुर्गुणों को इंगित किया जाता है तो व्यंग्य पैदा होता है।
मुझे आलोचक डा. रामकृपाल पांडेय के सौजन्य से एक बार हिन्दी के सबसे प्रमुख आलोचकों में से एक डा. राम विलास शर्मा से मिलने का मौका मिला था तब मैंने उनसे पूछा था कि हास्य और व्यंग्य में क्या अंतर है। उन्होंने कहा था कि जब आदमी दांत खोलकर हँसता है तो हास्य होता है, किंतु जब वह दांत भींच कर हँसता है तो व्यंग्य होता है। उनकी यह बात मुझे सदैव याद रही। मैंने भी अपनी एक पुस्तक की भूमिका में लिखा था कि-
फुसफुसाने से सोया हुआ दोस्त नहीं जागता
और जोर से बोलने पर दुश्मन के सावधान हो जाने का खतरा है
इसलिए गुदगुदा कर जगा रहा हूं 
ज्यादातर व्यंग्य दुश्मनों के नहीं अपनों की भूलों को इंगित करने की कला है, इसलिए उसमें चाकू नहीं शल्य चिकित्सक के नश्तर चलाये जाते हैं जो तात्कालिक तकलीफ तो देते हैं किंतु दूरगामी फायदा भी पहुँचाते हैं।
एक फ़्रांस का फिल्म डाइरेक्टर किसी पत्रकार को साक्षात्कार दे रहा था। उसने किसी अन्य डाइरेक्टर के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि वह मार्क्सवादी है। इस पर पत्रकार ने पलट कर कहा कि वह तो अपने आप को मार्क्सवादी नहीं कहता। “उसको क्या मालूम कि वह मार्क्सवादी है” उस डाइरेक्टर ने संजीदगी से कहा।
हमारे मित्र कार्टूनिस्ट बालेन्दु परसाई भी दुनिया के सबसे बड़े कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के एकलव्य हैं। वे गंडा ताबीज बँधवा कर उनके शिष्य नहीं बने अपितु प्रति दिन नियम से उस दिन की सबसे प्रभावित कर देने वाली घटना पर कार्टून बना कर सैकड़ों वेबपत्रिकाओं को भेज देते हैं, जो उनको जारी करती हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने यह सुविधा उपलब्ध करायी है कि वह ताज़ा घटना पर की गई प्रतिक्रिया को बासी नहीं होने देती। कार्टून के लिए यह ताज़गी और भी ज्यादा जरूरी होती है क्योंकि उसे कम से कम स्थान में अपनी बात कहना होती है व उसके पास अलग से सन्दर्भ देने की जगह नहीं होती।
किसी चित्रकार को अपने विषय चुनने का अधिकार होता है किंतु कार्टूनिस्ट को यह सुविधा कम होती है। उसे किसी ताजा घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देना होती है और कई बार तो बहुत हाथ साध कर कलम चलाने का समय नहीं होता है। उसके पात्र गलत जगह गतिमान हो जाते हैं, रंग फैल जाते हैं। ऐसा होने पर भी बालेन्दु के कार्टून अपनी बात कह जाते हैं सन्देश पहुँचा देते हैं। उन्हें यह मालूम है कि कौन कहाँ गलत है और कूची से नश्तर किस जगह पर चलाना है। गलत जगह पर चलाया गया डाक्टर का नश्तर नुकसान भी कर सकता है। उनकी इस समझ को प्रणाम।
अंत में एक और घटना याद आ रही है। लक्ष्मण के कार्टून लगातार टाइम्स आफ इंडिया के मुखपृष्ठ पर छपने वाली दुनिया की श्रंखला में गिनी जाती है। जब इस श्रंखला को पचास साल हुये तो एक पत्रकार ने उनसे साक्षात्कार लिया। अन्य बातों के अलावा जब उन्होंने विभिन्न राजनेताओं के बारे में पूछा जिन पर लक्ष्मण ने कार्टून बनाये थे तो उस बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि ज्योति बसु मेरे काम के लिए बहुत मनहूस रहे। उन्होंने मुझे कभी कार्टून बनाने का मौका ही नहीं दिया।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, जून 02, 2019

