शुक्रवार, जून 22, 2012

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व और उसके विरोधाभास


भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व और उसके विरोधाभास  
वीरेन्द्र जैन
      देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है और यही कारण है कि जब भी कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा होता हुआ दिखता है तो उसके पीछे बहुत सारे लोग यह सोचे बिना ही आ जाते हैं कि जब तक यह समर्थन किसी सार्थक परिवर्तनकारी राजनीति और राष्ट्रव्यापी संगठन के साथ नहीं जुड़ता तब तक किसी परिणिति तक नहीं पहुँच पाता। जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन हो या वीपी सिंह का अभियान हो वे व्यापक राजनीतिक दृष्टि और संगठन के बिना चलाये गये थे इसलिए बिना कोई परिवर्तन किये बड़ी घटनाएं बन कर रह गये। आज अन्ना का आन्दोलन हो या रामदेव का वे भी इसी दोष के शिकार हैं इसलिए उनकी परिणिति भी तय है। स्मरणीय है कि विदेशों में जमा धन को वापिस लाने को भाजपा ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया था किंतु उसे आन्दोलन का रूप देने की कोई कोशिश नहीं की। जब रामदेव और अन्ना हजारे ने इस समस्या पर आन्दोलन प्रारम्भ किये तो कई राजनीतिक दल तो इनके पीछे इसलिए आ गये ताकि इनके अभियान से उठी लहर में वे अपनी नैय्या पार लगा सकें।
       भाजपा से जुड़े संगठनों ने तो साफ साफ कहा कि अन्ना के अनशन के दौरान उन्होंने न केवल संसाधनों में मदद की थी अपितु भीड़ एकत्रित करने में योगदान भी किया था। उनका यह बयान अन्ना टीम के लिए नुकसान दायक साबित हुआ था। अपनी सोच और अतीत में किये गये कारनामों के कारण भाजपा और उससे जुड़े जनसंगठन इस तरह से बदनाम हैं कि उनके सहयोग की भनक भर आन्दोलन को कमजोर करने के लिए काफी होती है इसलिए वे विपक्ष में रहते हुए भी इस विषय पर आन्दोलन नहीं छेड़ते पर उसका सम्भावित लाभ लेने के लिए परदे के पीछे से प्रयास करते हैं। स्मरणीय है कि जब अन्ना हजारे के आन्दोलन के प्रति लोगों में तीव्र आकर्षण पैदा हुआ था तब संघ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ पहले आन्दोलन न छेड़ने के लिए भाजपा नेताओं को फटकार लगायी थी। रामदेव तो परोक्ष रूप से भाजपा से जुड़े ही रहे हैं और उनके ट्रष्ट भाजपा को विधिवत चन्दा देते आये हैं। यह अलग बात है कि उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में तब तक कतराते रहे जब तक मीडिया में प्रमाण सहित सच सामने नहीं आ गया।
      एक बार असफल हो जाने के बाद अन्ना हजारे और रामदेव ने सन्युक्त होकर पुनः आन्दोलन छेड़ने की योजनाएं तैयार की हैं और भाजपा जैसे दल उसके समर्थन को लपक लेने की तैयारी करने लगे हैं। असल में यह भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोशित जनता के साथ एक और धोखा है कि उसकी भावनाओं को उस दल को बेच दिया जाये जिसे जनता पसन्द नहीं करती। इस आन्दोलन में कहीं भी चुनाव प्रणाली, कार्यपालिका व न्यायपालिका में वांछित परिवर्तन का नक्शा नहीं है जिनके चलते वर्तमान में जो भी कानून हैं वे निष्प्रभावी हैं, और उनके होते हुए भी भ्रष्टाचार ने इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लिया है।
