शनिवार, सितंबर 28, 2013

राष्ट्रीय एकता परिषद का सोशल मीडिया पर गुस्सा

राष्ट्रीय एकता परिषद का सोशल मीडिया पर गुस्सा
वीरेन्द्र जैन
       गत दिनों एक अरसे बाद आयोजित राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक का अपने उद्देश्यों में असफल होना चिंता का विषय है। ऐसी बैठकें किसी घटना के बाद राजनीतिक दलों, केन्द्र व राज्यों की सरकारों और कुछ चयनित बुद्धिजीवियों का सामूहिक स्यापा और कभी पूरा न होने वाले संकल्पों की औपचारिकता के बाद समाप्त हो जाती रही हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। ऐसा महसूस किया गया है कि वे सही विन्दु पर पहुँचना ही नहीं चाहते इसलिए औपचारिकता का निर्वाह भर कर के रह जाते हैं। मुज़फ्फरनगर की हिंसा के बाद आयोजित सन्दर्भित बैठक इस बार सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर सारी जिम्मेवारी डाल कर और प्रधानमंत्री के दृढ संकल्प के दुहराव के साथ समाप्त हो गयी। इस बैठक में व्यक्त विचारों से ऐसा लगा जैसे कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग ही समस्या की असली जड़ है जबकि यह साम्प्रदायिक संगठनों के हाथ में आया केवल एक नया साधन भर है, जिसका प्रयोग धर्मनिरपेक्षता के हित में भी किया जा सकता है। असल समस्या तो धर्मान्धता, और राजनीतिक आर्थिक हित में उस अन्धत्व का लाभ उठाने वालों से निबटने की है। वोटों की राजनीति के शिकार जनता से कटे हुए दल तरह तरह के बहानों से इस अन्धत्व निवारण के बड़े परिश्रम से बचते लगते हैं, जबकि इसके विपरीत साम्प्रदायिक दल इसी अन्धत्व में अपना हित पाने के कारण उसे बनाये ही नहीं रखना चाहते अपितु उसमें वृद्धि करने के प्रति निरंतर सक्रिय हैं।
       मूल लड़ाई निष्क्रिय धर्मनिरपेक्षता और सक्रिय साम्प्रदायिकता के बीच है जिसमें लगातार धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ कर पराजित हो रही है और साम्प्रदायिकता अपनी पूरी कुटिलता के साथ नये नये दाँव चलती जा रही है। उत्तर प्रदेश की ताज़ा घटनाएं, जिनके कारण इस बैठक को आहूत किया गया था, इसी का परिणाम हैं।
       सोशल मीडिया के दुरुपयोग करने में साम्प्रदायिक संगठन अग्रणी रहे हैं  और लाखों की संख्या में छद्म पहचानों से नफरत फैलाने के काम को आगे बढाया है। ऐसा वे इसलिए कर सके क्योंकि उनके पास पहले से ही एक बड़ा प्रचारतंत्र कार्यरत था। इस मीडिया के प्रारम्भ के साथ ही वे बहुत कुशलता से तर्क विहीन धार्मिकता और भौगोलिक राष्ट्रवाद को बढावा देने की ओट में नफरत भरे लेखों और टिप्पणियों की बाढ ले आये थे तथा गलत नामों वाली पहचानों से उन पर पसन्दगी के ढेर लगाने लगे जिससे ऐसा भ्रम फैले कि उनकी बात को सबसे ज्यादा पसन्द किया जा रहा है। कुछ एग्रीगेटर ज्यादा पसन्दगी के आधार पर प्रतिदिन मेरिट लिस्ट बनाते थे जिसमें इसी झूठी पसन्दगी के आधार पर साम्प्रदायिकों की पोस्टों को पहली दस पोस्टों में आना तय होता था। इस कारण से इन पोस्टों को दूसरे वे लोग भी पढने की कोशिश करते थे जिन्होंने इन्हें पहले नहीं पढा होता था। यही छद्म नाम गन्दी गन्दी गालियों से छुटपुट रूप से आने वाली धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर पोस्टों को हतोत्साहित करने में जुट जाते थे। इन छद्म नामधारियों की टिप्पणियों के पोस्टिंग समय को देख कर ऐसा लगता रहा है कि ये किसी व्यक्ति विशेष के विचार भर नहीं हैं अपितु किसी सुव्यवस्थित कार्यालय से संचालित हो रही हैं एक ही छद्म नाम से विभिन्न वेबसाइटों पर चयनित अद्यतन सूचनाओं से भरी पूरे चौबीसों घंटे टिप्पणियां आते रहना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं हो सकता। गत वर्ष गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान यह सच सामने आया था कि मोदी के प्रचारक ट्विटर पर नकली फालोअर बनवा कर भ्रम पैदा करा रहे हैं। अक्टूबर 2012 में लन्दन की एक कम्पनी ने ट्विटर के आंकड़ों का पर्दाफाश करते हुए यह गड़बड़ी पकड़ी थी और बताया था कि दस लाख फालोअर्स का दावा करने वाली साइट के आधे से अधिक फालोअर्स नकली हैं।  सूचना तकनीक बहुत आगे बढ चुकी है और हम लोग दावा करते हैं कि हमारे यहाँ ऐसे तकनीकी विशेषज्ञ लाखों की संख्या में निकल रहे हैं तो क्यों नहीं झूठ पर आधारित साम्प्रदायिकता फैलाने वाली इन पोस्टों के छद्मनामों से सक्रिय अपराधियों की पहचान इसके प्रारम्भ से ही किये जाने की कार्यवाही की गयी और न अब की जा रही है। यदि ऐसा किया जा सके तो उनके सांगठनिक जुड़ाव का खुलासा किया जा सकता है।
       तकनीक पर आधारित सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए इसे तकनीकी विशेषज्ञों की मदद और प्रशासनिक कार्यवाहियों से ठीक किया जा सकता था। उल्लेखनीय है कि जब से एक खास संगठन से निकले लोग आतंकी गतिविधियों के लिए पहचाने और पकड़े गये थे तब से देश में आतंकी गतिविधियां न केवल बन्द हो गयी हैं अपितु उन से जुड़े राजनीतिक दल को आतंकवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या बताने के बहाने एक खास समुदाय को निशाना बना कर साम्प्रदायिकता फैलाने का काम करना स्थगित करना पड़ा था। यदि करकरे जैसे पुलिस अधिकारियों की शहादत से सबक लेते हुए उनके कार्यकाल के दौरान उनका विरोध करने वालों की पहचान कराने का काम लगातार चलाया जाता तो साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को रक्षात्मक बनाया जा सकता था। स्मरणीय है कि शहीद करकरे की पत्नी ने उनकी शहादत के बाद मोदी द्वारा दी गयी एक करोड़ की रकम को इसीलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनके जीवनकाल में मोदी गिरोह ही उनके महत्वपूर्ण कार्यों का लगातार विरोध कर रहा था, और उनके खिलाफ आन्दोलन की धमकियां दे रहा था।
       भले ही राष्ट्रीय एकता परिषद की उपलब्धियां हमें वांछित लक्ष्यों तक नहीं पहुँचा सकी हों किंतु उसमें  उन तक पहुँचने के संकल्प बिन्दु होने की सम्भावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। ये कैसी दुखद स्थिति है कि कुछ खास पार्टियों के मुख्यमंत्री और नेता जानबूझ कर इसकी बैठक से अनुपस्थित रहते हैं और इसमें उपस्थित होने वाले उनकी जिम्मेवारियों से विमुख होने को ढंग से प्रचारित भी नहीं कर पाते। इस बात को बार बार रेखांकित किये जाने की जरूरत है कि साम्प्रदायिक दंगों को उनके प्रारम्भ होने के कारणों तक सीमित रखने से काम नहीं चलने वाला अपितु उस षड़यंत्रपूर्ण कूटनीति के विरुद्ध लगातार काम करने की जरूरत है जो घटना के पात्रों को तुरंत ही समुदायों के कामों में बदल देने का माहौल बनाने में निरंतर सक्रिय रहती हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यकलापों की निरंतर समीक्षा किये जाने और सक्षम अधिकारियों को जानकारी देने का काम भी राष्ट्रीय एकता परिषद द्वारा किये जाने का तंत्र बनाया जाना चाहिए।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

         

सोमवार, सितंबर 16, 2013

प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी पर मोदी के चयन से नया कौन जुड़ेगा?