काँग्रेस का इतिहास और उसका संकट


काँग्रेस का इतिहास और उसका संकट   

वीरेन्द्र जैन
काँग्रेस इस समय नेतृत्व के संकट से गुजरती हुयी बतायी जा रही है जबकि यह उसके नेतृत्व का नहीं अस्तित्व का संकट है। सच तो यह है कि दल के रूप में उसका अस्तित्व तो इन्दिरा जी के काल में ही समाप्त हो गया था। उसके बाद तो काँग्रेस की मूर्ति बना कर सत्ता अनुष्ठान चलता रहा है। अब उस सच की पहचान हो रही है।
सब जानते हैं कि काँग्रेस स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए गठित संगठन का नाम था जिस लक्ष्य को पाने के लिए ही सुभाष चन्द्र बोस और भगत सिंह ने अपना अलग मार्ग चुना था। आज़ादी के बाद गाँधीजी की इच्छा के विपरीत उसी संगठन को राजनीतिक दल के रूप में जारी रखने का फैसला किया गया। इसी में से समाजवादी जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया आदि निकले। कम्युनिष्ट पार्टी के प्रमुख नेताओं ने भी अपनी विचारधारा के साथ साथ आज़ादी के लिए काँग्रेस में रह कर काम किया था। बाद में कम्युनिष्ट पार्टी पहले दो आम चुनावों में समुचित सीटें जीत कर मुख्य विपक्षी दल रही। दूसरी ओर आरएसएस जैसे हिन्दूवादी संगठन थे जो हिटलर और मुसोलिनी से प्रभावित थे व अंग्रेजों की जगह मुसलमानों को अपना मुख्य दुश्मन मानते थे। वे अंग्रेजों को बनाये रखना चाहते थे और अंग्रेजों से लड़ने वाली हिन्दू मुस्लिम सबकी साझा पार्टी काँग्रेस व उसके स्वतंत्रता आन्दोलन को पसन्द नहीं करते थे। इसी तरह भारतीय संविधान के निर्माता अम्बेडकर जी थे जो मानते थे कि जातियों में बंटे समाज में जब आज़ादी मिलेगी तो वह ऊंची कही जाने वाली जातियों को ही मिलेगी इसलिए जाति मुक्त समाज का निर्माण पहली आवश्यकता है। गाँधीजी आजादी के लिए सभी धाराओं के बीच समन्वय स्थापित करने वाले व्यक्ति थे।
गाँधीजी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया गया था, जिसको हटाने की शर्त के रूप में उन्होंने सरदार पटेल को वचन दिया था कि संघ कभी राजनीति में भाग नहीं लेगा, किंतु उन्होंने कुछ समय बाद अपने स्वयं सेवक भेज कर भारतीय जनसंघ का गठन करा दिया था, जो अब भाजपा के नाम से उसी का आनुषंगिक संगठन बना हुआ है। भाजपा पूरी तरह संघ से ही नियंत्रित होती है व जिसके हर स्तर के संगठन सचिव के रूप में आरएसएस का प्रचारक ही नियुक्त किया जाता है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान सक्रिय कांग्रेसियों का सत्ता पर स्वाभाविक हक बनता था। काँग्रेस के स्वरूप को ध्यान में रख कर समन्वयवादी नेहरूजी ने अपने मंत्रिमंडल में एक ओर हिन्दूवादी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सम्मलित किया था दूसरी ओर अम्बेडकर जी को भी मंत्री बनाया था। उनके सामने विपक्ष में एक भिन्न विचार लेकर केवल कम्युनिष्ट पार्टी थी जो कहीं कहीं किसानों मजदूरों को उनकी मांगों के लिए संगठित तो कर सकती थी किंतु विचार के रूप में केवल उच्च राजनीतिक चेतना को ही सम्बोधित कर सकती थी। उसके विचार को स्थापित न होने देने के लिए पूंजीवादी घरानों द्वारा विभिन्न प्रकार की संघ की मदद से झूठी धारणाएं फैलायी जा रही थीं। बम्बई की कपड़ा मिलों की हड़ताल के बाद वे तेलंगाना किसान आन्दोलन के दौरान सशस्त्र संघर्ष कर चुके थे। केरल में बनी पहली गैर कांग्रेसी कम्युनिष्ट सरकार को धारा 356 का दुरुपयोग करके भंग किया गया था।
1967 में पहली संविद सरकार बनने से पहले तक काँग्रेस माने सरकार होता था। सामाजिक समरसता के लिए कृतज्ञ दलित जिन्हें तब हरिजन नाम से पुकारा जाता था और हिन्दू महासभा व आरएसएस के कट्टर हिन्दुत्व से आशंकित मुसलमान काँग्रेस का स्थायी वोटर था व शेष वोट तो उसे सत्ता की धमक और चमक से मिल जाते थे। पहले आम चुनावों तक काँग्रेस को चुनाव जीतने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता था। उसे पहली बड़ी चुनौती 1967 में मिली। तब तक चीन के साथ हुये सीमा विवाद में देश पीछे हटने को मजबूर हो चुका था। कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हो चुका था। जवाहर लाल नेहरू का निधन हो चुका था, उसके बाद बने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को पाकिस्तान के साथ युद्ध करना पड़ा था और तास्कन्द समझौते के समय उनकी भी मृत्यु हो गयी थी। प्रधानमंत्री पद के लिए इन्दिरा गाँधी को मोरारजी देसाई के समक्ष बहुमत के आधार पर कांग्रेस कार्य समिति में हुए मतदान से चुना गया था। देश में अभूत पूर्व खाद्य संकट आ चुका था जिसकी स्तिथि यह थी कि शास्त्री जी को देशवासियों से एक दिन उपवास करने के लिए कहना पड़ा था। कांग्रेसियों को सत्ता सुख का चश्का लग चुका था और वे आपस में प्रतियोगिता करते हुए गुटबाजी करने लगे थे। सरकार कमजोर हो रही थी और उसी समय वरिष्ठों के नेतृत्व ने इन्दिरा गाँधी को हटाने के लिए एकजुट होना शुरू कर दिया जिसकी भनक लगते ही श्रीमती गाँधी ने राष्ट्रपति चुनाव में वामपंथियों के उम्मीदवार को आत्मा की आवाज पर मत देने का सन्देश दे, काँग्रेस को विभाजित कर दिया। उससे पहले उन्हें बहुमत के लिए वामपंथियों का सहारा लेना पड़ा जिन्होंने बड़े बैंकों व बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण तथा पुराने राज परिवारों को मिलने वाले प्रिवी पर्स व विशेष अधिकारों को समाप्त करने की शर्त पर समर्थन दिया। श्रीमती गाँधी को यह सब करना पड़ा। इसी के साथ उन्होंने खुद को प्रगतिशील प्रचारित करते हुए काँग्रेस को केन्द्र से वाम की ओर झुकाव वाली पार्टी दिखाने की कोशिश की। इसका व्यापक प्रभाव हुआ और वे पुराने काँग्रेसियों समेत जनसंघ सोशलिस्टों आदि को हाशिए पर समेटने में सफल हो गयीं। सीपीआई के साथ उनका समझौता हो गया व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोवियत रूस उनका मददगार हो गया। यही वह समय था जब सारी दक्षिणपंथी ताकतें व विश्व पटल पर अमेरिका उनके खिलाफ हो गया, देश में आन्दोलन शुरू हो गये व एक चुनाव याचिका में आये फैसले के बहाने उनके तख्ता पलट की तैयारियां होने लगीं। यही कारण था कि उन्होंने इमरजैंसी लगा दी। इस इमरजैंसी में उन्होंने न केवल विपक्षी नेताओं को ही जेल में बन्द कर दिया अपितु अपनी पार्टी के लोगों पर भी लगाम लगाने के लिए पूरी पार्टी को अस्थायी समितियों के द्वारा संचालित कर नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। दूसरी तरफ उन्होंने संजय गाँधी