      अभी हाल ही में घटित घटनाओं पर इन संगठनों ने जो टिप्पणियां की हैं उनसे इनकी कूटनीति का पता चलता है। अल्पसंख्यकों के मन में भाजपा के प्रति जो सन्देह हैं वही सन्देह भाजपा के जनसंगठनों से सहायता लेने वाले इन आन्दोलनकारियों के प्रति न रहें इसलिए इन्होंने कुछ वैसे ही टोटके किये हैं जैसे कि राजनीतिक दल करते रहते हैं। पिछले वर्ष अन्ना हजारे ने जब अनशन तोड़ा था तो एक मुस्लिम और एक दलित कन्या के हाथों से जल ग्रहण करने का ड्रामा किया था। विदेशों में जमा पैसा वापिस लाने का आन्दोलन चलाने वाले आयुर्वेद दवाओं के उद्योगपति रामदेव ने अपनी आन्ध्रा यात्रा के दौरान पृथक तेलंगाना राज्य की माँग का समर्थन किया था जिसे भाजपा अपना समर्थन दे रही है। पिछले महीने रामदेव ने आल इंडिया यूनाइटिड मुस्लिम मोर्चे के बैनर तले नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित सम्मेलन में कहा कि अगर हिन्दू दलितों को आरक्षण मिलता है तो मुस्लिम दलितों को क्यों नहीं मिलना चाहिए? संविधान के अनुच्छेद 341 के अंतर्गत धार्मिक आधार पर पाबन्दी पूरी तरह गलत है, इस अनुच्छेद में बदलाव आना चाहिए। मैं इसके खिलाफ लड़ाई का ऐलान करता हूं। इस अवसर पर उन्होंने ‘बिसिमिल्लाह’ से शुरुआत करते हुए कुरान की आयत भी पढी। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान देशभक्त हैं और देश पर जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं। स्मरणीय है कि मुस्लिम विरोधी भाजपा मुसलमानों और ईसाइयों को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं है पर उसने रामदेव के इस कूटनीतिक बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की, जबकि कांग्रेस द्वारा यही बयान देने पर आसमान सिर पर उठा लेती। स्मरणीय है पिछले वर्ष रामदेव अपना राष्ट्रीय स्वाभिमान दल बनाकर उस बैनर से पूरे देश में चुनाव लड़ने की समय पूर्व घोषणा कर चुके थे, तथा भाजपा से झिड़की खाने के बाद उसे वापिस ले लिया था।
      गत दिनों यूपीए द्वारा प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने के बाद टीम अन्ना ने उन पर लगाये गये पुराने आरोपों को उसी तरह से उकेरा जैसे कि श्रीमती प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को उम्मीदवार बनाये जाने पर भाजपा ने उनके परिवार वालों के खिलाफ लगाये थे। जो अपने आन्दोलन को गैर राजनीतिक प्रचारित करते हैं उनके द्वारा ऐसे समय कथित आरोप लगाये जाने से उनके राजनीतिक लक्ष्यों की झलक मिलती है। उल्लेखनीय है कि हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप में जिन जगन मोहन रेड्डी को सीबीआई कैद में रख कर पूछ्ताछ कर रही है, उनकी जेबी पार्टी द्वारा उपचुनावों में सारी सीटें जीत लिए जाने के बाद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलनरत टीम अन्ना ने न तो उन पर टिप्पणी करने की जरूरत समझी और न ही चुनाव प्रणाली के दोषों पर ही कोई टिप्पणी की। जब तक जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस से अलग नहीं हुए थे तब तक भाजपा की ओर से उन पर और उनके पिता वाय एस रेड्डी पर अनगिनित आरोप ही नहीं लगाये जाते थे अपितु वे उनके ईसाई होने के कारण सोनिया गान्धी के संरक्षण मिले होने का आरोप भी लगाते थे। पर अब भाजपा नेता मनेका गान्धी जगन मोहन की माँ से सहानिभूति व्यक्त करती हैं और भाजपा उनके साथ गठबन्धन के प्रति वैसे ही लालायित है, जैसा कभी सुखराम और जयललिता के साथ कर चुकी है।  
      अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों को ही राजनीतिक दल बनाने, या गठबन्धन करने का पूरा अधिकार है पर वे जिस नैतिकता की दुहाई देते हुए अपना आन्दोलन चला रहे हैं उसके  आधार पर जनता को मूर्ख बनाने का अधिकार नहीं है। रामदेव कई लाख करोड़ डालरों के स्विस बैंकों में जमा होने की बात कहते रहे हैं किंतु स्विट्जरलेंड के केन्द्रीय बैंक स्विस नैशनल बैंक ने अपने सालाना विवरण में जानकारी दी है कि सन 2011 के अंत तक भारतीयों के 218 करोड़ स्विस फ्रैंक अर्थात कुल 12740 करोड़ रुपये जमा थे। पर राजनीतिक दलों की तरह आन्दोलन चलाने वाली यह जोड़ी बिना किसी जिम्मेवारी के मनमाने  आरोप लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने आँकड़ों को कहीं सिद्ध नहीं करना है अपितु सत्तारूढ दल के खिलाफ माहौल बनाना है। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया में वे आपस में भी एक दूसरे को ठगने लगते हैं। रामदेव टीम अन्ना के नाभिक अरविन्द केजरीवाल को मंच पर ही डाँट देते है और उनकी अभिव्यक्ति को रोक देते हैं तो खुद जाकर शरद पवार समेत सभी नेताओं से मिलते हैं। टीम अन्ना के प्रमुख लोग खुद भी अन्ना के अनशन इतिहास के कारण उन्हें मुखौटा बनाये हुए हैं और विसंगति आने पर कहते हैं कि डाकूमेंट अंग्रेजी में होने के कारण उनके नेता अन्ना को समझ में नहीं आया। ये लोग एक दूसरे का समर्थन हड़प लेना चाहते हैं, और भाजपा जैसे दल इनके द्वारा पैदा किये गये जनउभार से राजनीतिक लाभ उठाने की फिराक में उनके मददगार हैं। पिछले साल भर में इस क्षेत्र में जैसी जैसी घटनाएं हुयी हैं उसमें कहा नहीं जा सकता कि कब किसका सच सामने आ जाये और आन्दोलन की हवा निकल जाये या कितने अग्निवेष और निकलें।  कुछ लोग इसे आन्दोलन न कह कर तमाशा कहते हैं और लगता है कि वे गलत भी नहीं हैं।  
 वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शुक्रवार, जून 15, 2012

मोदी के सामने रीढ विहीन होती जाती भाजपा


                                 मोदी के सामने रीढ विहीन होती जाती भाजपा  
                                                                                    वीरेन्द्र जैन
      जैसे कि सुब्रम्यम स्वामी उस जनता पार्टी के प्रमुख हैं जिस नाम की पार्टी ने कभी इमरजैन्सी लगाये जाने से आक्रोशित जनता का समर्थन हासिल करते हुए केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी थी, पर  सुब्रम्यम स्वामी की यह जनता पार्टी, आज वही जनता पार्टी नहीं है केवल उसका साइनबोर्ड भर है। वैसे ही अब भाजपा रूपी जनसंघ वह पार्टी नहीं रह गयी है जो आज से कुछ दशक पहले थी, या अपने जनसंघ रूप में जन्म लेने के समय थी। इसकी रीढ टूट चुकी है और अब यह एक अपंग पार्टी हो गयी है।
      भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा है जो संघ के लक्ष्य को पाने के लिए उसके 62 अन्य संगठनों की तरह चुनावी मोर्चे पर इस उद्देश्य से काम करती है ताकि सरकार बना के आंतरिक सुरक्षा बलों, और आर्थिक संसाधनों पर अधिकार किया जा सके और अंततः संघ के हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। देश की बहुसंख्यक जनता संघ परिवार और उसकी साम्प्रदायिक नीतियों को पसन्द नहीं करती इसलिए जनता को  भ्रमित करने के लिए उन्हें जनसंघ व भाजपा के माध्यम से उदारतावादी मुखौटे लगा कर आना पड़ा। पर जब इन मुखौटों के बाद भी उनका समर्थन  मतदान में दस प्रतिशत से आगे नहीं गया तब उन्होंने अपनी नीतियों पर पुनार्विचार की जगह दूसरे दूसरे तरीकों से जनता को भरमाने और संख्याबल बढाने की हरसम्भव कोशिश की। ऐसा करके वे या तो सत्तारूढ हुए हैं या प्रमुख विपक्षी दल बन कर, सत्तारूढ पार्टी की अलोकप्रियता के समय नकारात्मक समर्थन मिलने की ताक में रहते हैं।  जोड़ तोड़ की दम पर यह पार्टी न केवल राज्यों में सफल भी हुयी अपितु  1998 से 2004 के बीच उसने देश के केन्द्र में गठबन्धन सरकार चलायी।
