सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

आरएसएस और पारदर्शिता


सूप तो सूप छलनी भी बोले जिसमें सौ छेद
               आरएसएस और पारदर्शिता
                                                                          वीरेन्द्र जैन
      राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने गत दिनों यूपीए अध्यक्ष सोनिया गान्धी पर आरोप लगाया कि वे  इमरजेंसी वाली मानसिकता की है जो निरंकुश शासन और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति का परिचायक है। उनका कहना है कि श्रीमती गान्धी ने अलोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया है जो कि एक समानांतर सत्ता केन्द्र है। आर्गनाइजर और पाँचजन्य के ताजा अंकों के माध्यम से संघ का कहना है कि वे इसी मानसिकता के के चलते वे देश  की जनता से अपना धर्म, बीमारी और आयकर सम्बन्धी जानकारी भी छुपाती हैं।
      रोचक यह है यह व्यक्तिगत जानकारियों को सार्वजनिक न करने का यह प्रश्न एक ऐसे संगठन ने उठाया है जो स्वयं में ही न केवल झूठ की नींव पर खड़ा है अपितु जिसके सारे के सारे काम गोपनीय होते हैं और जिसके लोग अपनी सच्चाई छुपाने के लिए हमेशा निरर्थक प्रतिक्रियावादी सवाल उठा कर अपनी कमजोरियां छुपाने की कोशिश करते रहते हैं। स्मरणीय है कि संघ अपने आप को सांस्कृतिक संगठन की तरह पंजीकृत कराये हुए हैं जबकि वे न केवल हर कोण से राजनीतिक हैं अपितु सांस्कृतिक कार्यों से उनका दूर का भी नाता नहीं है। 1948 में महात्मा गान्धी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब उसे उठाने के लिए दिये गये प्रार्थना पत्र में संघ के नेतृत्व ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को आश्वस्त करते हुए कहा था कि संघ कभी भी राजनीति में भाग नहीं लेगा। पर संघ ने इस वादे पर कभी अमल नहीं किया और अपने स्वयं सेवक भेज कर जनसंघ पार्टी का गठन करा दिया। उस समय से लेकर अब तक जनसंघ, जिसने बाद में अपना नाम भारतीय जनता पार्टी रख लिया है, के सभी स्तर के संगठन सचिव अनिवार्य रूप से आरएसएस के प्रचारक ही होते हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने सारे नीतिगत मुद्दों की पुष्टि संघ के नेतृत्व से लेता है तथा संगठन से लेकर सरकार तक की सारी नियुक्तियां संघ से पूछ कर ही की जाती हैं। जनसंघ के सबसे पहले अध्यक्ष मोल्लि चन्द्र शर्मा ने संघ के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण ही अपने पद से त्यागपत्र दिया था व उसके बाद कोई अध्यक्ष संघ से टकराने की हिम्मत नहीं कर सका।  संघ के पदाधिकारियों की नियुक्ति में किसी लोकतांत्रिक तरीके का प्रयोग नहीं होता है पर वे दूसरे को अलोकतांत्रिक बता कर निन्दा करने में सबसे आगे रहते हैं और ऐसा करने में उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती। पाकिस्तान जाकर ज़िन्ना के मजार पर फूल चढाने के बाद उनकी प्रशंसा करने के आरोप में अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेता को पार्टी अध्यक्ष का पद संघ के आदेश पर छोड़ना पड़ता है, और संघ की नापसन्दगी के कारण जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को लोकसभा में विपक्ष के नेतापद से वंचित करने के लिए निकालने का ड्रामा किया जाता है। गडकरी जैसे साधारण और दोयम दर्जे के नेता को देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अपना अध्यक्ष संघ के आदेश पर ही चुनती है तथा उपलब्धिहीन कार्यकाल के बाद भी दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार बैठी है। अपने इन फैसलों के लिए देश तो क्या अपनी बगल बच्चा पार्टी के लोगों को भी वे विश्वास में लेने की जरूरत नहीं समझते।
      स्मरणीय है कि संघ अपने विशाल संगठन को संचालित करने के लिए धन संचय करता है और यह धन गुरु दक्षिणा के रूप में बन्द लिफाफों में लेने का ढोंग करता है। इन बन्द लिफाफों के पीछे का राज यह है कि उन्हें काले सफेद देशी विदेशी धन को ग्रहण करने के बारे में कोई जबाब नहीं देना पड़े। उल्लेखनीय है कि उनके पास एकत्रित धन की पवित्रता के बारे में समय समय पर सन्देह व्यक्त किये जाते रहे हैं। यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ किसी के व्यक्तिगत धन के बारे में  अतिरिक्त चिंताएं दर्शा रहा है जिसने स्वयं द्वारा प्रसूत राजनीतिक दल के नेताओं की सम्पत्ति और आय को घोषित करने के बारे में  तब भी आग्रह नहीं किया जब कि उनकी राजनीतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष खुले आम नोटों के बंडल लेता हुआ कैमरे की कैद में आ जाता है और उसके एक दूसरे बड़े नेता को उसके भाई ने अतिरिक्त धन के लालच में गोली मार दी थी व उसका सुपुत्र इसी धन के मद में ‘जवानी की भूल’ कर रहा था।
      उल्लेखनीय है कि संघ की सदस्यता का कोई रजिस्टर नहीं होता और वे अपनी सुविधा अनुसार किसी को भी अपना सदस्य घोषित कर देते हैं या उससे इंकार कर देते हैं। नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गान्धी की हत्या कर देने के बाद संघ ने कह दिया था कि गोडसे ने गान्धीजी को मारने से पहले संघ को छोड़ दिया था। यही बात पिछले दिनों कई आतंकी बम विस्फोटों के लिए आरोपी बनायी गयी प्रज्ञा सिंह व उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद कही गयी थी। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जो संगठन अपनी सदस्यता के लिए किसी भी फार्म या रजिस्टर के न होने का दावा करता है वह कुछ ही घंटों में यह कैसे बता देता है कि कौन अब उसके संगठन का सदस्य नहीं है।

                यद्यपि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों के जीवन में पारदर्शिता को उनके विशेष गुण के रूप में देखा जाना चाहिए किंतु किसी दूसरे व्यक्ति विशेष से इसका आग्रह करते समय भूमि के कानून से अधिक की अपेक्षा करना न्याय संगत नहीं है। इसकी जगह ऐसी माँग रखने वाले लोगों को अपनी सम्पत्ति और आय की घोषणा करके एक बड़ी लकीर खींच कर दिखाना चाहिए। वैसे चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना अनिवार्य है और उनके द्वारा दिया गया शपथपत्र चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध होता है। सन 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान श्रीमती सोनिया गान्धी ने जो शपथ पत्र प्रस्तुत किया था उसके अनुसार उनके पास कुल एक करोड़ सैंतीस लाख की कुल सम्पत्ति है जिसमें से एक करोड़ सत्तरह लाख की चल सम्पत्ति और बीस लाख की अचल सम्पत्ति है। चल सम्पत्ति बैंक जमा, म्यूचल फंड आदि के रूप में है।
      किसी की बीमारी और धर्म के बारे में जानने का दुराग्रह नितांत अनैतिक और अशालीन है। एक धर्म निरपेक्ष देश में जहाँ प्रत्येक धर्म, जाति, लिंग, को समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं वहाँ किसी के धर्म को जानने की अनाधिकार कोशिश कोई साम्प्रदायिक सोच का व्यक्ति या संगठन ही करना चाहेगा। स्मरणीय है कि पिछले दिनों संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन ने श्रीमती सोनिया गान्धी के विरुद्ध जब अनर्गल बयान दिया था तब उन्हीं के संगठन के लोगों ने उनके मानसिक स्वास्थ ठीक न होने के बहाने अपना मान बचाया था, पर यदि कोई उनके मानसिक स्वास्थ के बारे में अतिरिक्त जिज्ञासा करता तो क्या संघ के लोगों को अच्छा लगता?
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, फ़रवरी 19, 2012

उत्तर प्रदेश के एन आर एच एम घोटाले - दूसरे राज्य कब सबक लेंगे?