को आगे कर सीपीआई को किनारे कर दिया क्योंकि अब उनके पास समुचित बहुमत था। यही समय संजय गाँधी के उफान और काँग्रेस के पुराने ढांचे के चरमरा कर इन्दिरा काँग्रेस में बदलने का था। इमरजैंसी हटने और चुनावों में काँग्रेस की बुरी पराजय के बाद जगजीवन राम, हेमवती नन्दन बहुगुणा, नन्दिनी सत्पथी व चन्द्र शेखर , मोहन धारिया, जैसे युवा तुर्क अलग हो चुके थे। किंतु देश में काँग्रेस जैसी देशव्यापी कोई दूसरी पार्टी नहीं थी इसलिए जनसंघ की मदद से बनी जनता पार्टी के प्रयोग ने जल्दी ही श्रीमती गाँधी को फिर मौका दे दिया। सरकार बनते ही उन्होंने काँग्रेस में अपने से बड़ा दूसरा नेतृत्व न उभरने देने का फैसला किया। दुर्भाग्य से संजय गाँधी का एक हवाई दुर्घटना में निधन, खालिस्तान आन्दोलन, और स्वर्ण मन्दिर घटनाक्रम के बाद उनके सिख गार्डों द्वारा उनकी हत्या तक काँग्रेस उनके परिवार की जेबी पार्टी बन चुकी थी। यही कारण रहा कि उनकी मृत्यु के बाद वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी की जगह राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री बनाना पड़ा। राजनीति में आने के अनिच्छुक रहे राजीव गाँधी अपनी साफसुथरी मनमोहक छवि के बाबजूद एक कमजोर प्रधानमंत्री थे। वे बोफोर्स तोप खरीद के चक्कर में फंस गये व उनके ही वित्त मंत्री ने विद्रोह करके उनसे सत्ता छीन ली। यही समय था जब जनसंघ से भाजपा बन चुकी पार्टी ने काँग्रेस के विकल्प बनने का सपना देखना शुरू कर दिया। 1984 के चुनावों में दो तक सिमटने के बाद भी उसे खाली जगह दिख रही थी इसलिए उसने राम मन्दिर और मण्डल विरोध का अभियान छेड़ा, जिसमें उसे सफलता मिलती गयी। जिस दर से काँग्रेस  सिमिट रही थी उसी दर से भाजपा बढ रही थी। 1989 में राजीव गाँधी की हत्या के बाद उनकी पत्नी सोनिया गाँधी ने राजनीति में आने से मना कर दिया जिससे काँग्रेस सर्व स्वीकृत नेतृत्व से वंचित हो गयी। अर्जुन सिंह, नारायन दत्त तिवारी, नरसिम्हा राव, प्रणव मुखर्जी, सीताराम केसरी आदि अनेक नेता नेतृत्व के सपने देखने लगे थे। इस बीच जिसको भी नेतृत्व मिला वह समझौते के रूप में मिला। वैसे भी 1989 के बाद लगातार गठबन्धन सरकारें रहीं जिन्हें हर बार सहयोगियों के साथ सौदा करना पड़ता था। संगठन और चुनावों में क्षीण होती जा रही काँग्रेस के नेता सत्ता से दूर नहीं रह सकते थे इसलिए सबने मिल कर सोनिया गाँधी से नेतृत्व का निवेदन किया जो क्षमता, भाषा, संस्कृति, स्वभाव, व बुरे अनुभवों के कारण बिल्कुल भी रुचि नहीं रखती थीं। किंतु आग्रहों व दूरदर्शिता के कारण उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया।
काँग्रेस पार्टी बिल्कुल समाप्त हो चुकी थी किंतु पुराना ढांचा मजबूत था। अब काँग्रेस कहीं से नहीं जीतती थी अपितु अपने निजी प्रभाव से काँग्रेस के चुनाव चिन्ह पर काँग्रेसी व्यक्ति जीतते थे। ऐसे सब लोग गाँधी नेहरू परिवार की सदस्य होने के कारण सोनिया गाँधी को नेता माने हुये थे। वे प्रसन्नता में टिकिट तो दे सकती थीं किंतु किसी को सजा नहीं दे सकती थीं। काँग्रेस में अनेक गुट हो चुके थे और सारे लोग निजी हित के लिए राजनीति कर रहे थे काँग्रेस की चिंता किसी को नहीं थी। पार्टी की उपयोगिता केवल चुनाव चिन्ह या कार्पोरेट घरानों से प्राप्त चन्दे को चुनाव खर्च के नाम हथियाने तक थी। मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह, शशि थरूर आदि कभी साम्प्रदायिकता के खिलाफ बयान दे देते थे और संघियों के निशाने पर आ जाते थे। पर तब दूसरे काँग्रेसी उनके बचाव में भी खड़े नहीं होते थे, जिससे काँग्रेस का बिखराव देख संघ परिवारियों को बड़ा बल मिलता था।
2004 में अटल बिहारी के नेतृत्व वाली सरकार का गठबन्धन चुनाव में समुचित सीटें नहीं ला सका और कम्युनिष्टों सहित गैर भाजपाई दल बड़ी संख्या में चुनाव जीते। कम्युनिष्ट भाजपा को समर्थन दे नहीं सकते थे इसलिए यूपीए का गठन हुआ जिसमें उन्होंने काँग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार को बाहर से समर्थन देना मंजूर कर लिया। भाजपा द्वारा सोनिया गाँधी को विदेशी बता कर भारी शोरगुल और तमाशे किये गये जिससे उन्होंने अपने समर्थन को मनमोहन सिंह को सौंप दिया। सत्ता सुख मिलने तक काँग्रेसी काँग्रेस से जुड़े रहे। इन दस सालों में भाजपा ने अपनी मर्जी से ही सदन चलने दिया, पर काँग्रेसियों को सदन की चिंता नहीं सतायी। वे तो चाहते थे कि सरकार चलती रहे। भाजपा ने यूपीए के शासन काल के दस साल लगातार संगठन और चुनावी तैयारियों में लगाये व उचित प्रबन्धन व रणनीतियों से 2014 के आम चुनाव में विजय प्राप्त की। मौका देख कर बहुत सारे काँग्रेसी भाजपाई हो गये और उनके लक्ष्य को देखते हुए ऐसा करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुयी।  2024 से 2019 का समय राहुल गाँधी द्वारा भाषण देना और किताबी नेतृत्व को सीखने का समय था। मोदी व संघ परिवार द्वारा किये गये कारनामे जनता व साम्प्रदायिक सद्भाव के विरुद्ध थे, वे कोई वादा पूरा नहीं कर सके थे, इसलिए काँग्रेसी नकारात्मक समर्थन मिलने की उम्मीद में सत्ता के सपने देखने लगे। कुछ राज्यों में मामूली अंतर से राज्य सरकारें बदल जाने से भी उन्हें गलतफहमी हुयी। परिणाम यह हुआ कि मोदी शाह के प्रबन्धन वाली भाजपा भावुक नारों के आधार पर चुनाव जीत गयी व काँग्रेस अपनी उम्मीदों से बहुत पीछे रही।
अभी उसमें सत्ता सुख व लाभ के लिए चुनाव जीतने को उतावले नेता हैं और उनका गिरोह है। पर, इन्हें काँग्रेस के उद्देश्यों का पता नहीं है इसलिए किसी त्याग का तो सवाल ही नहीं उठता। इसकी रैली जलूसों में जाने वाले या तो क्षेत्रीय नेता से उपकृत भक्त लोग होते हैं या पैसा देकर जुटाये गये दिहाड़ी मजदूर होते हैं।  
भाजपा ने काँग्रेस मुक्त भारत की जो कल्पना की है, उस ओर काँग्रेस स्वयं बढ रही है। भारतीय विश्वासों में दूसरा जीवन मृत्यु के बाद ही प्राप्त होता है। काँग्रेस बच सकती है अगर वह अपने को भंग कर दे और उचित कार्यक्रम के साथ कठोर अनुशासन वाले नये संगठन के साथ उभरे। काँग्रेस का नया कार्यक्रम बनाया जा सकता है  और उस कार्यक्रम पर सहमत लोगों को संगठन के नियमों व अनुशासन के पालन की शर्त पर ही सदस्य बनाया जा सकता है। काँग्रेस चलाने के लिए धन की कमी नहीं है स्वतंत्रता आन्दोलन वाले त्याग की कमी है।
 वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, मई 27, 2019