 प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी पर मोदी के चयन से नया कौन जुड़ेगा?
वीरेन्द्र जैन

       बुन्देली भाषा में एक वाक्यांश आता है- मुँह का ज़बर होना। जब कोई अतार्किक ढंग से अपनी बात ठेलता हुआ दूसरे को बोलने ही नहीं देता तो उसे मुँह का ज़बर कहा जाता है। भारतीय राजनीति में कहा जा सकता है कि भाजपाई मुँह के ज़बर हैं। जो लोग भी टीवी चैनलों पर होने वाली बहसें सुनते हैं वे जानते हैं कि अधिकांश भाजपाइयों या भाजपा समर्थकों की यह कोशिश रहती है वे निरर्थक और अतार्किक बातों से इतना समय खराब कर दें ताकि उनसे भिन्न विचार रखने वालों को अपनी बात रखने का अवसर कम से कम मिले। संसद के सदनों में वे शोर मचा कर सदन को चलने नहीं देते ताकि तर्क और तथ्यों को स्थान नहीं मिले। जो नारेबाजी सड़कों पर करना चाहिए उसे वे संसद में करते हैं और सदन को स्थगित करना पड़ता है। इस तरह वे बहस को ठेल कर अपना काम तो चला लेते हैं पर इससे उनका अपराधबोध प्रकट हुए बिना नहीं रहता। उनके इस कारनामे से कुछ कुशिक्षित लोग भले ही बरगलाये जा सकते हों पर समझदार लोगों के सामने उनकी कार्यप्रणाली और चरित्र स्पष्ट हो जाता है।  
       जिन मोदी को सोचे समझे ढंग से एन केन प्रकारेण लगातार प्रचारित किया जाता रहा है उनके प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाये जाने पर ऐसा प्रकट किया गया है जैसे वे एनडीए के एक दल के बहुमत से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की जगह प्रधानमंत्री ही बन गये हों। यह तूमार उनकी छवि सुधारने और उनको जबरन जनता में रोपने के लिए बाँधा जा रहा है। स्मरणीय है कि गत वर्ष लालकृष्ण अडवाणी ने खेद के साथ साफ साफ कहा था कि जनता भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में नहीं देख रही। इस बीच हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में मोदी के प्रचार में सक्रिय होने के बाद भी भाजपा ने अपने समर्थन और सरकारों को खोया है। उत्तर प्रदेश में तरह तरह की नौटंकियां करने के बाद वे सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत में घटे हैं और उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों को उन्होंने खोया है। ऐसा तब हुआ है जब यूपीए शासन के खिलाफ लगातार लम्बे चौड़े आरोप लगाये जा रहे थे और मँहगाई अपने चरम की ओर बढ रही थी। उल्लेखनीय है कि जहाँ भाजपा की राज्य सरकारें रहीं हैं वहाँ भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में जाँच के बाद उनके पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता पायी गयी है और आम अपराधियों की तरह अदालतों में वे सुनवाइयां टलवाने की कोशिशें करते पाये जाते हैं। ऐसे मामलों में जल्दी फैसला नहीं होने देने के उनके प्रयास उनकी प्रणाली के संकेत देते हैं। लोकायुक्तों की स्थापनाओं को वे टालते हैं [गुजरात] और जहाँ वह स्थापित है वहाँ उन्हें काम नहीं करने देते [मध्य प्रदेश] जहाँ काम करता है वहाँ उससे असहयोग करते हैं [कर्नाटक]।  
       सवाल उठता है कि ऐसे कौन से कारक हैं जो मोदी को प्रधानमंत्री की तरह दिखाने की नौटंकियां करने के लिए नकली लाल किला या नकली संसद भवन तक बनवाने, और 15अगस्त को समानांतर भाषण देने को प्रेरित करते हैं! सच तो यह है कि अन्दर से कमजोरी महसूस करने के बाद ही वे ये काम एक  भ्रम पैदा करने के लिए करते हैं। पार्टी का प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित हो जाने के बाद मोदी कैमरों की सीमा में इस तरह से लोगों के पाँव छू रहे थे गोया प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की जगह प्रधानमंत्री ही बन गये हों।
       मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बदनाम व्यक्तित्वों में से आते हैं। अमेरिका उन्हें वीसा नहीं देना चाहती, ब्रिटेन को उनके प्रति नरम होने की खबरों का खण्डन करना पड़ता है, उनकी पार्टी के गठबन्धन के सदस्य उनके कारण उनका गठबन्धन छोड़ कर चले जाते हैं,[जनतादल-यू, तृणमूल कांग्रेस, लोकजनशक्ति, नैशनल कांफ्रेंस, बीजू जनता दल , नैशनल कांफ्रेंस आदि] जिनमें छोटे दलों से लेकर बड़े दल भी होते हैं। नोबल पुरस्कार से सम्मानित भारत रत्न अर्थशास्त्री उन्हें पसन्द नहीं करते[अमृत्य सेन]। सामाजिक कार्यकर्ताओं पर जब उनके प्रति नरम होने का आरोप लगाया जाता है तो वे सफाई देने में देर नहीं करते [अन्ना हजारे]। गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर को जब उनके समर्थक होने का भ्रम फैलाया जाता है तो वे कानूनी नोटिस देने की बात करते हैं [अमिताभ बच्चन]। वे केवल एक राज्य में लोकप्रिय हैं, पर पूरे देश और दुनिया में अलोकप्रिय हैं, लोग उनसे घृणा करते हैं। बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा जैसी कहावत के अनुरूप उनकी बदनामी को भाजपा भुनाना चाहती है। भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से लालकृष्ण अडवाणी को पिछली बार प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बना कर परखा जा चुका है व अटलबिहारी चुनाव में भाग लेने लायक स्वस्थ नहीं हैं। यही कारण है कि मोदीजी अपनी मुखरता, के कारण नये युवा नेतृत्व की तरह उभरे हैं। 2002 में हुए मुसलमानों के नरसंहार के बाद वे साम्प्रदायिकता से दुष्प्रभावित राज्य के बड़े वर्ग के बीच  दृढ नेतृत्व की तरह प्रचारित किये गये हैं। उनके मंत्रिमण्डल के सबसे वरिष्ठ मंत्री को जेल की यात्रा करनी पड़ी और उसके बाद अदालती आदेश से उसका प्रदेशनिकाला हुआ। उनकी दूसरी महिला मंत्री को आजन्म कैद की सजा हुयी है और उसके साथी को फाँसी की सज़ा सुनायी गयी है। ये सब उस स्थिति में हुआ है जब उक्त लोगों को बचाने में पूरी सरकारी मशीनरी झौंक दी गयी। उनके मंत्रिमण्डल के एक सदस्य की हत्या हुयी और उसके पिता ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने सरे आम हत्या की ज़िम्मेवारी मोदी पर लगायी। झूठे एनकाउंटर के लिए जेल में बन्द डीजीपी ने जब यह काम उनके आदेश पर करने सम्बन्धित पत्र लिख कर उन पर लगे आरोप को पुष्ट कर दिया तब उन्हें और अपने आप को बचाने के लिए भाजपा को उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करना पड़ा क्योंकि अब बचने का कोई दूसरा रास्ता शेष नहीं था।
       स्मरणीय है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी जल्दी से जल्दी बनाने अन्यथा पार्टी के हिट विकट हो जाने का खतरा बताने वाले राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जैटली ने इस बयान के कुछ ही दिन पहले कहा था कि पार्टी में मोदी समेत कम से कम दस लोग सम्भावित प्रत्याशी हैं। जैटली का बयान बंजारा के पत्र खुलासे के समानांतर आया जिससे पता चलता है कि इस पत्र की जानकारी मिलते ही उनके विचार बदल गये थे, और आनन फानन में मोदी के अभिषेक जैसा तुमुल कोलाहल पैदा कर दिया गया। स्मरणीय है कि मोदी की हरियाणा में हुयी रैली के बाद ही एक अखबार [दैनिक भास्कर 16 सितम्बर 2013] में इस आशय का समाचार प्रकाशित हुआ कि बंजारे के पत्र के पीछे भाजपा के ही एक गुजरात से सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री [अर्थात अडवाणी] का हाथ है। यह बंजारा के पत्र के खुलासे को दलीय प्रतिद्वन्दता में बदल कर उसके महत्व को कम करने का षड़यंत्र है।   
       सच तो यह है कि मोदी को यह प्रत्याशी पद देने के पीछे उनके कारनामों से उन्हें सुरक्षा दिलाने से अधिक कुछ भी नहीं है। मोदी के आने पर दुन्दभि बजाने वाले सब किराये के लोग हैं। उनके आने से न कोई दल उनके गठबन्धन से जुड़ रहा है और न ही जनता का कोई वर्ग। उद्योग जगत का एक हिस्सा केवल धन दे सकता है जिसके नियमानुसार उपयोग के लिए निर्वाचन आयोग अपनी पूरी सख्ती से कमर कसे हुए है। मध्यम वर्ग के जिस कुशिक्षित हिस्से के उनके दृढ अनुशासन, आर्थिक ईमानदारी, आंकड़ागत विकास जैसी हवाई बातों से प्रभावित होने का प्रचार किया जा रहा है उसका किंचित असर होने पर भी मोदी के कारण जितना नुकसान होने जा रहा है वह कई गुना अधिक है। अभी भी हमारे यहाँ मतदान को जातियों, सम्प्रदायों, क्षेत्रीयताओं, लुभावने व्यक्तित्वों, पैसों और दबावों आदि से मुक्त नहीं किया जा सका है। इसलिए यह मानना चाहिये कि सारी कवायद मोदी और उनके सहयोगियों को कानूनी कार्यवाही से कुछ समय के लिए बचाने से अधिक कुछ नहीं है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मंगलवार, सितंबर 10, 2013