उत्तर प्रदेश के एनआरएचएम घोटाले
 दूसरे प्रदेश कब सबक लेंगे?
वीरेन्द्र जैन
      उत्तर प्रदेश में शर्मनाक अति हो चुकी है। वहाँ एनआरएचएम घोटालों से जुड़े नौ व्यक्तियों की सन्देहात्मक परिस्तिथियों में क्रमशः मृत्यु हो चुकी है और इन मौतों के हत्या होने में शायद ही किसी को सन्देह हो। इतना ही नहीं इन मौतों में से ज्यादातर को आत्महत्या बनाने की कोशिशें भी हुयी हैं। कुछ मौतें तो सरकारी कस्टडी में हुयी हैं। इससे पहले भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में शायद ही इतने ठंडे तरीके से किसी चर्चित मामले में क्रमशः हत्याओं का दुस्साहस पूर्ण कारनामा हुआ हो।
      यह केवल सरकारी संरक्षण में चल रहे आर्थिक भ्रष्टाचार तक सीमित मामला नहीं है अपितु यह पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े करता है कि हम किस जंगल तंत्र में जीने को विवश हैं। इस जंगलतंत्र का एक रूप हमने गुजरात में देखा था जहाँ आज भी अपराधी न केवल स्वतंत्र हैं अपितु शान से सत्ता सुख लूट रहे हैं क्योंकि वे अपने दुष्प्रचार से मतदाताओं के एक वर्ग को बरगलाने में सफल हैं और हम लोकतंत्र के नाम पर उनको अपने अपराध छुपाने दबाने व जाँच एजेंसियों को प्रभावित करने की ताकत देने के लिए मजबूर हैं। हरियाणा में चुनावों से ठीक पहले कुछ लोग खाप पंचायत के फैसले के नाम पर सरे आम हत्याएं कर देते हैं और लगभग सभी पार्टियों में बैठे, सत्तासुख के लिए वोटों के याचक उनका खुल कर विरोध भी नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें एक जाति के नाराज हो जाने का खतरा था। न्याय व्यवस्था के रन्ध्रों में से निकल कर लम्बे समय तक सुख से जीने वाले अपराधी न्याय में भरोसा रखने वालों को मुँह चिढाते लगते हैं जिसके परिणामस्वरूप लोग जंगली न्याय में भरोसा करने लगते हैं। समाज में बढती हिंसा के पीछे यह एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। जो लोग न्याय को लम्बे समय तक टलवाते रहने के दोषी हैं वे भी सजा मिलने के बाद में अपनी उम्र और बीमारी का सहारा लेकर सजा माफ करने की अपील करते हैं और कई बार इसे स्वीकार भी कर ली जाती है। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में कमजोर अभियोजन के सहारे सतारूढ दल से जुड़े अपराधी खुले आम किये गये अपराधों में भी सन्देह का लाभ पाकर छूट रहे हैं। इससे सारे अपराधी सत्तारूढ दल के नेताओं का संरक्षण तलाशने और उनके पक्ष में आतंक पैदा कर लोकतंत्र को कलंकित कर रहे हैं।
      जनप्रतिनिधि चुने जाने और सत्ता में आने के बाद संविधान में विश्वास होने की शपथ लेनी होती है, किंतु जब ये राजनेता उसी शपथ का उल्लंघन करते हैं तो उन्हें चुने जाने के बाद भी उस पद पर नहीं रहने दिया जाना चाहिए। उसकी जगह उनके ही दल के किसी दूसरे बेदाग सदस्य को जनप्रतिनिधि नामित किया जा सकता है जिससे लोकतंत्र की भावना को ठेस नहीं लगे। संविधान विरोधी काम करने वाले अपराधी को संविधान सम्मत शासन चलाने और कानून बनाने की जिम्मेवारी नहीं सौंपी जा सकती। जब तक व्यक्ति की जगह दल को महत्व नहीं मिलेगा तब तक लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। यही कारण है कि आज विचार और कार्यक्रम की जगह विभिन्न कारणों से लोकप्रिय व्यक्तियों, अवैध तरीके से धन कमाने वालों या मतदाताओं को आतंकित करने वाले दबंगों को टिकिट देने की बीमारी सभी दलों में घर करती जा रही है जिसका नमूना हमने हाल के विधान सभा चुनावों में टिकिट वितरण समेत सभी पिछले चुनावों के दौरान भी देखा है। एक राष्ट्रीय दल ने तो उसी आरोपी राजनेता को अपने दल में सम्मलित करने में किंचित भी शर्म महसूस नहीं की जिसके भ्रष्टाचार का विरोध वे लगातार करते आ रहे थे। उल्लेखनीय है कि यही दल सबसे अधिक शुचिता का ढिंढोरा पीटता रहता है।
      देखा गया है कि जनता की ओर से माँग उठे बिना जब सामाजिक विकास और सशक्तिकरण की योजनाएं लागू की जाती हैं तो वे भ्रष्टाचार की शिकार हो जाती हैं। हितग्राही वर्ग को पता ही नहीं होता कि उसके लिए कोई योजना आयी है और उसके लिए पात्रता के क्या मापदण्ड निर्धारित किये गये हैं। सरकारी नौकरशाही उसे किसी खैरात की तरह देती है और उसमें से अपना हिस्सा काट लेती है। कई बार तो पूरी की पूरी राशि ही डकार ली जाती है। छत्तीसगढ में आदिवासियों के विकास के लिए आवंटित राशियों के साथ यही खेल चलता रहा है व उन क्षेत्रों में पदस्थ किये गये इंजीनियर और विकास अधिकारियों की सम्पत्तियां आँखें खोल देती हैं। इसी का परिणाम है कि वहाँ आज नक्सलवादियों के आवाहनों का असर होता है पर सरकारी मशीनरी को नफरत की निगाह से देखा जाता है। आर्थिक भ्रष्टाचार के सामाजिक प्रभावों के बारे में बहुत कम बातें की गयी हैं और केवल उसके आर्थिक पक्ष को ही देखा जाता है। राष्ट्र्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन में भ्रष्टाचार का केवल आर्थिक पक्ष ही नहीं है अपितु यह भी देखा जाना जरूरी है कि उस भ्रष्टाचार के कारण कितने शिशुओं की अकाल मौतें हुयी हैं और कितने कुपोषण के शिकार हुये हैं। जब ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने वाली बीमारियों और जननी सुरक्षा के लिए आवंटित राशि में भ्रष्टाचार से लगातार मौतें हो रही हैं तब प्रत्येक राज्य में एनआरएचएम में भ्रष्टाचार के लिए दोषी पाये जाने वालों पर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। जिले के स्वास्थ अधिकारी का काम केवल बीमार की चिकित्सा करना भर नहीं है अपितु उसे बीमारी न फैलने देने के लिए टीकाकरण और दूसरी सावधानियों के प्रति भी सक्रिय होना चाहिए।
      एनआरएचएम योजना देश के अठारह राज्यों में लागू की गयी थी जिसके लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को धन उपलब्ध कराया था। जो भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश में उजागर हुआ है वही मध्यप्रदेश समेत दूसरे राज्यों में भी जारी है। प्रदेश के अनेक अधिकारी और मंत्री आयकर विभाग व लोकायुक्त की जाँच के घेरे में हैं व भविष्य में आ सकते हैं क्योंकि मध्य प्रदेश में राजनैतिक चेतना का स्तर काफी पिछड़ा हुआ है जिससे मीडिया भी सत्ता के प्रभाव से ग्रस्त रहता है। भ्रष्टाचार का कोई भी बड़ा मामला मीडिया के द्वारा सामने नहीं आया है। बहुत छोटे अखबारों की कहीं कोई पहुँच नहीं है और बड़े अखबार गम्भीरतम मामलों में भी शर्मनाक चुप्पी साधे रहते हैं। उत्तर प्रदेश में जिस ढंग से यह घोटाला हुआ है उसी को आधार बना कर मध्य प्रदेश समेत सभी सम्बन्धित अठारह राज्यों में तुरंत गहन निरीक्षण कराया जाना चाहिए ताकि समय रहते कुछ सुधारात्मक उपाय किये जा सकें।
      एक महत्वपूर्ण कथन है कि जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते वे उसे दुहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