एक भिन्न भारत में एक भिन्न लोकतंत्र का उदय


 एक भिन्न भारत में एक भिन्न लोकतंत्र का उदय
वीरेन्द्र जैन

आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा के एक सांसद साक्षी महाराज ने कहा था कि 2019 के चुनाव आखिरी चुनाव होंगे। शायद उनका आशय इस बात से रहा होगा कि 2019 में जीत जाने के बाद विपक्षी दल इतने क्षत विक्षत हो जायेंगे कि लम्बे समय तक चुनाव में उतरने लायक नहीं बचेंगे, इसलिए फिर उसके बाद आम चुनाव पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों की तरह औपचारिकता भर हो कर रह जायेंगे। इसी बात को दूसरी तरह से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि 2050 तक भाजपा ही राज करेगी। उल्लेखनीय है कि चुनाव परिणाम देते समय विभिन्न न्यूज चैनल जो ग्राफिक्स दिखा रहे थे उनमें से अनेक ने भाजपा प्लस दिखाने की जगह मोदी प्लस का टाइटिल लगाया था जिसका मतलब है कि अब भाजपा की जगह एक व्यक्ति नरेन्द्र मोदी ने ले ली है। एक चैनल तो परिणामों के साथ एक फिल्मी गीत सुना रहा था- मैं ही मैं हूं, मैं ही मैं हूं, दूसरा कोई नहीं। यह बिल्कुल इन्दिरा इज इंडिया की याद दिला रहा था।
भले ही यह बात जोर शोर से नहीं स्वीकारी जाती हो किंतु यह ज्वलंत सत्य है कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आनुषंगिक संगठन है और इससे सम्बन्धित अंतिम फैसला वहीं से होता है। 2013 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतारने का फैसला भाजपा के लोगों ने नहीं अपितु संघ ने ही लिया था जबकि इस फैसले के कुछ दिन पहले ही अरुण जैटली ने कहा था कि हमारी पार्टी में दस से अधिक लोग इस पद के योग्य हैं। घोषणा के एक दिन पूर्व ही वे कहने लगे थे कि मोदी को तुरंत प्रत्याशी घोषित कर देना चाहिए नहीं तो भाजपा हिट विकेट हो जायेगी। संघ ने तुरंत ही अडवाणी, सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, और एनडीए सहयोगी बाल ठाकरे की असहमति के बाद भी मोदी को प्रत्याशी घोषित कर दिया था। मोदी की शर्त के अनुसार ही प्रचारक संजय जोशी को न केवल समस्त जिम्मेवारियों से मुक्त कर दिया गया था, अपितु उत्तर प्रदेश के घोषित हो चुके प्रभारी के पद से भी हटा दिया गया था। उसके बाद भाजपा का स्वरूप बदलता गया और वह अटल अडवाणी युग से बाहर निकल आयी। क्रमशः उसके पोस्टरों में से अटल अडवाणी आदि गायब होने लगे। आम सभाओं में किसी भी कीमत पर भीड़ जुटाने की योजनाएं बनायी गयीं। गुजरात से आये हुए लोगों का एक समूह सभा के बीच में मोदी मोदी के नारे लगा कर पार्टी की जगह व्यक्ति को स्थापित करने के बीज बोने लगा था। ड्रोन कैमरे से वास्तविक भीड़ को कई गुना दिखाने और उसके लाइव प्रसारण की व्यवस्थाएं की गयी थीं। अपनी छवि बनाने और विरोधियों की छवि बिगाड़ने में सोशल मीडिया का स्तेमाल और नैट वर्क तैयार कर लिया गया था जबकि विपक्षियों ने तब तक उस बारे में सोचा ही नहीं था। थ्री डी वीडियो तकनीक से मोदी जी के भाषण एक साथ दर्जनों जगह प्रसारित होने लगे थे। सोशल मीडिया पर अतिरंजित फालोइंग बताने की व्यवस्था कर ली गयी थी किंतु उसकी पोल खोलने वाले समाचार को सही प्रसारित नहीं होने दिया गया। जो कार्पोरेट घराने अपनी पसन्द का प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे उन्होंने ही प्रमुख मीडिया हाउसों को खरीद लिया था या उनसे सौदा कर लिया था. ताकि प्राइम टाइम पर पक्षधर एंकर ही संचालन करे। तत्कालीन सरकार और उसके नेताओं या रिश्तेदारों पर लगे आरोपों को उनकी छवि बिगाड़ने के लिए मीडिया पूरा प्रयास कर रहा था।
चालीस से अधिक दलों के साथ गठबन्धन बनाया गया था, चुनाव प्रबन्धन के लिए प्रशांत किशोर जैसे प्रबन्धकों को नियुक्त किया गया था। फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों, और अन्य सेलिब्रिटीज को उनके प्रभाव क्षेत्र के अनुसार टिकिट दिया गया था। दूसरे दलों के नेताओं को दल बदल करा के भरती किया गया था और टिकिट देने में उदारता बरती गयी थी, तब जाकर पश्चिमी और उत्तरी भारत में अर्जित 31 प्रतिशत मतों के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी जो पूरे पाँच साल तक चुनावी मूड में रही।
लोकसभा के चुने हुये प्रतिनिधि केवल बहुमत की संख्या बनाने के लिए थे, उनमें से ज्यादातर को सरकार चलाने की कोई जिम्मेवारी नहीं दी गयी। इतना ही नहीं उन्हें सांसद निधि को व्यय करने की स्वतंत्रता भी नहीं दी गयी। मंत्रिमण्डल के प्रमुख विभाग राज्यसभा के चयनित सदस्यों जैसे, अरुण जैटली-वित्तनिर्मला सीतारमण-रक्षा, प्रकाश जावड़ेकर-मानव संसाधनपीयूष गोयल-रेलवे,कोल,विजय गोयल-पार्लियामेंट्री अफ़ेयर जगत प्रशाद नड्डा-स्वास्थ, धर्मेंद्र प्रधान-पेट्रोलियम, मुख्तार अब्बास नकवी-अल्पसंख्यक, सुरेश प्रभु-कॉमर्स,इंडस्ट्री स्मृती ईरानी-कपड़ा, रवि शंकर प्रसाद-लॉ,न्याय, हरदीप सिंह पूरी-गृह निर्माण,शहरी विकास, चौधरी वीरेंद्र सिंह-स्टील, अल्फोंसा-पर्यटन,इलेक्ट्रॉनिक, आदि को दिये गये। ये जनता के चुने हुए नहीं नेताओं के चुने हुये लोग हैं जिनमें से अनेक कार्पोरेट घरानों के द्वारा निर्देशित होंगे, जैसा कि नीरा राडिया मामले में हम लोग देख चुके हैं।
असफल वित्तीय व्यवस्था पर लगाये गये चुनिन्दा पदाधिकारियों, वित्तीय विशेषज्ञों के आरोपों को दबाने के लिए कभी देशद्रोह, कभी लव जेहाद, कभी गौ हत्या, कभी राम मन्दिर, कभी तीन तलाक, आदि आदि के नाम पर टीवी में बहसें छेड़ी जाती रहीं जो साम्प्रदायिकता से भरी हुयी होती थीं।
2019 आम चुनाव के परिणाम सचमुच चौंकाने वाले हैं। जीत के अंतर को देखते हुये प्रथम दृष्टि में ये सन्देहास्पद लगते हैं, किंतु परिणाम आने के बाद बिना किसी सबूत के ईवीएम आदि पर आरोप लगाना भी गलत होता है। इसलिए इन्हें यथावत सच मानते हुये इनका विश्लेषण करना होगा। अभी तक चुनाव परिणाम केवल सम्बन्धित दलों के कार्यों, योजनाओं, पर ही निर्भर नहीं करते थे अपितु, जाति, धर्म, धन, स्थानीय दबाव, आदि की भूमिका भी रहती थी। अब मोदीजी का कहना है कि आज के भारत के इन चुनावों में जाति धर्म, के आधार को छोड़ते हुये जनता ने सामाजिक विकास के आधार पर उनके पक्ष में मतदान किया है।[]वे यह नहीं बताते कि बेगुसराय में गिरिराज सिंह को कन्हैया के खिलाफ क्यों लगाया गया था] अगर ऐसा है तो यह एक बड़ा बदलाव है, भले ही वह गलत सूचनाओं के आधार पर लिया गया फैसला हो। आर्थिक क्षेत्र में लिये गये गलत निर्णयों को विभिन्न पदाधिकारियों के त्यागपत्रों से ही नहीं सुब्रम्यम स्वामी के बयानों से भी समझा जा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में देशवासियों को लगातार अँधेरे में रखा ही जा रहा है, और उनकी राष्ट्रीय भावनाओं को भुनाया जा रहा है। सच कहने वालों को देशद्रोही कह कर मीडिया में शोर मचा दिया जाता है, ताकि संवाद न हो सके। यदि इतने अधिक लोगों ने अँधेरे को रौशनी मान लिया है तो निश्चित रूप से यह एक भिन्न भारत है और यह उसका भिन्न लोकतंत्र है। अब जो भी चुनाव होंगे वे इसी तरह के असत्य या अर्धसत्य आधारित होंगे और न होने के बराबर होंगे। न कोई राफेल सौदे के सच के बारे में जान सकेगा और ना ही सर्जीकल और एयर स्ट्राइक के बारे में। एक शेर है-
मैंने जब भी बात अपनी कहने की कोशिश करी
बस उसी क्षण आपकी जयकार के नारे लगे  
  वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629    