मुज़फ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगे, कुछ विचारणीय बिन्दु

मुज़फ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगे, कुछ विचारणीय बिन्दु
वीरेन्द्र जैन

          मुज़फ्फरनगर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे नगरों, गाँवों के दंगों के मामले में एक बार फिर से वही भूल की जा रही है जिसमें पूरी स्थिति को तात्कालिक घटना\घटनाओं तक सीमित करके देखा जाता है। एक लड़के द्वारा किसी लड़की को छेड़ने और उसके भाइयों द्वारा सम्बन्धित को दण्डित करने के प्रयास में अति हो जाना असामान्य नहीं है। सामंती प्रभाव वाले क्षेत्रों और ग्रामों कस्बों में गाहे बगाहे ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं। इस घटना के बिगड़ने का प्रमुख कारण साम्प्रदायिकता, जातिवाद, और नारी को सम्पत्ति मानने की अवधारणा में निहित है। अगर साम्प्रदायिकता का जहर समाज में पहले से मौज़ूद नहीं होता तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि छेड़ने वाले लड़के का धर्म इस्लाम था और पीड़ित लड़की की जाति जाट [हिन्दू] थी। साम्प्रदायिकता और जातिवाद की अनुपस्थिति में यह एक कानून व्यवस्था का मामला था जिसे पुलिस के सहारे सुलझाया जाना चाहिए था तथा अब उसके लिए बहुत कठोर कानून अस्तित्व में हैं। किंतु पुलिस और न्याय व्यवस्था का जो हाल है उससे लोगों का उन पर से भरोसा उठता जा रहा है और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस भरोसे के अभाव में लोग ऐसे मामलों में स्वयं फैसला करने में विश्वास करते हैं।
          उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की हालत पहले भी ठीक नहीं थी व ताज़ा इबारत उसी दिन लिख दी गयी थी जब अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण समारोह में लम्पट युवाओं ने उत्पात मचाते हुए शर्मनाक उच्छंखृलता का प्रदर्शन किया था। कितना विडम्बनापूर्ण था कि इस अवसर पर व्यवस्था के रखवाले विवश होकर हाथ बाँधे खड़े रहने को मजबूर दिखे थे। तब इन पंक्तियों के लेखक ने लिखा था कि अगर इस लम्पट उत्साह को कोई राजनीतिक दिशा और कार्यक्रम नहीं दिया गया तो सत्ता के दम्भ में ये अराजक युव जन समाजवादी पार्टी को मिले इस समर्थन को मटियामेट कर देंगे। आज वह सच सामने आ रहा है। अखिलेश सरकार आने के बाद खुद सरकार द्वारा माने गये चौबीस साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं वहीं विपक्ष इनकी संख्या एक सौ चालीस तक बता रही है, पर इन दंगों में सरकारी पार्टी के समर्थकों की दंगा रोकने में कोई भूमिका सामने नहीं आयी। प्रश्न आँकड़ों का न होकर यह है कि व्यक्तियों द्वारा किये गये अपराध कैसे एक समुदाय द्वारा किये गये अपराध में बदल दिये जाते हैं और व्यक्ति के रूप में पीड़ित एक व्यक्ति को पूरे समाज का साथ मिलने की जगह क्यों उसके जाति समुदाय का साथ भर मिलने से वह एक जाति धर्म के खिलाफ दूसरी जाति धर्म का हमला बन कर रह जाता है। इसके साथ ही जुड़ा सबसे प्रमुख सवाल यह है कि क्यों इतने सारे कार्यक्रमों और योजनाओं के बाद भी लोगों का भरोसा पुलिस और न्याय से टूटता जा रहा है और अपनी जाति धर्म के लोगों पर बढता जा रहा है। समाजवादी पार्टी के नाम से उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ नेताओं द्वारा समर्थन पा लेने का मुख्य आधार उनके समाजवादी सिद्धांत नहीं अपितु एक जाति की एकजुटता और एक आशंकित धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा किया गया नकारात्मक मतदान है, अर्थात यादव मुस्लिम गठजोड़। मतदान के समय यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि समाजवादी पार्टी की जीत की स्थिति में मुख्यमंत्री कौन बनेगा और मुलायम सिंह की असमर्थता के बाद वरिष्ठ व जीत दिलाने में महत्वपूर्ण आज़म खान कनिष्ठ अखिलेश की तुलना में बड़े दावेदार थे। भले ही उनका दावा स्वीकार नहीं किया गया था किंतु उन्हें मंत्रिमण्डल में मुख्यमंत्री के बराबर ही या कई मायने में अधिक अधिकार मिले हुए हैं। वे मुस्लिमों के एक क्षत्र नेता बने रहने के लिए समुचित मुस्लिम पक्षधरता का प्रदर्शन भी करते रहते हैं जो परोक्ष में मुस्लिम एकजुटता तक पहुँच कर साम्प्रदायिकता का रूप ले लेती है।
          समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद उनका पहला काम यह होना चाहिए था कि राजनीति में सक्रिय प्रदेश के बड़े युवा वर्ग को साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनजागरण में लगाते किंतु अखिलेश सरकार ने उत्तरप्रदेश में गहरी जड़ें जमाये हुए साम्प्रदायिक संगठनों के लगातार विषवमन के खिलाफ कुछ नहीं किया और अपने युवा समर्थकों को गैर कानूनी तरीके से सरकारी सुविधाएं चरने के लिए छुट्टा छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश में केवल साम्प्रदायिकता ही नहीं अपितु सरकार की जाति के अधिकारियों, पुलिस निरीक्षकों आदि की पदस्थापनाएं पक्षपात पूर्ण ढंग से हुयी हैं और कानून का पालन करने वाले दण्डित किये जा रहे हैं। हर जगह मानव अधिकार व सामाजिक न्याय इनके घर गिरवी है। ऐसे तरीके सरकार में आस्था को कम करते हैं और अपने धर्म व जाति संगठनों में आस्थाएं बढाते हैं जिससे छोटी मोटी घटनाएं भी जाति धर्म गौरव में बदल कर बड़ा रूप ले लेती हैं।
            संविधान में समान नागरिक अधिकारों वाली नारी को समाज में पुरुष वर्ग की सम्पत्ति की तरह अब भी देखा जाता है। जहाँ किसी पुरुष द्वारा दूसरे समाज में शादी कर लेने पर जाति का कोई अपमान नहीं होता वहीं अगर समाज की नारी किसी दूसरे समाज के पुरुष से विवाह कर ले या प्रेम करे तो पूरा समाज अपमानित महसूस करता है। इस आधार पर दर्ज़नों घटनाएं प्रतिमाह सामने आती हैं और उनमें से ही कोई बड़ी साम्प्रदायिक या जातीय दंगे में बदल जाती है। किसी पिछड़ी या सवर्ण जाति की लड़की द्वारा दलित जाति के लड़के से विवाह कर लेने या प्रेम करने पर पूरी जाति के लोग उत्तेजित हो जाते हैं। यह एक पारम्परिक सामाजिक बुराई है किंतु दंगों का तात्कालिक उपचार करने और इन्हें कानून व्यवस्था तक सीमित मानने वाले लोग न केवल इस बुराई के खिलाफ कुछ नहीं कर रहे हैं अपितु अपने वोटों की खातिर जातिवादी घटकों को बढाने में लगे हैं।
          मुज़फ्फरनगर के दंगों में आधा सैकड़ा बहुमूल्य जानों और करोड़ों की सम्पत्ति का ही नुकसान नहीं हुआ है अपितु सामाजिक विश्वास के जो धागे कमजोर हुए हैं उसके नुकसान का कोई अन्दाज़ा ही नहीं लगाया जा सकता। अखिलेश सरकार को तो उसी समय सतर्क हो जाना चाहिए था जब भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमेन बना कर उनके कहने से अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया था। जो लोग समाज को निरंतर पैट्रोल से सींचते रहते हैं उनके लिए इस बात का ज्यादा महत्व नहीं होता कि माचिस की जलती तीली जानबूझ कर या अनजाने में कौन फेंकता है। उन्हें तो आग लगने से मतलब होता है क्योंकि जब दो मजहबों के बीच कटुता बढती है तो राजनीतिक लाभ हमेशा बहुसंख्यक वर्ग ही उठाता है। जरूरत समय रहते पैट्रोल सींचने वाले के हाथ बाँधने की है।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, सितंबर 03, 2013