उमा भारती और उत्तर प्रदेश के चुनाव


उमा भारती और उत्तर प्रदेश के चुनाव
वीरेन्द्र जैन
      उमा भारती की भाजपा में वापिसी और उनका मध्य प्रदेश से निष्कासन ही नहीं अपितु उसके बाद का घटनाक्रम भी नाटकीय रहा है। भाजपा जैसी रामलीला पार्टी में यह बहुत अस्वाभाविक भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में उन्हें न केवल चुनाव का स्टार प्रचारक ही बनाया गया अपितु एक सीट से उम्मीदवार भी बनाया गया है। जब प्रदेश भाजपा का कोई दूसरा कोई बड़ा नेता यह दावा भी नहीं कर रहा है कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो उसे ही मुख्य मंत्री बनाया जायेगा किंतु तब उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने वाले प्रमुख नेताओं में मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और एनडीए शासन काल में केन्द्रीय सरकार में मंत्री रही उमा भारती का दिवास्वप्न अस्वाभाविक नहीं है बशर्ते कि वे स्वयं चुनाव जीत जायें और उनकी पार्टी स्वयं में इतनी सीटें जीत ले ताकि किसी दूसरे दल से समझौता करके सरकार बनाने में सफल हो पाये। किंतु यह अन्धविश्वास किसी मुंगेरीलाल को भी नहीं है कि भाजपा पहले तीन पायदान तक पहुँच सकेगी इसलिए उमाभारती  के नेतृत्व के सवाल पर सभी मन्द मन्द मुस्कराते हुए मौन हैं। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। चुनाव परिणामों के बाद न तो कांग्रेस भाजपा को गठबन्धन में सम्मलित कर सकती है और न ही समाजवादी पार्टी। बहुजन समाज पार्टी ने जितनी बार भी भाजपा के साथ सरकार बनायी तब सदैव ही भाजपा को निचले पायदान पर रखा है और गठबन्धन के समय अधिक सदस्य होते हुए भी पहले अपने नेतृत्व वाली सरकार बनायी। तय है पुनः ऐसा कोई अवसर आने पर मायावती भाजपा के नेतृत्व में सरकार चलाने की जगह विपक्ष में बैठना अधिक पसन्द करेंगीं। इसलिए यह तो तय है कि न तो भाजपा की सरकार बन रही है और न ही उमा भारती मुख्यमंत्री। कहा जा रहा है कि उन्हें इसलिए चरखारी से टिकिट दिया गया है ताकि वे बीच चुनाव में कोई बहाना ले कर भाग न निकलें। स्मरणीय है कि बाबू सिंह कुशवाहा के साथ भाजपा द्वारासौदा करने का तीव्र विरोध उन्होंने इसीलिए किया था बरना सुखराम जयललिता आदि से लेकर चौटाला आदि द्वारा समर्थित एनडीए सरकार में मंत्री रहने में उन्हें कभी कोई आपत्ति नहीं रही।  
      इस विषय में रोचक यह है कि मध्य प्रदेश के वे नेता उनकी जीत की कामना और प्रयास कर रहे है जो उनके घनघोर विरोधी रहे हैं। वे चाहते हैं कि उमा भारती इधर से टलें ताकि वे चैन की साँस ले सकें। स्मरणीय है कि बड़ामल्हरा उपचुनाव के दौरान उमा भारती ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर उनकी हत्या का षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया था। यही कारण है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा के पट शिष्य शिवराज उमाभारती से वैसी ही दुश्मनी मानते हैं जैसी कि पटवाजी मानते हैं। पिछले दिनों ही पटवाजी ने एक बयान में उमाभारती के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था कि वे अब मध्य प्रदेश की वोटर ही नहीं रहीं। पहले भी उन्होंने उमा भारती के बारे में टिप्पणी करते हुए त्रिया चरित्रस्य पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः कह कर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। उल्लेखनीय है कि उमा भारती का जिक्र आने पर उनके स्वर में कटुता आ जाती है।
      उत्तर प्रदेश भाजपा में दूसरे भगवा भेषधारी नेता योगी आदित्यनाथ हैं जो भाजपा में रहते हुए भी भाजपा में नहीं हैं अपितु भाजपा उनमें है। वे भाजपा के अनुशासन में नहीं रहते व संघ परिवार के समानांतर अलग से वैसे ही अपने संगठन बनाये हुए हैं। वे भाजपा नेताओं का सम्मान नहीं करते अपितु चुनाव जीतने के लिए भाजपा नेता उनकी चिरौरी करते हैं। विधानसभा के पिछले चुनावों के दौरान भी वे भाजपा को छोड़ कर चले आये थे तब भाजपा के बड़े बड़े नेता उनको मनाने उनके दर पर गये थे और क्षमा मांगते हुए उनके सभी लोगों को उन जगहों से टिकिट दे दिया था जिनके लिए योगी ने आदेश दिया था। अभी भी गत दिनों योगी ने लखनऊ में एक प्रैस कांफ्रेंस में कहा कि किसी को भी बहुमत नहीं मिलेगा। चुनाव के दौरान दिया गया यह बयान यथार्थवादी होते हुए भी न केवल अप्रत्याशित था अपितु इस बात का भी प्रमाण था कि भाजपा नेतृत्व को भी चुनाव जीतने का कोई भरोसा नहीं है। दूसरी ओर नईदिल्ली में भाषण करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भाजपा की चुनावी नैया उत्तर प्रदेश में डांवाडोल हो रही है। भाजपा उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आनेवाली है इसलिए स्वयं सेवकों को चाहिए कि वे आँख मूंद कर भाजपा का समर्थन नहीं करें। भाजपा का समर्थन केवल वहीं किया जाये जहाँ वह जीतने की स्थिति में है। उन्होंने अन्य स्थानों पर बहुजन समाज पार्टी का समर्थन करने का आवाहन किया।
      यदि उमाभारती अपनी सीट जीत लेती हैं तो वे जिन्दगी भर के लिए मध्यप्रदेश से बाहर हो जायेंगीं और यदि हार जाती हैं तो उनके नेतृत्व पर सदा के लिए सवालिया निशान लग जाता है। यह भी तय हो जायेगा कि जिन लोधी वोटों के लालच में उमाभारती को उम्मीदवार बनाया था वैसा कुछ नहीं बचा तथा लोधियों का नेतृत्व कल्याण सिंह आदि नेता ही करते हैं। गतदिनों  अपनी भारतीय जनशक्ति की ओर से जब मध्य प्रदेश की सभी सीटों पर उन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, तब पूरे प्रदेश में कुल मिला कर उन्हें 12 लाख वोट मिल सके थे। उत्तर प्रदेश में पराजय के बाद वे कहीं की नहीं रहेंगीं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टरर्लिंग, रायसेन रोड
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शनिवार, दिसंबर 31, 2011

दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर और् शिक्षा माफिया,


राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर, और शिक्षामाफिया
                                                               वीरेन्द्र जैन
      कोई भी भारतीय नागरिक देश में चुनाव आयोग के पास  पंजीकृत डेढ हजार दलों में से [कैडर आधारित एक बामपंथी दल को छोड़ कर] किसी भी दल की सदस्यता सरलता पूर्वक ग्रहण कर सकता है और शायद ही किसी दल ने सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले नागरिक को साधारण सदस्य बनाने से इंकार किया हो। जो दल साम्प्रदायिक समझे जाते हैं वे भी दूसरे समुदाय के सदस्य मिलने पर अपने ऊपर लगे दाग को धोने का नमूना बनाते हुए उसे खुशी खुशी सदस्यता देते हैं, और अन्यथा न जीतने की सम्भावना वाली सीटों से टिकिट भी देते हैं।
      पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव आयोग ने स्वच्छ चुनाव कराने की दृष्टि से कुछ  नियमों का पालन करना अनिवार्य तो किया है पर दलों पर ऐसी कोई आचार संहिता लागू नहीं की गयी है जिससे वे हमारे संविधान निर्माताओं के सपनों के अनुसार ही आचरण कर के एक आदर्श लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करें। आज हमारे अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दल अनेकानेक विकृत्तियों के शिकार हैं और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने व उसका दुरुपयोग करने का प्रयास करने वालों के गिरोह बन गये हैं। किसी दल का व्यय कैसे चलता है इसकी जानकारी ना तो चुनाव आयोग को होती है और ना ही यह जानकारी सार्वजनिक  होती है। आज जब चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी सम्पत्ति घोषित करना और चुनाव खर्च का दैनिक अडिट होना अनिवार्य कर दिया गया है तो उन उम्मीदवारों को टिकिट देने वाले राजनीतिक दलों के आय व्यय को गोपनीय क्यों रहना चाहिए। जो दल देश के शासक बन सकते हैं उन्हें पारदर्शी होना चाहिए।
      किसी उद्योग द्वारा किसी दल को चन्दा देना कहाँ तक उचित है? यह काम अगर कोई व्यक्ति करता है तो एक मतदाता के रूप में यह उसकी व्यक्तिगत पसन्दगी नापसन्दगी का सवाल होता है किंतु प्रतिष्ठान के रूप में किसी कम्पनी द्वारा किसी दल को चन्दा देने का सीधा सीधा मतलब होता है कि वह एक अनुचित पक्षधरता की चाह में दी गयी रिश्वत है, ताकि सरकार बनने की स्तिथि में उक्त दल उनका मददगार हो। ऐसा होता भी है। रोचक यह है कि एक ही औद्योगिक संस्थान एक से अधिक दलों को चुनावी चन्दा देते हैं जो निश्चित रूप से चुनावी चन्दा नहीं हो सकता क्योंकि एक वोट देने की क्षमता रखने वाला कोई व्यक्ति या कम्पनी का निदेशक भिन्न विचारधारा वाले एक से अधिक दलों में विश्वास कैसे व्यक्त कर सकता है। यह परोक्ष में एक व्यापारिक सौदेबाजी ही होती है। नीरा राडिया के टेप्स और जनार्दन रेड्डी द्वारा अपनी जेब का मुख्य मंत्री बनवाने के बाद वैसे ही प्रधानमंत्री बनवाने का सपना देखने की खबरें इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह बात आज पूरा देश जानता है कि भूमाफिया. खननमाफिया, बिल्डर, शिक्षामाफिया, शासकीय सप्लायर, ठेकेदार, आयातक निर्यातक, उद्योगापति आदि ही सरकारें बनवाने में भूमिकाएं निभा रहे हैं अपने पक्ष में नीतियां बनवा रहे हैं। मंत्री और जनप्रतिनिधि इनसे घिरे रहते हैं तथा उनके दस्तखत किये हुए खाली लैटरहैड उनके ब्रीफकेस में पड़े रहते हैं।
      आम तौर पर दल अपने सिद्धांत और घोषणाएं कुछ और बताते हैं तथा चुनाव के बाद आचरण कुछ और करते हैं। जब कोई छोटी मोटी चीज बेचने वाला अपने पैकिट पर  लिखी सामग्री से कुछ भिन्न बेचती पाया जाता है तो अपराधी माना जाता है किंतु पूरे देश की जनता को धोखा देने वाला किसी कानून के अंतर्गत नहीं आता। चुनाव आयोग के पास दलों को अपने चुनावी लाभ के लिए अपने घोषित सिद्धांतों से विचलित होने को रोकने के कोई अधिकार नहीं हैं और न ही इसके लिए ऐसी ही कोई अन्य संस्था या विभाग कार्यरत है। कुछ दलों को छोड़ कर अधिकतर दल किसी नेता की अपनी महात्वाकांक्षा, उसके जातीय, क्षेत्रीय सम्पर्क या गैर राजनैतिक कारणों से अर्जित लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से बना लिए जाते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है कि चुनाव आयोग में पंजीकृत कराते समय उसके कार्यक्रम और घोषणा पत्र पर आयोग द्वारा उससे पूछा जाये कि जब उसके दल के घोषणा पत्र में वे ही सारे विन्दु हैं जो पहले से पंजीकृत दूसरे दल में भी हैं तो वह उस दल के साथ मिलकर काम क्यों नहीं कर सकता! बहुत सारे छोटे दल दूसरे बड़े दलों को चुनावी नुकसान पहुँचाने अर्थात लोकतंत्र की भावना को विचलित करने के लिए बना लिये जाते हैं, जिन्हें परोक्ष में उनके विपक्षी मदद कर रहे होते हैं। कुल मिलाकर सारी कवायद लोकतंत्र के नाम पर शासन को कुछ निहित स्वार्थों तक केन्द्रित कर देने के लिए होती है। यह बात पहले कभी दबी छुपी रहती थी पर अब जग जाहिर हो चुकी है। किसी भी व्यवस्था में अगर समय रहते सुधार नहीं होते हैं तो फिर विकृतियों से जनित दुर्व्यवस्था के खिलाफ कभी भी अचानक गुस्सा फूट पड़ता है जो सुधार तो नहीं कर पाता पर स्थापित व्यवस्था को नुकसान अवश्य पहुँचा देता है। इसलिए जरूरी है कि उभरती विकृतियों के समानांतर उसके उपचार भी किये जायें। कुछ उपाय निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित किये जा सकते हैं-
  • राजनीतिक दलों और उनके सदस्यों को एक घोषित आचार संहिता में बाँधा जाये, तथा उस का पालन अनिवार्य किया जाय।
  • दलों की सदस्यता को बेकामों, बेरोजगारों की फौज बनाने की जगह अपने दल की घोषणाओं के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के रूप में अनिवार्य बनाये जाने के उपाय किये जायें। इसके लिए दलों में पदोन्नति के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण की कक्षाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • दलों द्वारा अपनाये गये सामाजिक सुधार के कुछ निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाना चाहिए, जैसे कि सक्षम सदस्यों द्वारा रक्तदान, नेत्र दान, परिवार में टीकाकरण, परिवार नियोजन के आदर्शों का पालन, अपने द्वारा पालित बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, सती प्रथा, दहेज प्रथा, साम्प्रदायिकता का सक्रिय विरोध आदि
  • प्रत्येक सदस्य से आय के अनुपात में लेवी तय की जाना चाहिए।
  • चुनाव के लिए टिकिट दिये जाने के सम्बन्ध में कुछ न्यूनतम पात्रताएं तय की जाना चाहिए। इसमें दल में सदस्यता की अवधि भी एक प्रमुख पात्रता होना चाहिए।
  • किसी दल का सदस्य यदि कोई अपराध करता है तो उसके मूल में दल की सामूहिकता का बल भी उसके ध्यान में रहता है। इसलिए आरोप लगने पर दल द्वारा तुरंत जाँच और उसके अनुसार कार्यवाही का किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उसकी आँच दल तक न पहुँचे और कोई दल के भरोसे अपराध करने से बचे।
सभी पंजीकृत दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढावा देकर भी दलों और परोक्ष में देश की शासन व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। इससे कुकरमुत्तों की तरह उग आये जेबी दल भी कम हो कर सच्चे लोकतंत्र को स्थापित होने में सहयोग करेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