शनिवार, मई 18, 2019

चुनाव अनुमान और मोदी का भविष्य


चुनाव अनुमान और मोदी का भविष्य  
वीरेन्द्र जैन
2019 के आम चुनाव लगभग समाप्ति की ओर हैं, और परिणामों की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही है। किसी भी पार्टी की जीत की संभावना के सन्देशों पर भरोसा हो जाने से चुनाव में गुणात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए सरकार बनाने के लिए संघर्षरत हर दल या गठबन्धन अपनी जीत का वातावरण बनाने में लगे रहते हैं। क्रमशः नेताओं की विश्वसनीयता घटने के बाद अब पार्टियां तरह तरह के झूठे सर्वेक्षणों, मीडिया की प्रायोजित बहसों, आलेखों आदि से अपनी लोकप्रियता और जीत का भ्रम पैदा करते हैं। दूसरी ओर कुछ भिन्न महसूस करने वाला मतदाता सोचता है कि या तो इन्हें साफ साफ परिदृश्य नहीं दिखता या ये हमें जानबूझ कर धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा के चुनावों में काँग्रेस, भाजपा ही नहीं अपितु जीतने वाली आम आदमी पार्टी के नेता भी जीतने वाले प्रत्याशियों की संख्या के प्रति जितने भ्रमित थे, उससे उनके जनता के मूड को समझने की क्षमता का पता चलता है। 2014 के आम चुनावों में भी किसी को यह अनुमान नहीं था कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के बाद भी भाजपा और एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलेगा व यूपीए के दलों की सीटें इतनी कम रहेंगीं कि विपक्षी नेता पद के लिए जरूरी सीटें भी नहीं मिल पायेंगीं।
चुनाव के दौरान भाजपा के नेताओं ने अपनी जीत के आंकड़े बालाकोट में मृतकों की संख्या की तरह प्रस्तुत किये। ऐसे आंकड़े देने में न केवल अमित शाह ही थे अपितु नरेन्द्र मोदी स्वयं भी बार बार किसी भी सैफोलोजिस्ट या राजनीतिक संवाददाता के अनुमानों से कई गुना अधिक आंकड़े दे रहे थे। दूसरी ओर वे अपना सारा जोर पश्चिम बंगाल और उड़ीसा पर लगा रहे थे। साथ ही अंतिम प्रायोजित साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि गठबन्धन सरकार चलाने में भी वे अनाड़ी नहीं हैं।
कोई कुछ भी कहे पर 2019 का आम चुनाव मोदी केन्द्रित चुनाव था जिसमें अपने गठबन्धन और पार्टी के विरोधी गुटों से अलग नरेन्द्र मोदी अकेले विचर रहे थे। अमित शाह उनकी ही परछांई की तरह दो जिस्म एक जान हैं। वैसे  भाजपा ने भगवा भेषधारी अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी अदित्यनाथ को छोड़कर किसी को स्टार प्रचारक नहीं माना। जो पार्टी विधानसभा चुनावों में बिना मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किये चुनाव लड़ती रही है, वह शुरू से ही प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में मोदी का नाम प्रस्तावित करती रही क्योंकि अपने सबसे बड़े समर्पित भक्त को पार्टी अध्यक्ष बनवा कर और सरकार में सबका मुँह बन्द करके वे जो चाहें वह कर सकने में सक्षम रहे। जब चुनाव व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है तो विरोध भी व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है और छवि बनाने के लिए जितना मेकअप किया जाता है, उतना ही प्रयास छवि को उघाड़ने और विकृत करने के लिए होता है। इसलिए दोनों ओर मोदी ही मोदी रहा।
मोदी ने जो पिछली बार करना चाहा था वह काम इस बार उन्होंने प्रत्याशी चयन में कर दिखाया। एक भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है जिसका कद मोदी से बड़ा हो या जिसकी कमीज के दाग दबे छुपे रह गये हों। लालकृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, येदुरप्पा, शांता कुमार, सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्रा, नज़मा हेपतुल्ला आदि को उम्र के नाम पर टिकिट वंचित कर दिया गया तो राम जेठमलानी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, परेश रावल आदि ने दूरदर्शिता से स्वयं को बेइज्जत होने से बचा लिया। जिन्हें प्रत्याशी बनाया गया उनकी एक मात्र योग्यता या तो गैर राजनीतिक कारणों से उनकी निजी लोकप्रियता रही जैसे हेमा मालिनी, सनी देवल, किरण खेर, जयाप्रदा, मनोज तिवारी, रवि किशन, निरहुआ, बाबुल सुप्रियो, राज्यवर्धन सिंह राठौर, गौतम गम्भीर, निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज, प्रज्ञा ठाकुर या पार्टी के रिटायर्ड राजनेताओं के वंशज रहे। युवा चेहरों की सबसे प्रमुख प्रतिभा उनकी अतार्किकता और मोदी भक्ति ही रही। उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो कन्हैया कुमार जैसी प्रतिभा का धनी हो। अपनी लगन और वैचरिक समर्पण के कारण साधारण परिवार से निकले नरेन्द्र मोदी या शिवराज सिंह चौहान को अब इस मोदी जनता पार्टी में प्रवेश नहीं मिल सकता। मोदी राज्यसभा के चयनित सदस्यों के सहारे सरकार चलाने में भरोसा रखते हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि बड़ी घटौत्री के बाद भी मोदी अब भी अन्य सब नेताओं से अधिक स्वीकार्य नेता हैं, किंतु यह भी सच है कि वे अब लोकप्रिय नेता नहीं हैं। उन्होंने जिन नकली प्रयासों से अपने कद को ऊंचा करने का प्रबन्धन किया उनमें से ज्यादातर की कलई खुल गयी है। भाजपा में शेष बचे जो लोग हैं वे उनकी चुनाव जिता सकने की क्षमता से चमत्कृत लोग हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी की कमजोर गठबन्धन वाली सरकार के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत वाली सत्ता का सुख भोग सके हैं। इसलिए नरेन्द्र मोदी तब तक ही उनके नेता हैं जब तक वे उन्हें और पार्टी को जिताने की क्षमता रखते हैं। कार्पोरेट जगत भी तब तक ही पीछे से बल देता है। चुनाव हारने के बाद मोदी केवल अमित शाह के नेता बने रह सकते हैं। चुनाव से पहले एनडीए में सम्मलित शिवसेना ने जिस भाषा में मोदी को याद किया था उसके बाद मोदी की उनसे गलबहियां इस बात का संकेत थीं कि मोदी खुद को कमजोर समझ रहे हैं और दूसरे लाख फुंकार भरते रहने के बाद भी वे स्वाभिमानी नेता नहीं हैं। उ,प्र, में राजभर की पार्टी छोड़ कर जा चुकी है, अपना दल भी आँखें दिखा कर अपना हिस्सा ले जा चुकी है। सावित्री बाई फुले ने खुद और उदितराज ने टिकिट कटने के बाद भाजपा छोड़ दी  थी। लाख कोशिशों के बाद भी एनसीपी, बीजू जनता दल, ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, वायएसआर काँग्रेस केसीआर आदि ने इनसे समझौता नहीं किया और आगे भी कोई करेगा तो बड़ा हिस्सा वसूलने के बाद करेगा। पंजाब, दिल्ली, बिहार, राजस्थान. म.प्र., छत्तीसगढ, गुजरात आदि में सीटों की संख्या पर मतभेद हो सकता है किंतु उनका घटना तय है।
जैसा कि शरद पवार ने कहा है वह सच है कि स्पष्ट बहुमत न आने की दशा में एनडीए के घटक दलों की पसन्द मोदी नहीं होंगे और भाजपा वाले भी उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर करेंगे। जब वे कार्पोरेट जगत के काम के नहीं होंगे तो मुकेश अम्बानी जैसे लोग तो बीच चुनाव में ही देवड़ा परिवार का समर्थन कर संकेत देने लगते हैं। पराजय के संकेत केवल भाजपा के ही नहीं हैं अपितु मोदी की विदाई के भी हैं। 
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 10, 2019