आशारामदेवों की सरपरस्त पार्टी – भाजपा

आशारामदेवों की सरपरस्त पार्टी – भाजपा

वीरेन्द्र जैन
       जो लोग देश के नागरिकों की आस्थाओं से खिलवाड़ करते हुए अपना धन्धा करते हैं उन्हें भाजपा और संघ परिवार बहुत सुहाता है। वैसे तो धर्म के नाम पर भावनाओं को भुनाने का काम अकाली दल, मुस्लिम लीग र शिव सेना और केरलकांग्रेस आदि भी करती है किंतु गलत कामों की खुली वकालत करने और मुँहजोरी करने में भाजपा समेत पूरे संघ परिवार का कोई सानी नहीं। यही कारण है कि धर्म से जुड़ी पुरानी मान्यताओं को सफल  धन्धे में बदलने वालों के लिए यह पार्टी सबसे अनुकूल पड़ती है।
       गत दिनों जब आशाराम के ही एक अन्धभक्त ने अपनी लड़की के साथ हुए बलात्कार से दुखी होकर आशाराम की रिपोर्ट करने का साहस दिखाया और पूरा देश थू थू करते हुए कार्यवाही की माँग करने लगा तब भाजपा ने अपने दो राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्षों के माध्यम से अपनी पक्षधरता स्पष्ट करते हुए अपने सदस्यों को सन्देश दिया कि उन्हें क्या करना है। उनका सन्देश पाकर ही मध्यप्रदेश शासन के वरिष्ठ केबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जो पहले भी आसाराम के सौदे म.प्र. के मुख्यमंत्री से कराते रहे हैं, ने उनके के पक्ष में आवाज ही नहीं बुलन्द की अपितु एक टीवी चैनल की ग्रुप चर्चा में असंतुलित अशालीन व्यवहार कर अपने पक्ष को चर्चा के केन्द्र में लाने की सफल कोशिश की। उनसे ही संकेत ग्रहण करके छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और गृहमंत्री ननकी राम ने भी जाँच के लिए लम्बित मामले पर भाजपा का इकतरफा फैसला सुनाते हुए आसाराम को निर्दोष बता कर हुए उन्हें षड़यंत्र का शिकार बता दिया। निर्दोष होने का यह प्रमाणपत्र जारी करते समय उन्हें अपने ‘दिव्यज्ञान’ का आधार बताने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुयी क्योंकि इस बयान के माध्यम से तो उन्हें अपने लोगों को सन्देश भर देना था कि उन्हें क्या कार्यवाही करनी है। आसाराम ने भी इन्दौर में भाजपा नेताओं, विधायकों और वकीलों से चर्चा करने के बाद अपने खिलाफ षड़यंत्र में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र की ओर भाजपायी अन्दाज़ में संकेत कर दिया कि वे लोग उनके खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं। ऐसा करके वह गैर कांग्रेसी लोगों से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। स्मरणीय है कि जब विश्व हिन्दू परिषद के दारा सिंह ने कुष्ट रोगियों की सेवा के लिए भारत आये आस्ट्रेलिया के पादरी फादर स्टेंस की उनके दो मासूम बच्चों के साथ आग लगा कर हत्या कर दी थी तब देश के तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण अडवाणी ने तुरंत बयान दिया था कि इस नृशंस हत्याकांड में वीएचपीए का कोई हाथ नहीं है जबकि बाद में इसी आरोपी को सजा हुयी। यह तो संयोग ही था कि सबूत इतने स्पष्ट थे कि जाँच एजेंसियां प्रभावित नहीं हो सकीं। आसाराम की गिरफ्तारी और उससे पहले छुपने की कोशिश के दौरान मीडियाकर्मियों पर जिन लोगों ने हमले किये और उनके कैमरे तोड़ दिये वे ही लोग चुनावों और रैलियों के दौरान भाजपा द्वारा आहूत भीड़ में भी दिखायी देते हैं।
       अगर प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनने की प्रत्याशा में डूबे नरेन्द्र मोदी ने अपने मतभेदों के कारण दूरदर्शिता दिखाते हुए फिलहाल आसाराम से दूरी बनाने के संकेत न दिये होते तो एक निरीह अन्धभक्त परिवार की अवयस्क लड़की के साथ हुये घटनाक्रम को इन मुँह के जबर लोगों द्वारा भीड़ जुटा कर वैसे ही दबा दिया गया होता जैसे कि इनके शासन काल में गुजरात और मध्यप्रदेश आदि भाजपा शासित राज्यों में सैकड़ों मामले जाँच में ही दबा दिये गये हैं या गवाहों को धमका लोक अभियोजकों पर दबाव बना कर निबटा दिये गये हैं। स्मरणीय है कि पिछले दिनों प्रोफेसर सभ्भरवाल की दिन दहाड़े हुयी हत्या में मध्यप्रदेश के बाहर मामला ले जाने पर भी गवाहों के बदलने और अभियोजन के नरम हो जाने के कारण आरोपी छूट गये थे और अपने फैसले की इस मजबूरी की चर्चा न्यायधीश ने स्वयं की थी। उल्लेखनीय यह भी है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं जेल अस्पताल में इन आरोपियों से मिलने गये थे और इनके छूट जाने पर आरोपियों का शानदार स्वागत जलूस निकाला गया था जिसमें मध्य प्रदेश शासन के एक मंत्री खुशी से नाचते हुए चल रहे थे। इन्हीं मंत्री ने बयान भी दिया था कि आज में जितना खुश हूं उतनी खुशी मुझे मंत्री बनते समय भी नहीं हुयी थी। उल्लेखनीय यह है कि बाद में इन्हीं आरोपियों में से एक की ग्वालियर में अस्वाभाविक मृत्यु हुयी थी जिसे आत्महत्या बताया गया था। उसके परिवार के लोगों ने आत्महत्या की कहानी से असहमति जताते हुए जाँच की मांग की थी, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ।        
       भले ही कूटनीतिक रूप से भाजपा के एक गुट ने अपने मुँह को बन्द कर विश्व हिन्दू परिषद को आगे कर दिया है किंतु जब शरद यादव जैसे उनके पुराने सहयोगी संसद में आरोपी आशाराम को भूमाफिया बतलाते हुए तुरंत कानूनी कार्यवाही की मांग कर रहे थे तब भाजपा के लोग चुप लगा कर बैठे थे। एक ज्वलंत मुद्दे पर देश के सबसे बड़े और मुखर दल की चुप्पी का भी साफ संकेत होता है। स्मरणीय है कि गत 16 दिसम्बर को दिल्ली में हुए बर्बर गैंग रेप के खिलाफ जब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था तब भाजपा की नेता सुषमा स्वराज बड़े जोर शोर से अपराधी को फाँसी देने की माँग कर रही थीं। बाबा रामदेव द्वारा भाजपा को पिछले दिनों नौ लाख रुपये का चन्दा देने का मामला सामने आया था और इसमें कोई सन्देह नहीं कि आसाराम भी भाजपा को अपने प्रवचन के धन्धे से अर्जित राशि, और ज़मीनों के कारोबार से बड़ा सहयोग करते होंगे, तभी तो भाजपा कार्यालय में इतनी नगदी जोड़ कर रखी जाती है कि डेढ करोढ रुपये चोरी हो जाने पर भी भाजपा रिपोर्ट लिखाने तक की जरूरत नहीं समझती।
       रामदेव के गुरु के गायब हो जाने की जाँच सीबीआई कर रही है और रामदेव ने जिन गुरु से ज्ञान प्राप्त कर आयुर्वेद दवाओं व योग प्रशिक्षण का इतना बड़ा व्यापार शुरू किया है कि कुछ ही वर्षों में ग्यारह सौ करोड़ से अधिक की दौलत अर्जित कर ली, उन्होंने अपने गुरु के गायब हो जाने पर कभी चिंता व्यक्त नहीं की अपितु एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ कर जाँच और जाँच की मांग से दूरी बना कर रखी। हर संवेदनशील घटना को राजनीतिक मुद्दा बना लेने की कोशिश करने वाली भाजपा रामदेव के गुरु के सन्देहास्पद परिस्तिथियों में गायब हो जाने पर कभी मुखर नहीं हुयी। जब रामदेव का संस्थान कर वंचन की जाँच में आया तो भाजपा ने उसे रामदेव के खिलाफ षड़यंत्र बताने की कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि कभी अलग पार्टी बना कर चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाले रामदेव अब केन्द्र में भाजपा की सरकार बनवाने और नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए तन मन धन से लगे हैं।
       भाजपा के कारण आज धर्म राजनीति और व्यापार का एक गिरोह बन गया है जो परस्पर एक दूसरे के सहयोगी बन कर काम कर रहे हैं। आसाराम के खुलासों के बाद इस गठजोड़ के नक्शे खुल कर सामने आ गये हैं जिनसे अन्दर अन्दर आर्थिक और सामाजिक अपराधों को इस गठजोड़ द्वारा दिये जा रहे संरक्षण का पता भी चलता है। लोकतंत्र के हित में ऐसे गठजोड़ों का टूटना समाज के हित में होगा इसलिए धार्मिक संस्थानों में अधिक पारदर्शिता और उनके कार्यों के प्रभाव के मूल्यांकन की जरूरत है।     
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629