विचारों की अस्थिरिता से अन्ना हजारे की चमक खो रही है


विचारों की अस्थिरता से अन्ना की चमक खो रही है
वीरेन्द्र जैन
      कवि मुकुट बिहारी सरोज ने कभी कहा था-            
अस्थिर सब के सब पैमाने
तेरी जय जय कार जमाने
बन्द किवार किये बैठे हैं
अब कोई आये समझाने
फूलों को घायल कर डाला
कांटों की हर बात सह गये
कैसे कैसे लोग रह गये
      भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनभावनाओं के प्रतीक बन गये  अन्ना हजारे की अस्थिर मानसिकता पर सरोजजी की यह कविता याद आनी स्वाभाविक है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भ्रष्टाचार देश में एक बड़ी समस्या है और देश की दूसरी बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए उठाये कदम भी इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ कर भटक जाते हैं, जिससे वांछित लक्ष्य नहीं मिल पाते। अन्ना हजारे और गिने चुने लोगों की उनकी टीम के पास न तो न तो कोई सुचिंतित विचारधारा है और न ही वह जनतांत्रिक ढंग से काम करती है। वे अपने आप में एकांगी होने के कारण यह भी नहीं सोचना चाहते कि किसी बड़ी और व्यापक बुराई को दूर करने के लिए उससे भी बड़े और अधिक शक्तिशाली संगठन तथा परिवर्तन की एक बेहतर कार्य प्रणाली की जरूरत होती है, जिसके अभाव में जेपी और वीपी का आन्दोलन अपने ऐसे ही लक्ष्य नहीं पा सका था। अन्ना हजारे की टीम ने अपनी मनमानी करके सामाजिक परिवर्तन के एक सम्भावनाशील आन्दोलन को उभार कर भटका दिया है।
      भावनाओं के ज्वार में बिना उचित विमर्श के लिये गये फैसले और असफलताओं के बाद ठुकरायी गयी सलाहों को मानने पर विवश होने से उनके नेतृत्व की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगता है।
      आन्दोलन के अपने प्रारम्भिक दौर में उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से दूरी बनायी और एक सिरे से सबको अपराधी व चोर कहा। रोचक यह है कि उन्होंने इसी संसदीय व्यवस्था और चुनाव प्रणाली में पूर्ण आस्था व्यक्त करते हुए सारे सुधारों को संवैधानिक ढंग से लागू करने के लिए नया कानून बनवाना चाहा। इसकी दूसरी तरफ कानून बनाने वाली संसद को चोर ठहराते रहे। इसका मतलब साफ था कि वे किसी एक जगह झूठ या नासमझी को प्रकट कर रहे थे। उनके सदस्यों ने जनलोकपाल के प्रस्ताव को रखते हुए कहा भी था कि अगर संसद इसे पास कर देगी तो अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारेगी। अर्थात उनका विश्वास इस संसद से इसे पास कराने में नहीं था और वे संभवतः पूरी संसदीय प्रणाली को परोक्ष में बदनाम करने का खेल खेल रहे थे।
      भीड़ को भुनाने वाले राजनीतिक दलों को उनका करिश्मा आकर्षक लगा तो उन्होंने उनके मंच को हथियाना चाहा पर उन्होंने सबसे पहले पहुँचने वाले ऐसे नेताओं उमा भारती, ओमप्रकाश चौटाला, अरुण जैटली आदि को मंच तक फटकने नहीं दिया था तथा संघ के राम माधव को भी मंच से उतार दिया था। दूसरे अनशन के समय भी जब भाजपा के अनंत कुमार और गोपीनाथ मुंडे ने प्रयास किया था तो उन्हें दूर रहने के लिए कहा गया था। जब किसी भी राजनीतिक दल ने उनके जनलोकपाल बिल का समर्थन नहीं किया तो अपने आन्दोलन के अगले चरण में उन्होंने अपने एनजीओ नुमा समर्थकों से क्षेत्रीय विधायक और सांसदों का घेराव करने का आवाहन किया था ताकि वे संसद में जनलोकपाल बिल का समर्थन करें। उनका यह आवाहन सफल नहीं हुआ और उनके द्वारा जुटायी गयी भीड़ का उत्सवधर्मी चरित्र प्रकट हो गया, जो हवाई फायर तो कर सकती है पर मैदान में नहीं लड़ सकती। बाद में संघ के नेताओं की खुली घोषणा से यह तथ्य भी प्रकट हो गया कि उनके अनशन तमाशे को न केवल संघ ने परोक्ष में पूरा सहयोग दिया था अपितु अनशन के साथ चलने वाले लंगर को भी उन्होंने ही चलवाया था। अपने नकार में कमजोर अन्ना टीम यह नहीं बता सकी कि यदि संघ के नेताओं की बात झूठी थी, तो सत्य क्या था!
      हरियाणा के हिसार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का विरोध करते हुए उन्होंने दूसरे दो जिन दलों को चुनावी लाभ देने का दावा किया वे किसी भी तरह से अपने चरित्र में कांग्रेस से भिन्न नहीं थे। उनकी इस गलत चाल ने उनके मेधा पाटकर सन्दीप पाण्डे सहित दो प्रमुख समर्थकों को उनसे विमुख कर दिया। जबकि कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े, और स्वामी अग्निवेश पहले से ही अलग हो चुके थे। अरुन्धति राय तो वैसे भी उनके समर्थन में नहीं थीं।