संस्मरण, प्रदीप चौबे कोई बतलाये कि हम बतलायें क्या


संस्मरण,  प्रदीप चौबे
कोई बतलाये कि हम बतलायें क्या
वीरेन्द्र जैन






किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति के मित्र होने का दावा बहुत लोग करते हैं जबकि वह उतने लोगों से घनिष्ठता नहीं रख पाता, पर मेरे और प्रदीप चौबे के रिश्ते तब बने थे जब वे उतने लोकप्रिय नहीं थे. जितने बाद में हो गये थे। हम लोग पत्रिकाओं में साथ साथ प्रकाशित होना शुरू हुये. तब लिखने वालों की इतनी भीड़ नहीं हुआ करती थी और प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएं लिखने पढने का शौक रखने वाले लोग पढ लिया करते थे। तब किताबों के प्रकाशन की भी आज कल जैसी बाढ नहीं आयी थी। 1977 के किसी माह में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका व्यंग्यम में हम लोग साथ साथ मय पते के छपे तो उन्हें पता चला कि मैं भी बैंक की नौकरी में हूं. हम दोनों लोगों ने एक दूसरे को एक ही तारीख को पत्र लिखे और हमारे वे पहले पत्र क्रास कर गये. दोनों ने एक दूसरे की रचनाओं की तारीफ एक साथ की थी, इसीलिए वह 'अहो रूपम अहो ध्वनिम' नहीं थी. तब से लगातार हम लोगों के बीच पत्र व्यवहार रहा। मजे की बात तो यह है कि तब वे अपने डील डौल के कारण अलग से पहचान में आने वाले प्रदीप नहीं थे और तब टीवी इंटरनैट भी नहीं था इसलिए 1982 में जब नागपुर मैं हम लोगों की पहली मुलाकात निश्चित हुयी तब प्रदीप ने लिखा था कि मैं हरे रंग का स्वेटर पहिने होऊंगा उससे पहचान लेना। मैं तब नागपुर में पदस्थ था। बाद में मेल मुलाकातों के किस्से तो बहुत सारे हैं। प्रदीप क्रमशः मंच पर लोकप्रिय होते गये और उन्होंने समझदारी यह की कि बैंक में प्रमोशन नहीं लिया और कैशियर ही बने रहे जिससे उन पर कोई बन्धन लागू नहीं हुआ। इससे उन्हें कवि सम्मेलन के मंचों पर जाने के लिए भरपूर स्वतंत्रता मिली।
वरिष्ठ व्यंग्य कवि माणिक वर्मा की तरह प्रदीप भी मूलतयः गजलगो थे. व्यंग्यजल नाम उन्होंने ही दिया. एक तरह से हिन्दी में स्टेंडअप कामेडी के जनक वे ही थे. बाद में शरद जोशी गद्य व्यंग्य पाठ लेकर मंच पर अवतरित हुये जिसकी शुरुआत मिनी गद्य रचनाओं से प्रदीप कर चुके थे। शरद जोशी भी मंच पर पढने के लिए जिन रचनाओं को तैयार करते थे उनमें एक ही विषय पर छोटी छोटी फब्तियां संकलित की हुयी होती थीं। शरद जोशी ने इस कला में महारत हासिल कर ली थी। प्रदीप और शरद जी दोनों ही लोगों को रचना पाठ की राष्ट्रव्यापी ख्याति रामावतार चेतन के चकल्लस के मंच से मिली थी। मैं भी चेतन जी के आत्मीय लोगों में से था और इस प्रकार चकल्लस परिवार का सदस्य था, यद्यपि उनकी पत्रिका रंग में निरंतर छपने वाला मैं कभी चक्कलस के मंच पर नहीं गया, जबकि चेतन जी ने मेरे संकलन से रचना भी चुन कर रखी थी कि चकल्लस के मंच पर मुझे कौन सी रचना पढनी चाहिए।
प्रदीप के साथ मेरी एक और समानता थी, उन्होंने ग्वालियर में जो एकल काव्य/ रचना पाठ का महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किया था वैसा ही उससे पूर्व कभी मैंने सोचा था। भरतपुर में एक समिति भी बना ली थी जिसमें मंच के ही एक और कवि धनेश फक्कड़ भी साथ थे। पहले कवि के रूप में निर्भय हाथरसी का चयन भी कर लिया था किंतु प्रदीप जैसी  कर्मठता के अभाव में योजना को कार्यान्वित नहीं कर सका। बहुत बाद जब प्रदीप ने उसे पूरा कर दिखाया तो मुझे अपनी जैसी योजना के सफल होने पर बहुत खुशी हुयी थी, लगा था कि मैं गलत नहीं सोच रहा था। प्रारम्भ संस्था की रचना पाठ की इस श्रंखला में उन्होंने देश के प्रमुख रचनाकारों को क्रमशः बुलाया जिसमें कृष्ण बिहारी नूर और के पी सक्सेना सहित एक दो और कार्यक्रम सुनने का अवसर मुझे भी मिला। इस वार्षिक कार्यक्रम में ग्वालियर नगर के सुधी श्रोता और समर्थ साहित्य प्रेमी स्वरुचि से एकत्रित होते थे। भरोसा जगता था कि साहित्य के प्रति प्रेम अभी जिन्दा है व सम्प्रेषणीय साहित्य ही प्रेमचन्द, और परसाई की परम्परा को आगे बढायेगा।
प्रदीप बेलिहाज होकर खुल कर बात करते थे. जबकि मेरे अन्दर सदैव एक संकोच सा रहा। मैं सोच कर बोलता रहा  कि किसी को बात बुरी न लग जाये. प्रदीप और ज्ञान चतुर्वेदी दोनों की स्पष्टवादिता मुझे पसन्द रही है क्योंकि मेरे खुद के अन्दर उसका अभाव रहा है। वे देश के सुप्रसिद्ध कवि शैल चतुर्वेदी के सगे छोटे भाई थे जिसका पता मुझे तब लगा जब आगरा में आयोजित उनके परिवार में होने वाले विवाह समारोह का आमंत्रण मिला। उन्होंने न तो अपनी पहचान शैल चतुर्वेदी के भाई के रूम में बनाई और न ही उनके भाई होने को ही भुनाया।
 उनके कृतित्व को हास्यकवि तक सीमित नहीं किया जा सकता, भले ही वे हास्य व्यंग्य के शिखर के कवियों में थे  और मंच पर प्रतिष्ठित अन्य कवियों की तुलना में अधिक सारगर्भित रचनाएं प्रस्तुत करते थे। किसी व्यंग्य विचार को रूपक में ढालने और उसे मंच पर प्रस्तुत करने में वे बेजोड़ थे। वे हास्य व्यंग्य की रचनाओं के पाठ को बैंक की नौकरी की तरह आजीविका का साधन मानते थे, किंतु उनकी असली प्रतिभा का नमूना उनकी गज़लों, और उनके द्वारा सम्पादित और प्रकाशित वार्षिक पत्रिका प्रारम्भ की रचनाओं के चयन में दिखती है जिसके अंकों में दुनिया भर के श्रेष्ठतम गज़लकारों की श्रेष्ठतम रचनाएं संकलित हैं। एक साक्षात्कार में जब सुप्रसिद्ध कहानीकार और पहल के सम्पादक ज्ञानरंजन से पूछा गया कि आपने कथा लेखन क्यों बन्द कर दिया तो उन्होंने प्रतिप्रश्न किया था कि आप पहल के सम्पादन को रचनाकर्म क्यों नहीं मानते। प्रदीप ने ‘प्रारम्भ’ में प्रकाशित करने के लिए जिन रचनाओं के अम्बार को खंगाल कर मोती चुने होंगे वह काम कोई सामान्य प्रतिभा का व्यक्ति नहीं कर सकता। वे जिन पत्रिकाओं से जुड़े रहे उनसे उनकी रुचि और समझ का पता चलता है। मैंने दर्जनों बार उनके हाथ में सारिका, धर्मयुग और हंस के अंक देखे और देख कर अच्छा लगा। वे ज्यादा अपने से लगे।
एक गज़ल में उनका एक मिसरा था- यादों का दरवाजा बा है, आना है तो आ जाओ। मैंने पूछा यह ‘बा’ क्या है, तो बोले तुम रोज ही तो प्रयोग करते होगे, जैसे मुँह बाना, अर्थात खुला हुआ। मैंने इस शब्द का ऐसा प्रयोग पहली बार ही देखा था। ऐसे ही याद आया कि हम लोग अट्टहास के कार्यक्रम में लखनऊ के गैस्ट हाउस में साथ साथ रुके हुये थे, कि डिनर हेतु आदरणीय उदय प्रताप सिंह जी के साथ जाने का कार्यक्रम बन गया। तब ही पता चला कि आदरणीय नीरज जी भी वहीं रुके हुये हैं तो हम सभी श्रद्धालुओं ने कुछ समय उनके साथ गुजारने का मन बनाया। उस दिन नीरज जी ने कहा था कि आप लोग फिल्मी गीतों को ज्यादा महत्व नहीं देते पर शोले के एक गीत में जो कहा गया है कि – स्टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है तो एक दो तीन हो जाती है। बताओ इससे पहले इस एक दो तीन हो जाने का प्रयोग हिन्दी के किस गीत में हुआ है। प्रदीप चौबे ने कई नये प्रयोग किये थे। शब्दों की तोड़ फोड़ में निर्भय हाथरसी भी माहिर थे।
पिछले दिनों जब प्रदीप के युवा पुत्र का आकस्मिक निधन भोपाल में हो गया था तब मैं भोपाल में नहीं था, लौट कर आने पर पता चला। सोचा फोन करूं, पर हिम्मत नहीं हुयी। सोचता रह गया, सच्ची सम्वेदना के समय मेरे बोल नहीं फूटते। मुनीर नियाजी की वह नज़्म रह रह कर याद आती है – हमेशा देर कर देता हूं मैं.......।
प्रदीप जी भी चले गये। जिन विशिष्ट लोकप्रिय लोगों से मित्रता की दम पर खुद के हीनता बोध को ढक लिया करता था, वे घटते जा रहे हैं। प्रकृति का नियम ही है। 
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 02, 2019