शनिवार, अगस्त 24, 2013

शर्म इनको मगर नहीं आती

शर्म इनको मगर नहीं आती
वीरेन्द्र जैन

       कहा जाता है कि हमारे देश में अधिकांश आत्महत्याएं सामाजिक सम्मान के घटने या घटने के भय से की जाती हैं। यह सामाजिक सम्मान हमारी मूलभूत आवश्यकताओं के समानांतर अनिवार्यता की सूची में आता है। जो लोग अपने स्वार्थों के समक्ष सामाजिक सम्मान का ध्यान नहीं रखते उन्हें बेशर्म कहा जाता है। एक कहावत में ऐसे लोगों की निन्दा यह कह कर की गयी है- सौ सौ जूते खांय तमाशा घुस के देखेंगे।
       भारतीय जनता पार्टी भले ही लोगों को उकसाने के लिए बार बार राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक स्वाभिमान आदि की बातें करती रहती हो किंतु अपने स्वार्थों के लिए बंगारुओं, येदुरप्पाओं की यह पार्टी अपने स्वाभिमान और लोक लाज की जरा भी परवाह नहीं करती। बंगारू को नरेन्द्र मोदी हैदराबाद की आमसभा में मंच पर सादर स्थान देते हैं और येदुरप्पा को पार्टी में वापिस लाने के लिए उनके निहोरे किये जा रहे हैं। भाजपा में प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में उछाले जा रहे नरेन्द्र मोदी को अमेरिका ने वीजा देने से इंकार करके उनके बारे में अपना मूल्यांकन बता दिया था पर इसके बाद भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान उनको वीजा दिये जाने के लिए प्रयास किया था जिसे स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने यह अपेक्षा उन कारणों को दूर किये बिना और उन गलतियों के प्रति प्रायश्चित किये बिना ही की थी जिनके कारण उन्हें वीजा से वंचित किया गया था। पिछले दिनों ब्रिटिश उच्चायुक्त और मोदी की भेंट हुयी थी जिसे भाजपा की ओर से इस तरह प्रचारित किया गया था जैसे सारे पश्चिमी देशों ने उन्हें अच्छे चरित्र का प्रमाण पत्र दे दिया हो। अब ऐसे प्रचार से उपज रही गलतफहमियों को दूर करने के लिए उच्चायुक्त जेम्स बेवेन ने जमिया मिलिया विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया है कि नरेन्द्र मोदी से बातचीत का  मतलब उनका समर्थन करना नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें भी मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंताएं हैं। गुजरात दंगों में हमारे भी तीन नागरिक मारे गये थे और हम भी उनके लिए मुकदमा एवं न्याय चाहते हैं। उन्होंने साफ किया कि ब्रिटिश सरकार की ओर से नरेन्द्र मोदी को ब्रिटेन आने का न्योता नहीं दिया गया है।
       अमिताभ बच्चन गुजरात पर्यटन के ब्रांड एम्बेसडर बनाये गये हैं और वे अपनी लोकप्रियता के सहारे गुजरात के पर्यटन स्थलों और सांस्कृतिक मेलों के लिए पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अनुबन्धित हैं। पिछले दिनों यू ट्यूब पर जारी किये गये एक फर्जी वीडियो पर अपनी गहरी नाराजी प्रकट की और इसे अपलोड करने वाले के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही की चेतावनी दी है। वे इस वीडियो के माध्यम से नरेन्द्र मोदी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन करते हुए दिखते हैं। 70 वर्षीय इस वयोवृद्ध कलाकार ने 2007 में ‘लीड इंडिया’ नामक एक अभियान के लिए अपनी आवाज दी थी जिसका बड़ी चालाकी से स्तेमाल करते हुए मोदी का समर्थन करने वाला वीडियो बना लिया है। इस वरिष्ठ कलाकार ने अपने ब्लाग के अलावा ट्विटर पर भी इस फर्जीवाड़े की सूचना दी है। सवाल उठता है कि गुजरात में ब्रान्ड एम्बेसडर की जिम्मेवारियां स्वीकार करने के बाद भी इस बुजुर्ग को मोदी के प्रचार से जुड़ना अपमानजनक क्यों लगता है?  
       गुलशन नन्दा की तरह अपने अंग्रेजी उपन्यासों के लिए लोकप्रिय युवा लेखक चेतन भगत को कुछ व्यावसायिक अखबार स्तम्भकार के रूप में छापते हैं जिनमें वे लगातार मोदी के पक्ष में युवाओं के बीच प्रचार सा करते रहे थे पर गत दिनों उन्होंने भी मोदी की अपने विरोधियों के खिलाफ लगातार आक्रमकता को एक नकारात्मक गुण के रूप में पहचानते हुए सवाल उठाया है कि वे अपने सकारात्मक पक्ष को सामने लेकर क्यों नहीं आते!  क्या उन्हें भी अपना सकारात्मक पक्ष नकली, अधूरा, या ऐसा लगता है जिसमें उनका कोई योगदान नहीं है।
       स्मरणीय है कि कई वर्ष पहले देश के बुजुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने अनुपम खेर को संघ का पक्षधर कह दिया था तो इस बेहतरीन कलाकार को इतना बुरा लगा था कि उन्होंने इस वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज़ कर दिया था। देश के सर्वाधिक सम्मानीय बुद्धिजीवियों को संघ से जुड़ा होना बताया जाना एक गाली की तरह लगता है पर इसके नेताओं को यह विचार करने की जरूरत महसूस नहीं होती कि स्वय़ं को एक सांस्कृतिक संगठन बताने वाले इस संगठन से देश के सांस्कृतिक कर्मी क्यों दूर रहते हैं। जिन फिल्मी कलाकारों को राज्यसभा आदि में भेजने का लालच देकर ये जोड़ भी लेते हैं उनमें से ज्यादातर इनकी चुनावी सभाओं तक में जाने का मेहनताना वसूलते हैं, या धर्मेन्द्र की तरह अफसोस करते हुए कहते हैं कि इस संगठन ने मुझे बहुत इमोशनली ब्लेकमेल किया।
        औद्योगिक विकास के नाम पर नवधनाड्य वर्ग के नवशिक्षित आधुनिक युवाओं को आकर्षित करने के लिए वे जो प्रयास कर रहे हैं उसको चौरासी कोस की परिक्रमा के बहाने दंगों की भूमिका तैयार करना पसन्द नहीं आ सकता। निकट भविष्य में दोनों में से कोई एक रास्ता पकड़ना होगा जिनमें से कोई अकेला रास्ता मंजिल तक नहीं जाता।
............और दो नावों पर पैर रखने वालों का परिणाम तो सबको पता ही है।       
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अगस्त 20, 2013