      अपने पिछले तौर तरीके को पलटते हुए 11 दिसम्बर 2011 के धरने पर अन्ना ने सारे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने मंच पर बुलवाया जो राजनीतिक कारणों से वहाँ गये पर उनमें से किसी ने भी उनके जनलोकपाल बिल का पूरा समर्थन नहीं किया। जब इन नेताओं की उपस्थिति में केजरीवाल ने उनसे लोकपाल के गठन, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति, और शिकायत निवारण तंत्र आदि पर रुख स्पष्ट करने को कहा तो  सीपीआई के डी राजा ने उनके हाथों से माइक छीन कर कहा कि ये बहस की जगह नहीं है, इस विषय पर जो भी बहस होगी वह संसद में होगी। भाजपा के राज्य सभा में नेता वकील अरुण जैटली ने कहा कि बुनियादी मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी राय पहले ही सार्वजनिक कर दी है और विशिष्ट मुद्दों पर बहस का जिम्मा संसद का है। माकपा की नेता वृन्दा करात ने भी कहा कि मजबूत लोकपाल के लिए जो भी जरूरी होगा वह संसद करेगी, लोकपाल के दायरे में निजी कारोबारी घरानों को लाये जाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि ये लोग देश को लूट रहे हैं। सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने तो साफ साफ कहा कि अन्ना की टीम के नौ दस लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हीं के पास सारी बुद्धि है और वे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो लोग इनकी बातों से सहमत नहीं हैं, उसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि वे भ्रष्ट लोगों के समर्थक हैं। एक सौ बीस करोड़ के देश में विद्वानों की कमी नहीं है। अन्ना को यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि जन लोकपाल बिल का एक एक शब्द मान लिया जायेगा। आपको राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाने की समझ आयी यह अच्छी बात है- कभी नहीं से देर भली। राजनीतिक वर्ग की प्रासंगिकता को कम करके मत आँकिए। अकेले जनलोक पाल बिल के पास हो जाने से भ्रष्टाचार नहीं मिट जायेगा। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने हजारे टीम से संयम बरतने की सलाह दी, जो यहाँ आकर तिरंगा लहराते हैं वे इटावा में भ्रष्टाचार करते हैं। शरद यादव ने तो अन्ना पक्ष को सीधे उपेक्षित करते हुए कहा कि वे चाहेंगे कि सदन की भावना के अनुरूप जो प्रस्ताव पास किया गया था उसमें तनिक भी बदलाव न हो।
      राजनीतिक दलों के नेताओं के भाषण से यह साफ हो गया कि वे कानून बनाने के मामले में अन्ना को कोई श्रेय या दखल देने को तैयार नहीं हैं। वहीं अन्ना ने अपने समर्थकों के लिए कुछ सूत्र घोषित किये जो 1-शुद्ध आचरण, 2- शुद्ध विचार, 3- निष्कलंक जीवन, 4- अपमान सहने की ताकत,। रोचक यह है कि अन्ना की टीम में से शायद ही कोई इन पर खरा उतरे।   
      अन्ना ने स्वयं भी जिस तरह से सोनिया गान्धी और राहुल गान्धी पर व्यक्तिगत हमले किये हैं वे शुद्ध आचरण और शुद्ध विचारों को प्रकट नहीं करते क्योंकि ये हमले भाजपा के तौर तरीकों के निकट हैं। भाजपा जानती है कि कांग्रेस की एकता के सूत्र नेहरू परिवार में केन्द्रित हैं और उन्हें बदनाम करने से कांग्रेस कमजोर होगी। यही कारण है कि वे सच जानते हुए भी सरकार और कांग्रेस को छोड़ कर सरकार से बाहर रहने वाले राहुल गान्धी को लक्ष्य बना रहे हैं। यह संघी तरीका है जो सोनिया गान्धी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद धर्मांतरणों के बहाने ईसाइयों तक पर इसीलिए हमले करने लगा है ताकि उन को किसी तरह साम्प्रदायिक दायरे में लाया जाये। वे उनके कुम्भ स्नान या किसी हिन्दू समारोह में भाग लेने पर भी आपत्ति करने से नहीं चूकते। शरद पवार पर पड़े थप्पड़ के मामले में दी गयी अपनी प्रतिक्रिया पर वे अपने गान्धीवाद की कलई खोल ही चुके हैं। विवादस्पद मुद्दे के समय मौन धारण कर वे किसी बेहद साधारण राजनेता की तरह प्रकट हो चुके हैं।
      अन्ना को आत्ममंथन के बाद अपने दर्शन और कार्यक्रम को तैयार करना चाहिए, उस पर देश के प्रमुख व्यक्तियों से सलाह करना चाहिए और फिर परिणाम की चिंता किये बिना अपना कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। यदि वे दिन प्रति दिन अपने विचार और कार्यक्रम बदलते रहे तो जल्दी ही वे अपनी चमक खो देंगे जो पिछले दिनों से काफी कम हो चुकी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
 