भगवा आतंकवाद पर काँग्रेस रक्षात्मक क्यों?


भगवा आतंकवाद पर काँग्रेस रक्षात्मक क्यों?

वीरेन्द्र जैन
2019 के आम चुनाव में प्रत्याशी म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह काँग्रेस के कुछ विरले नेताओं में से एक हैं जो कांग्रेसी राजनीति के सभी गुणों में पारंगत हैं और एक परिपूर्ण राजनेता हैं। वे एक छोटे से राजपरिवार के सदस्य हैं, शिक्षा से इंजीनियर हैं, सुलझे हुये हैं, आम लोगों के बीच उठते बैठते हैं, प्रदेश में समुचित संख्या में उनके समर्थक और उपकृत लोग हैं। काँग्रेस में उनका एक अलग गुट है, जितने लोग उन्हें पसन्द करते हैं, उतने ही काँग्रेस के दूसरे गुट के लोग उनसे जलते हैं। इन्दिरा गाँधी के समय से ही वे कुछ कुछ सेंटर से लेफ्ट की ओर झुके नजर आते हैं। सारे पूजा पाठ, नर्मदा परिक्रमा, साधुओं की संगत, आदि के बाद भी उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि अन्य कई काँग्रेसियों की तुलना में ज्यादा चमकदार है, वे सबसे ज्यादा मुखर हैं। हो सकता है कि यह उनके प्रबन्धन का ही एक हिस्सा हो, पर यह इतना सफल है कि काँग्रेस को समाप्त करने के सपने देखने वाली भाजपा उन्हें अपना दुश्मन नम्बर एक मानती है।
मुख्य मंत्री के रूप में म.प्र. में अपने दस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने भाजपा के विस्तार पर लगाम लगा कर रखी व उनकी सारी चुनावी योजनाओं की काट प्रस्तुत करते रहे। जो भी विपक्ष का नेता बनता था वह भी उनका मुरीद हो जाता था, और यही कारण रहा कि भाजपा को बार बार अपने विधायक दल का नेता बदलना पड़ा । थक हार कर 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दिग्विजय सिंह के खिलाफ तेज साम्प्रदायिक कार्ड खेला और यब केन्द्र की मंत्री भगवा भेषधारी उमा भारती को उनके न चाहते हुए भी मुख्यमंत्री प्रत्याशी बना कर मैदान में उतार दिया था।  
कर्मचारियों के असंतोष और कांग्रेस की गुटबाजी के कारण वे चुनाव हार गये। प्रायश्चित में उन्होंने दस वर्षों तक कोई पद न लेने व प्रदेश की राजनीति में सक्रिय न होने का फैसला लेकर उस पर अमल भी किया। इस दौरान अपनी राजनीतिक चेतना के कारण, घटनाओं पर तात्कालिक सटीक राजनीतिक टिप्पणियों से काँग्रेस के प्रमुख नेता बने रहे। दस वर्ष के बाद ही उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार की और काँग्रेस के महासचिव के रूप में राहुल गाँधी के प्रमुख सलाहकार बने रह कर पूरी काँग्रेस को संचालित करते रहे। जब राजनीति व्यक्ति केन्द्रित होने लगती है तो प्रतिक्रिया में व्यक्ति की छवि को भी झूठे सच्चे आरोपों से धूमिल करने का काम भी उसका विरोध पक्ष करने लगता है। सोनिया गाँधी को विदेशी ईसाई महिला और राहुल गाँधी को पप्पू कह कर बदनाम किया गया था। दिग्विजय सिंह को भी न केवल मुसलमानों का पक्षधर अपितु आतंकियों का पक्षधर तक प्रचारित कर दिया गया। भाजपा के पास शुरू से ही एक मजबूत दुष्प्रचार एजेंसी रही है जो पहले मौखिक प्रचार के रूप में संघ के नेतृत्व में काम करती थी, तब भी इसे रियूमर स्पोंसरिंग संघ कहा जाता था। इसी एजेंसी ने कभी देश के सबसे मजबूत विपक्ष कम्युनिष्ट पार्टी को विदेश के इशारे और पैसे पर संचालित होने वाला दल कह कर बदनाम किया था। बाद में तो कम्युनिष्ट देशों में वृद्धों को मार देने से लेकर तरह तरह से वैज्ञानिकता विरोधी प्रचार किये जिसमें जल विद्युत का अर्थ पानी में से बिजली निकाल कर उसे खेती के लिए अनुपयुक्त बना देने तक था। उनका यह काम लगातार जारी रहा और बाद में अखबारों, पत्रकारों से लेकर टीवी का स्तेमाल करते हुए ब्लाग्स फेसबुक और व्हाट’स एप्प तक उन्हें बेनामी होकर अफवाहें फैलाने की सुविधा मिलती गयी।