नये कम्पनी कानून के प्रावधान और सामाजिक ज़िम्मेवारियां

नये कम्पनी कानून के प्रावधान और सामाजिक ज़िम्मेवारियां

वीरेन्द्र जैन
      कंपनी अधिनियम 1956 को बदलकर एक नया कंपनी कानून बनाने की कवायद पिछले लगभग दो दशकों से चल रही थी। पिछले 8 अगस्त को राज्य सभा द्वारा कंपनी विधेयक को पारित करने के बाद कंपनी अधिनियम 2013 का रास्ता साफ हो गया है। अन्य महत्वपूर्ण बातों के अलावा इसमें कुल लाभ का दो प्रतिशत सामाजिक दायित्वों के लिए व्यय करने की अनिवार्यता का प्रावधान भी है।
      अभी तक सामाजिक दायित्व दूसरों पर डालने को कानून के दायरे में नहीं रखा गया था क्योंकि इसे सरकार का काम माना जाता था जो जनता से वसूले गये कर से उसका निर्वहन करती थी। सामाजिक संगठन अपनी मर्जी से कुछ समाज हितैषी काम करते थे उसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। आयकर की धारा 80 जी के अंतर्गत कुछ चयनित सामाजिक संगठनों को दिये गये दान में कुछ छूट देती थी पर उनके द्वारा किये बताये गये कार्यों का कोई निरीक्षण नहीं करवाती थी जिसके परिणाम स्वरूप कुछ धार्मिक संगठन काले धन को सफेद बनाने के लिए इस सुविधा का लाभ लेते रहे हैं। एक टीवी चैनल द्वारा इस मनी लांड्रिंग को उजागर करने के लिए स्टिंग आपरेशन किया गया था पर बाबाओं, साधुओं के भेष में रहने वाले इन आर्थिक अपराधियों पर किसी कार्यवाही की खबर नहीं है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि सामाजिक दायित्वों के लिए किये गये इस प्रावधान के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश ही नहीं हों अपितु उनका सही अनुपालन सुनिश्चित किये जाने के लिए उन पर नियंत्रण की व्यवस्था भी हो।
      हमारा समाज अर्धसामंतवादी अर्धपूंजीवादी समाज है। इसका परिणाम यह है कि पूंजीवाद में जो प्रगतिशीलता होती है उसे सामन्ती सोच निष्क्रिय कर देती है। आज़ादी के बाद देश के पहले दस पूंजीपतियों ने चेरिटी [परोपकार] के नाम पर अनाप शनाप धर्मस्थलों का निर्माण करवाया। आज देश भर के राज्यों की राजधानियों और महानगरों में बिड़ला मन्दिर विधानसभाओं के समानांतर मिल जायेंगे। पिछले दिनों दिवंगत बाबा जयगुरुदेव से लेकर सत्य सांई बाबा तक की अटूट सम्पत्ति सामने आयी है जिसकी विरासत पर उठे मतभेद भी बताते हैं कि उसके संग्रह के पीछे कोई साफ सुथरा स्पष्ट लक्ष्य नहीं था। अगर उसमें से कहीं स्कूल अस्पताल आदि का दिखावा भी किया गया था तो वह भी कुल आय के एक प्रतिशत के बराबर भी नहीं था। समाज में उच्च और मध्यम वर्ग के पास जो सरप्लस [अतिरेक] पैदा होता है उसका बड़ा हिस्सा सामंतवादी मूल्यों से प्रभावित समाज में धार्मिक चेरिटी की ओर चला जाता है। इसका दोहन करने के लिए न केवल परम्परागत विश्वासों को नया रंग रोगन दिया जा रहा है अपितु नयी नयी तकनीक का सहारा लेकर नये नये असंख्य धार्मिक नेता पैदा हो रहे हैं। विडम्बना यह है कि परम्परागत विश्वासों के सहारे धन निकालने वाले ये लोग खुद पूंजीवादी मूल्यों में भरोसा करते हैं और उसी के हथकण्डे अपनाते हुए धन संग्रह करते हैं और उसका निवेश करते हैं। उपरोक्त धर्म गुरुओं के निधन के बाद जो विवाद पैदा हुए उससे इस सत्य का पता चला कि इस संग्रीहत धन को व्यय करने की ना तो कोई घोषित योजना उनके पास होती है और न ही उनके इस संग्रह की कोई पारदर्शिता होती है। धार्मिक स्थलों तक में जब बड़े बड़े हादसे हो जाते हैं तब भी इस संस्थानों से एक पैसे की भी सहायता पीड़ितों को नहीं मिलती और ना ही तीर्थों के पुनुरोद्धार और धार्मिक उत्सवों के लिए कोई धन दिया जाता है। धार्मिक आश्रमों में ऐसे जमा धन के कारण आये दिन चोरियां, गबन से लेकर हत्याएं तक हो रही हैं। पिछले दिनों से दक्षिण के एक शंकराचार्य पर ऐसा ही हत्या का मुकदमा दर्ज़ है जिस पर फैसले को निरंतर विलम्बित कराने की कोशिश चल रही है।
      कार्पोरेट कम्पनियों और स्वैच्छिक संगठनों के बीच पुल का काम करने वाला एक संगठन है जिसका नाम ‘दसरा’ है। गत दिनों गत दिनों मुम्बई के ताज होटल में एक तीन दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न हुयी थी। ‘दसरा’ के निर्देशक मानस राठा के अनुसार देश में वैसे तो तीन लाख तीस हजार पंजीकृत स्वयंसेवी संगठन हैं जिसमें से लगभग दो हजार पेशेवर ढंग से सार्थक काम कर रहे हैं। इनमें से 40 संगठनों को पिछले चार साल में कार्पोरेट घरानों ने कुल एकसौ दस करोड़ रुपयों की मदद की है। इसके समानांतर 2013 में धार्मिक संस्थानों को दिये गये कुछ ऐसे दानों को देखें जो किसी तरह समाचारों में आ गये तो अंतर पता चलता है।
7/1/13-- शिर्डी साईं बाबा संस्थान के उपकार्यकारी अधिकारी यशवंत माने ने बताया कि संस्थान को दस दिन में 13 करोड़ का दान चढावे में मिला है।
11/2/13 – नागपट्टनम। भगवान अमिर्थकडेवर के मन्दिर में देवी अबिरामी को पाँच करोड़ रुपये कीमत की नवरत्न अंगिया पहनायी गयी है।
22/6/13—दिल्ली के एक अनाम पेशेवर ने मुगलकालीन सोने के सिक्कों की माला चढाई जिसकी कीमत सोलह लाख रुपये है।
11/7/13—कोलकाता- चैतन्य महाप्रभु की जन्मस्थली मायापुर में विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर तैयार हो रहा है जो पाँच लाख वर्गफीट में फैला होगा। इस्कान के इस मन्दिर की लागत लगभग पाँच सौ करोड़ आयेगी। इसके लिए आटोमोबाइल कम्पनी फोर्ड के संस्थापक के प्रपौत्र एलफर्ड फोर्ड डोन ने सौ करोड़ रुपये दान दिये हैं।
28/7/13—अम्बाजी। गुजरात के इस प्रसिद्ध तीर्थ में अहमदाबाद के एक श्रद्धालु ने पाँच किलो सोना दान दिया। अभी तक इस मन्दिर को अड़तीस किलो सोना दान में मिल चुका है।
      इसके विपरीत मध्यप्रदेश की सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत 2007 में ‘फंड ए स्कूल’ योजना शुरू की थी जिसके अनुसार पूंजीपति सरकारी स्कूलों के विकास के लिए दान कर सकते थे लेकिन योजना शुरू होने के बाद से अब तक प्रदेश के किसी पूंजीपति ने इसमें रुचि नहीं ली जबकि इसमें आयकर की धारा 80 बी के अंतर्गत आयकर में पाँच प्रतिशत छूट का प्रावधान भी है। योजना में आयकर लाभ लेते हुए न्यूनतम पचास हजार से लेकर दसलाख तक का दान दिया जा सकता था। इसलिए अगर सरकार अपनी ज़िम्मेवारियों से बच कर कम्पनी कानून के द्वारा लाभ का दो प्रतिशत सामाजिक दायित्वों के लिए उद्योगपतियों को सौंप रही है तो उसे उसका क्षेत्र भी निर्धारित करना चाहिए ताकि उसका सही स्तेमाल हो और जिसका लाभ समाज के सभी वर्गों को किसी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के भेदभाव के बिना मिल सके। 
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, अगस्त 18, 2013

चुनावों में जाति के नाम पर भटकाव कब तक ?