शनिवार, दिसंबर 17, 2011

राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर और शिक्षा माफिया


राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर, और शिक्षामाफिया
                                                               वीरेन्द्र जैन
      कोई भी भारतीय नागरिक देश में चुनाव आयोग के पास  पंजीकृत डेढ हजार दलों में से [कैडर आधारित एक बामपंथी दल को छोड़ कर] किसी भी दल की सदस्यता सरलता पूर्वक ग्रहण कर सकता है और शायद ही किसी दल ने सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले नागरिक को साधारण सदस्य बनाने से इंकार किया हो। जो दल साम्प्रदायिक समझे जाते हैं वे भी दूसरे समुदाय के सदस्य मिलने पर अपने ऊपर लगे दाग को धोने का नमूना बनाते हुए उसे खुशी खुशी सदस्यता देते हैं, और अन्यथा न जीतने की सम्भावना वाली सीटों से टिकिट भी देते हैं।
      पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव आयोग ने स्वच्छ चुनाव कराने की दृष्टि से कुछ  नियमों का पालन करना अनिवार्य तो किया है पर दलों पर ऐसी कोई आचार संहिता लागू नहीं की गयी है जिससे वे हमारे संविधान निर्माताओं के सपनों के अनुसार ही आचरण कर के एक आदर्श लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करें। आज हमारे अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दल अनेकानेक विकृत्तियों के शिकार हैं और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने व उसका दुरुपयोग करने का प्रयास करने वालों के गिरोह बन गये हैं। किसी दल का व्यय कैसे चलता है इसकी जानकारी ना तो चुनाव आयोग को होती है और ना ही यह जानकारी सार्वजनिक  होती है। आज जब चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी सम्पत्ति घोषित करना और चुनाव खर्च का दैनिक अडिट होना अनिवार्य कर दिया गया है तो उन उम्मीदवारों को टिकिट देने वाले राजनीतिक दलों के आय व्यय को गोपनीय क्यों रहना चाहिए। जो दल देश के शासक बन सकते हैं उन्हें पारदर्शी होना चाहिए।
      किसी उद्योग द्वारा किसी दल को चन्दा देना कहाँ तक उचित है? यह काम अगर कोई व्यक्ति करता है तो एक मतदाता के रूप में यह उसकी व्यक्तिगत पसन्दगी नापसन्दगी का सवाल होता है किंतु प्रतिष्ठान के रूप में किसी कम्पनी द्वारा किसी दल को चन्दा देने का सीधा सीधा मतलब होता है कि वह एक अनुचित पक्षधरता की चाह में दी गयी रिश्वत है, ताकि सरकार बनने की स्तिथि में उक्त दल उनका मददगार हो। ऐसा होता भी है। रोचक यह है कि एक ही औद्योगिक संस्थान एक से अधिक दलों को चुनावी चन्दा देते हैं जो निश्चित रूप से चुनावी चन्दा नहीं हो सकता क्योंकि एक वोट देने की क्षमता रखने वाला कोई व्यक्ति या कम्पनी का निदेशक भिन्न विचारधारा वाले एक से अधिक दलों में विश्वास कैसे व्यक्त कर सकता है। यह परोक्ष में एक व्यापारिक सौदेबाजी ही होती है। नीरा राडिया के टेप्स और जनार्दन रेड्डी द्वारा अपनी जेब का मुख्य मंत्री बनवाने के बाद वैसे ही प्रधानमंत्री बनवाने का सपना देखने की खबरें इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह बात आज पूरा देश जानता है कि भूमाफिया. खननमाफिया, बिल्डर, शिक्षामाफिया, शासकीय सप्लायर, ठेकेदार, आयातक निर्यातक, उद्योगापति आदि ही सरकारें बनवाने में भूमिकाएं निभा रहे हैं अपने पक्ष में नीतियां बनवा रहे हैं। मंत्री और जनप्रतिनिधि इनसे घिरे रहते हैं तथा उनके दस्तखत किये हुए खाली लैटरहैड उनके ब्रीफकेस में पड़े रहते हैं।
      आम तौर पर दल अपने सिद्धांत और घोषणाएं कुछ और बताते हैं तथा चुनाव के बाद आचरण कुछ और करते हैं। जब कोई छोटी मोटी चीज बेचने वाला अपने पैकिट पर  लिखी सामग्री से कुछ भिन्न बेचती पाया जाता है तो अपराधी माना जाता है किंतु पूरे देश की जनता को धोखा देने वाला किसी कानून के अंतर्गत नहीं आता। चुनाव आयोग के पास दलों को अपने चुनावी लाभ के लिए अपने घोषित सिद्धांतों से विचलित होने को रोकने के कोई अधिकार नहीं हैं और न ही इसके लिए ऐसी ही कोई अन्य संस्था या विभाग कार्यरत है। कुछ दलों को छोड़ कर अधिकतर दल किसी नेता की अपनी महात्वाकांक्षा, उसके जातीय, क्षेत्रीय सम्पर्क या गैर राजनैतिक कारणों से अर्जित लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से बना लिए जाते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है कि चुनाव आयोग में पंजीकृत कराते समय उसके कार्यक्रम और घोषणा पत्र पर आयोग द्वारा उससे पूछा जाये कि जब उसके दल के घोषणा पत्र में वे ही सारे विन्दु हैं जो पहले से पंजीकृत दूसरे दल में भी हैं तो वह उस दल के साथ मिलकर काम क्यों नहीं कर सकता! बहुत सारे छोटे दल दूसरे बड़े दलों को चुनावी नुकसान पहुँचाने अर्थात लोकतंत्र की भावना को विचलित करने के लिए बना लिये जाते हैं, जिन्हें परोक्ष में उनके विपक्षी मदद कर रहे होते हैं। कुल मिलाकर सारी कवायद लोकतंत्र के नाम पर शासन को कुछ निहित स्वार्थों तक केन्द्रित कर देने के लिए होती है। यह बात पहले कभी दबी छुपी रहती थी पर अब जग जाहिर हो चुकी है। किसी भी व्यवस्था में अगर समय रहते सुधार नहीं होते हैं तो फिर विकृतियों से जनित दुर्व्यवस्था के खिलाफ कभी भी अचानक गुस्सा फूट पड़ता है जो सुधार तो नहीं कर पाता पर स्थापित व्यवस्था को नुकसान अवश्य पहुँचा देता है। इसलिए जरूरी है कि उभरती विकृतियों के समानांतर उसके उपचार भी किये जायें। कुछ उपाय निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित किये जा सकते हैं-
  • राजनीतिक दलों और उनके सदस्यों को एक घोषित आचार संहिता में बाँधा जाये, तथा उस का पालन अनिवार्य किया जाय।
  • दलों की सदस्यता को बेकामों, बेरोजगारों की फौज बनाने की जगह अपने दल की घोषणाओं के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के रूप में अनिवार्य बनाये जाने के उपाय किये जायें। इसके लिए दलों में पदोन्नति के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण की कक्षाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • दलों द्वारा अपनाये गये सामाजिक सुधार के कुछ निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाना चाहिए, जैसे कि सक्षम सदस्यों द्वारा रक्तदान, नेत्र दान, परिवार में टीकाकरण, परिवार नियोजन के आदर्शों का पालन, अपने द्वारा पालित बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, सती प्रथा, दहेज प्रथा, साम्प्रदायिकता का सक्रिय विरोध आदि
  • प्रत्येक सदस्य से आय के अनुपात में लेवी तय की जाना चाहिए।
  • चुनाव के लिए टिकिट दिये जाने के सम्बन्ध में कुछ न्यूनतम पात्रताएं तय की जाना चाहिए। इसमें दल में सदस्यता की अवधि भी एक प्रमुख पात्रता होना चाहिए।
  • किसी दल का सदस्य यदि कोई अपराध करता है तो उसके मूल में दल की सामूहिकता का बल भी उसके ध्यान में रहता है। इसलिए आरोप लगने पर दल द्वारा तुरंत जाँच और उसके अनुसार कार्यवाही का किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उसकी आँच दल तक न पहुँचे और कोई दल के भरोसे अपराध करने से बचे।
सभी पंजीकृत दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढावा देकर भी दलों और परोक्ष में देश की शासन व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। इससे कुकरमुत्तों की तरह उग आये जेबी दल भी कम हो कर सच्चे लोकतंत्र को स्थापित होने में सहयोग करेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की जरूरत तो है पर अवसर नहीं




           लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की जरूरत तो है पर अवसर नहीं
                                                             वीरेन्द्र जैन
            केन्द्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला का कहना है कि अब देश में नियंत्रित लोकतंत्र अपनाने का समय आ गया है। उनका कहना एक ओर तो समस्याओं की ओर उनकी चिंताओं को दर्शाता है किंतु दूसरी ओर ऐसा हल प्रस्तुत करता है जिसकी स्वीकार्यता बनाने के लिए एक तानाशाही शासन स्थापित करना होगा। स्मरणीय है कि लोकतंत्र का सुख भोग चुके समाज में अब यह सहज सम्भव नहीं है। श्रीमती इन्दिरागान्धी ने एमरजैंसी लगाने के बाद चुनाव हारा था और दुबारा चुन कर आने के बाद कहा था कि वे अब दुबारा कभी एमरजैंसी नहीं लगायेंगीं।
      असल में हमारे देश में जो लोकतंत्र है, उसमें आदर्श घोषणाएं तो बहुत हैं पर व्यवहार में सक्षम द्वारा निर्बल का शोषण सम्भव है। कमजोर न्याय व्यवस्था के कारण सबल और शोषक द्वारा निर्बल के शोषण के खिलाफ दोषियों को दण्डित करना सम्भव नहीं हो पाता, भले ही इसके लिए हमने अच्छे अच्छे कानून बना रखे हैं। प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण विकास और सशक्तीकरण के कार्यक्रम सफल नहीं हो पाते। इसी भ्रष्टाचार से जनित ताकत का प्रभाव चुनावी व्यवस्था पर भी पड़ता है परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में शोषकों के प्रतिनिधि वहाँ बैठ जाते हैं और संसदीय सुधार द्वारा परिवर्तन को सम्भव नहीं होने देते। राष्ट्र के प्रति चिंतित प्रत्येक व्यक्ति के मन में इस दुष्चक्र को तोड़ने की चिंता स्वाभाविक है किंतु यह उन लोगों द्वारा सम्भव नहीं है किंतु जो स्वयं भी इस तंत्र की कमजोरियों से लाभान्वित हो रहे हैं।
      लोकतंत्र से मिले मानव अधिकारों का सर्वाधिक उपयोग भी शोषकवर्ग कर रहा है और मानव अधिकार की ओट में सुरक्षा प्राप्त कर रहा है। न्याय व्यवस्था के छिद्रों के कारण अधिकांश सक्षम लोग दण्ड से बच जाते हैं और घटित अपराध की किसी को भी सजा न मिलने के कारण समाज में कानून के शासन के प्रति अविश्वास बढता जा रहा है, जिससे जंगली न्याय बढता जा रहा है। अदालत से अपने पक्ष में लम्बे समय के लिए स्टे [यथास्थिति] ले लेना और मुकदमों को लम्बा खींचना आम बात हो गयी है। झूठी गवाही से गलत फैसला होने और लालच के आधार पर गवाही से मुकर जाने वालों को जब दण्ड नहीं मिल पाता तो न्याय मजाक सा लगने लगता है। सक्षम लोग इसीलिए अपना फैसला अपनी लाठी से आप ही करने लगे हैं।
      जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में पचास प्रतिशत से अधिक लोग मतदान ही नहीं करते हों और दिये गये मतों में असली नकली का प्रतिशत निकालना कठिन होता हो तो उस लोकतंत्र पर सन्देह होना स्वाभाविक है। लगातार किये गये विभिन्न चुनाव सुधारों के आते रहने से पता चलता है कि हम पिछले दिनों किस तरह के विकृत चुनावी तंत्र से स्थापित शासनों द्वारा शासित होते रहे हैं। राजनीतिक रूप से अशिक्षित मतदाताओं के डाले गये मत भी उस भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करते जो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना होती है। वे मत तो दबाव से, लालच से, भटका के, साम्प्रदायिक, जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी भावनाएं उभारकर भी डलवा लिये जाते हैं। अपने स्वार्थों के लिए सत्ता हथियाने के प्रयास करने वाले गलत तुष्टीकरण से लेकर गैरकानूनी काम करने वालों को मदद करने तक के हथकण्डे अपनाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप अपराधी तत्व राजनेताओं पर दबाव बना कर रहते हैं। जो तंत्र स्वयं के बनाये कानून के खिलाफ काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के दबाव में काम करने को विवश हो उसे कितना सफल कहा जा सकता है! जिन परम्पराओं, रूढियों, और अन्धविश्वासों को दूर करने के लिए नेतृत्व को काम करना चाहिए था वही वोटों की लालच में उन्हें बढाने में लग गया है। एक तरह की साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए दूसरे तरह की साम्प्रदायिकता से आँखें मूंद ली जाती हैं जिससे साम्प्रदायिकता का उन्मूलन होने की जगह उनमें प्रतियोगिताएं बढ रही हैं।  
      पुलिस तो अपने विशेष अधिकारों और शक्तियों के कारण पहले ही से बदनाम थी पर नौकरशाही और सेना में भी जिस तरह के भ्रष्टाचार उजागर हुये हैं वे हतप्रभ कर देने वाले हैं। जिस मीडिया को लोकतंत्र के हित में वाचडाग की तरह काम करना चाहिए था, वह बिकाऊ बन चुका है जिसका मतलब है कि चौकीदार चोरों से कमीशन ले रहा है। वह चुनावी नेताओं की वैसी छवि बनाने का धन्धा करने लगा है जैसे वे नहीं हैं, किंतु  वैसी बनावटी छवि से उन्हें चुनावी सफलता मिलना सम्भव हो सके।
      कुल मिला कर कहा जा सकता है कि हम जिसे लोकतंत्र मान रहे हैं वह लोकतंत्र है ही नहीं। जरूरत इस बात की है कि लोकतंत्र जिस स्वरूप में होना चाहिए था और नहीं हो पा रहा है उसकी बाधाओं को दूर किया जाये व इसके लिए न्याय व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाये। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद के सुर में सुर मिलाते हुए केंद्रीयमंत्री फारुख अब्दुल्ला जिस मर्यादित लोकतंत्र की बात करने लगे हैं वह इस व्यवस्था में गैर कानूनी लोगों से ज्यादा उन लोगों को नियंत्रित करने लगेगी जो सच्चे लोकतांत्रिक हैं और सार्थक ढंग से असहमति व्यक्त करते हैं। फारुख अब्दुल्ला साहब ने यह नहीं बतलाया कि कथित मर्यादित लोकतंत्र की जिम्मेवारी जिन लोगों के कन्धों पर आयेगी वे किस आधार पर चुने गये होंगे। इसलिए पहली आवश्यकता है जनता को जागरूक बनाना और चुनावी प्रणाली मैं सुधार में सुधार किया जाना।
वीरेन्द्र जैन
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