दूसरी ओर काँग्रेस किसी बरबाद हो चुके साम्राज्य की तरह ढहती गयी। उसके पास कुछ पुराने खण्डहर होते किले और जंग लगी तोपें व सामंती अहंकार शेष बचा।  काँग्रेस अपनी अपनी हवेलियों को सम्हाले दरबारियों के समूह में बदलती गयी जो आपस में भी जंग करते रहे और निजी लाभ के लिए एकजुट भी होते रहे। काँग्रेस की चिंता करने वाला और उसमें रह कर उसी को नुकसान करने वालों के प्रति कठोर होने का साहस करने वाला कोई नहीं बचा। ऐसी ही दशा में भाजपा काँग्रेस पर लगातार हमलावर होती गयी, कार्पोरेट घरानों से जुड़ कर उसके प्रभावी सदस्यों को खरीदती गयी, दुष्प्रचार से इतिहास तक को बदनाम करती गयी व चुनाव जीतने के लिए दोदलीय व्यवस्था जैसी स्थितियां बनाती गयी।  
काँग्रेस चुनावी परिस्तिथियों के अनुकूल होने पर भले ही गठबन्धन की सरकार बनाती गयी हो किंतु उसकी संगठन क्षमता निरंतर क्षीण होती गयी। विचारधारा को समर्पित कार्यकर्ताओं की फसल बिल्कुल सूख गयी। नेताओं के पट्ठे पैदा होते गये जो कांग्रेस के लिए नहीं अपितु अपने उस्ताद के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसी दशा में भाजपा अपनी कुशल संगठन क्षमता के कारण निरंतर जड़ें जमाती गयी। भले ही 2004 से 2014 तक काँग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार रही किंतु संसद भाजपा के चाहने पर ही चल सकी। उन्होंने सफलतापूर्वक झूठ का सिक्का चलाया। उनकी इस क्षमता के लिए बार बार पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर का वह शे’र याद आता है-
मैं सच कहूंगी और फिर भी हार जाऊंगी
वो झूठ बोलेगा, और लाजवाब कर देगा
पिछले दिनों भोपाल लोकसभा चुनाव क्षेत्र से काँग्रेस के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के मुकाबले भाजपा को कोई सही उम्मीदवार नहीं मिला [ बकौल राजनाथ सिंह] तो उन्होंने विभिन्न बम विस्फोटों और हत्याओं के लिए आरोपित, स्वास्थ के आधार पर जमानत पर छूटी प्रज्ञा ठाकुर को यह कह कर चुनाव में उतार दिया कि वे निर्दोष हैं और उन्हें जानबूझ कर फंसाया गया था। इस्लामिक आतंकवाद की तर्ज पर दिग्विजय सिंह ने विभिन्न मुस्लिम इबादतगाहों में हुये विस्फोटों को भगवा आतंकवाद कहा था, पर पूजा पाठी दिग्विजय सिंह का वह मतलब नहीं था जो संघ परिवार ने प्रचारित किया। उन्होंने प्रचारित किया कि उन्होंने सभी हिन्दुओं को आतंकवादी कह दिया है जबकि हिन्दू तो शांतिप्रिय और सहिष्णु होता है। सच तो यह है कि समझौता एक्सप्रैस, अजमेर. हैदराबाद, जामा मस्जिद, मालेगाँव, मडगाँव, आदि स्थानों पर जो बम विस्फोट हुये थे वे उन आतंकवादी घटनाओं की प्रतिक्रिया में साम्प्रदायिक दिमाग के लोगों ने किये थे, जिन्हें इस्लामिक आतंकवाद कहा गया था। जब इस्लामिक आतंकवाद कहने से सारे मुसलमानों को आतंकवादी नहीं माना जाता है तो हिन्दू समाज के एक वर्ग विशेष के लोगो द्वारा किये गये कारनामों की जिम्मेवारी पूरे हिन्दू समाज पर कैसे डाली जा सकती है। भगवा आतंकवाद कहने का इतना ही मतलब था कि इस घटना को करने वाले अपराधी हिन्दू थे और उन्होंने वैसी ही प्रतिक्रिया में मुस्लिम इबादतगाहों को निशाना बनाया। जाँच एजेंसियों ने कुछ लोगों की पहचान कर सबूत जुटाये व मामला दर्ज कराया जिनमें प्रज्ञाठाकुर भी एक आरोपी थीं।
दुखद यह है कि दुष्प्रचार के डर से कांग्रेस इस निर्दोष बयान को स्पष्ट करने की जगह इसे छुपाने में लगी है, और एक झूठ सिर चढ कर बोल रहा है। घटनाएं हुयी हैं, जाँच में कुछ लोग पकड़े गये हैं, मुकदमे चल रहे हैं, सरकारी वकील को इस कारण वकालत छोड़ना पड़ी क्योंकि वर्तमान सरकार ने इस प्रकरण में धीमे चलने को कहा था जिसे उन्होंने कानून के हक में नहीं माना। व्यापम और ई-टेन्डरिंग समेत अनेक भ्रष्टाचरणों से रंगी आरोपी पार्टी चुनावों में साम्प्रदायिक रंग लाकर मुद्दे बदल चुकी है तो निर्दोष काँग्रेस अपने सच को भी सामने नहीं ला पा रही है। काँग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने अपने होंठ सिल लिये हैं और कह रहे हैं कि मैं साध्वी के बारे में कुछ भी नहीं बोलूंगा।
यह सत्य की हार और असत्य की जीत है। कांग्रेस अगर सच बोलने का साहस नहीं जुटाती तो वह पार्टी को समाप्त करने के भाजपाई सपने को पूरा कर रही होगी।
वीरेन्द्र जैन
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