चुनावों में जाति के नाम पर भटकाव कब तक ?
वीरेन्द्र जैन
       हमारे स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था- तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा। यह कर्म और प्रतिफल का सिद्धांत दर्शाता है।
       किसी भी त्याग की अपेक्षा के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं। लोग धर्मिक सलाहों पर दान देते समय भी कल्पित सुखदायी स्वर्ग में अपना स्थान सुरक्षित होने की संभावनाओं से प्रभावित रहते हैं। किंतु चुनावों में जातिवाद पर अधारित समर्थन एक निरर्थक भटकाव के अलावा कुछ भी नहीं है।
       बहुलताओं से भरे हमारे देश के लोकतंत्रातिक विकास में जो प्रमुख बाधाएं सामने आ रही हैं उनमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रीयता, भाषावाद, आदि प्रमुख हैं, जिनके सहारे चन्द नेता एक पहचान देने के भ्रम में जनता से अन्ध समर्थन हथिया लेते हैं और अवसर पाकर उस समर्थन से प्राप्त ताकत का सौदा जनविरोधी शक्तियों के साथ कर लेते हैं। देश के कुछ प्रमुख राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, आदि चुनावों में जातिवाद की बीमारी से इस तरह ग्रसित हैं कि कई राज्यों में देश के प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल, हाशिये पर आ गये हैं। उल्लेखनीय है कि अपनी जाति के व्यक्ति को सरकार के प्रमुख पद पर देखने के झूठे आत्म गौरव के अलावा जातिवाद से प्रभावित इन मतदाताओं को कोई हित नहीं हुआ है। सच तो यह है कि सभी नागरिकों को एक समान मानने वाले संविधान के अनुसार उन्हें अपनी जाति के नेता के पदासीन होने पर विशिष्ट लाभ मिल भी नहीं सकता है। पर विडम्बना है कि जातिवाद से भ्रमित मतदाताओं के बड़े वर्ग को अब तक यह सच्चाई समझ में नहीं आ रही है, और स्वार्थी राजनेता उन्हें समझने भी नहीं देना चाहते। रोटी, रोजगार, मकान, स्वास्थ, शिक्षा, सद्भाव, , सड़क, सफाई, बिजली, पानी, व निर्धनता उन्मूलन आदि जीवन से जुड़ी समस्याओं और उसके स्तर को सुधारने हेतु सच्चा संघर्ष करने वालों की तुलना में अपनी जाति का उम्मीदवार प्राथमिकता पा जाता है।
              उल्लेखनीय है कि बहुजन समाज पार्टी ने दलितों के एक खास वर्ग को जाति के आधार पर प्रभावित किया हुआ है और उस जाति का अन्धसमर्थन ही उनका मूल आधार है, किंतु राज्यसभा में चुन कर भेजने के मामले में उन्होंने आम तौर पर अपनी समर्थक जाति को आधार नहीं बनाया और सम्पन्न तथा सवर्णों को अपने वोट देकर भरपूर सौदा किया। जब जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, उस काल में दलितों की दशा में ना तो आर्थिक और ना ही सामाजिक दशा में कोई अंतर आया। दलित जातियों को आरक्षण से मिलने वाले लाभ भी वैसे ही मिले जैसे कि किसी भी अन्य सरकार में मिलते रहे हैं। मुलायम सिंह ने अपने कार्यकाल में अपनी जाति से मिले चुनावी समर्थन का लाभ ठाकुर अमर सिंह और उनके माध्यम से देश के चुनिन्दा उद्योगपतियों को ही पहुँचाया। यादव जाति के अन्ध समर्थन से चुनाव जीते मुलायम सिंह ने ही, श्रीमती जया बच्चन और अनिल अम्बानी जैसे लोगों को राज्यसभा में भेजा, व अमिताभ बच्चन को उत्तर प्रदेश का ब्रान्ड एम्बेसडर बनाया जो अब नरेन्द्र मोदी के गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर बने हुए हैं व अब उनके समर्थक बनते जा रहे हैं । कर्नाटक में जातिगत वोटों के आधार पर चुने हुए विधायकों ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को दरकिनार करते हुए विजय माल्या जैसे उद्योगपतियों को राज्यसभा में पहुँचाया है। गत दिनों हरियाना के एक नेता ने राज्यसभा में पहुँचने की कीमतों का खुलासा करते हुए उन अफवाहों की लगभग पुष्टि ही कर दी है जो हर बार हवाओं में तैरती रहती थीं। गत दिनों झारखण्ड में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रिय राज्य सभा उम्मीदवार के चुनाव में लगने वाला धन चुनाव पूर्व ही पकड़ा जा चुका है, और उस कारण चुनाव को स्थगित करना पड़ा था। यह बहुत स्पष्ट है कि राज्यसभा या किसी दूसरे अपरोक्ष चुनाव में चुने जाने वाले सम्पत्तिशाली उद्योगपतियों, व्यापारियों, की भरमार क्यों और कैसे होती जा रही है। इसके साथ यह भी तय है कि इन सौदों में बिकने वाले लोगों में वे ही लोग अधिक होते हैं जो बिना किसी राजनीतिक आधार के जातिवाद जैसे हथकण्डों के सहारे चुने गये होते हैं।
       बहुजनसमाज पार्टी के तरीके से प्रभावित होकर उसी पार्टी में से अनेक उप दल पैदा हो गये हैं, इसमें से निकले नेताओं ने बंसोड़ों, कुशवाहाओं, कुर्मियों, पासवानों, आदिवासियों आदि के वैसे ही जातिवादी दल बना लिये हैं और  जातिवाद उभार कर उससे मिले समर्थन के चुनाव पूर्व सौदे भी करने लगे हैं। ये दल वोट काटने का काम करते हैं। चुनावों से पूर्व ये जगह जगह जातिवादी रैलियां करके अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सौदों का आधार तैयार करते हैं। जहाँ दो प्रमुख दलों के बीच सीधा चुनाव होता है वहाँ वे दल अपने सुरक्षित वोटों से इतर वोटों को अपने विरोधी के पक्ष में जाने से बचाने के लिए ऐसे जातिवादी दलों को चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक मदद करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर जातियों के इन नेताओं के पास उपलब्ध संसाधन चमत्कृत करते हैं, पर जातिवाद के नाम पर बहका हुआ मतदाता इस पर विचार ही नहीं करता। 
       जातियों व क्षेत्रीयता के इस अन्धत्व में राजनीतिक विचार गुम हो जाते हैं जो कुछ राजनीतिक दलों के विचार के प्रति प्रतिबद्धता की कलई खोलते हैं। स्मरणीय है कि जब कांग्रेस ने ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया था तब उनका समर्थन करने के लिए कांग्रेस का घोर विरोधी अकाली दल साथ आ गया था व श्रीमती प्रतिभा पाटिल के समर्थन में एनडीए का सबसे महत्वपूर्ण घटक शिवसेना अपने गठबन्धन को तोड़कर आगे आ गया था। ऐसा क्षेत्रीयतावाद भी जातिवाद का दूसरा रूप है।   
       दलितों और पिछड़ों के साथ होते रहे सामाजिक भेदभाव के कारण उन्हें प्रतिशोध में शासक वर्ग में शामिल होना एक क्षणिक मानसिक संतोष दे सकता है किंतु पिछले दिनों, ब्राम्हणों, वैश्यों और ठाकुरों के भी जातिवादी सम्मेलन होने लगे हैं जिनमें राजनीतिक विचारों से परे अपनी जाति के व्यक्ति को टिकिट देने का दबाव सभी राजनीतिक दलों पर डाला जाने लगा है। इन सम्मेलनों में यह घोषणा की जाती है कि उनकी जाति का समर्थन उसी दल को मिलेगा जो उनकी जाति के लोगों को संबसे ज्यादा टिकिट देगा। रोचक यह है कि कोई इस बात की चर्चा नहीं करता कि जब जब जिस जाति का व्यक्ति पद पर रहा है तो उस जाति के लोगों का क्या भला हुआ? किसी भी जातिवादी नेता के पास जातिविशेष के विशिष्ट उत्थान की कोई योजना नहीं होती।
       खेद है कि आज़ादी के 66 साल बाद भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल इस बीमारी को रोकने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं अपितु उसी के बीच से अपने लिए रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।                  
वीरेन्द्र जैन
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