      सच तो यह है कि भाजपा ने अपनी पार्टी का शरीर कृत्रिम हवा भर कर फुलाया। संविद सरकारों के दौर में वे बिना किसी न्यूनतम कार्यक्रम के प्रत्येक संविद सरकार में सप्रयास सम्मलित हुये व भितरघात करते रहे। संघ की अनुमति से अपने संख्या विस्तार के लिए उसने बड़े पैमाने पर दलबदल को प्रोत्साहन दिया व कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी से आने वाले किसी भी उपयोगी व्यक्ति को पार्टी में प्रवेश देने या टिकिट देने में कोई संकोच नहीं किया, भले ही वह गैर कानूनी, आपराधिक कार्यों में लिप्त रहने के कारण निकाला गया हो। उसके सारे फैसले संघ के इशारों पर होते रहे हैं क्योंकि हर स्तर के संगठन सचिव संघ के प्रचारकों को ही नियुक्त किये जाने का नियम है और इस तरह उसका पूरा नियंत्रण रहता है, पर बात बात में हस्तक्षेप करने वाले संघ ने कभी भी इस दलबदल को हतोत्साहित करने की कोशिश नहीं की। कभी अपने को सैद्धांतिक और अन्य पार्टियों से भिन्न बताने वाली यह पार्टी आज दलबदल की ईंटों से खड़ी पार्टियों में सबसे प्रमुख पार्टी है। दलबदल के खिलाफ कानून बनने तक उन्होंने इसी अनैतिक कदम के द्वारा ही सरकारें बनायीं। इससे उसके वोट प्रतिशत का भी विस्तार हुआ। जिस नेहरू-गान्धी परिवार के लोगों को वे पानी पी पी कोसते हैं, उसी परिवार के दो सदस्यों मनेका गान्धी और वरुण गान्धी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके सादर टिकिट दिया आज वे न केवल अपनी मर्जी से ही अपना टिकिट तय करते हैं अपितु वरुण की पत्नी को भी चुनाव लड़ाने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनावों में उनके द्वारा चयनित और समर्थित प्रत्याशियों की करारी हार के बाद मनेका पीलीभीत से और वरुण सुल्तानपुर से इस विश्वास के साथ चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं, कि पार्टी को तो टिकिट देना ही पड़ेगा। अपना बड़ा समर्थन दिखाने के लिए उन्होंने क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म स्टार, आदि को भर्ती किया जो उनकी सभाओं में भीड़ जुटाने के भरपूर पैसे लेते हैं जो उनकी एक दिन की शूटिंग के पारिश्रमिक से कई गुना होते हैं। इसी तरह साधु साध्वियों के भेष में रहने वाले प्रवचनकर्ताओं को लालच देकर उन्हें उनके धार्मिक काम की जगह धर्मभीरु लोगों के वोट खींचने के लिए नियुक्तियां दीं, जिनमें से कुछ को तो उन्हें विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री तक बनाना पड़ा। रामजन्मभूमि मन्दिर विवाद को उन्होंने साम्प्रदायिक रूप देकर ध्रुवीकरण कराया व साम्प्रदायिक दंगों की श्रंखला खड़ी करके ध्रुवीकरण द्वाराअपनी जीत का माहौल बनाया।
      राज्यों में जहाँ जहाँ उनकी सरकारें बनीं उन्होंने संघ की संस्थाओं के नाम पर जमीनों और भवनों का कौड़ियों के मोल में अधिग्रहण किया तथा विभिन्न अवैध और अनैतिक तरीकों से अटूट धन संग्रहीत किया। संघ की ओर से इन विकृत्तियों को रोके जाने या भ्रष्ट लोगों को मंत्रिमण्डल से हटाये जाने के कभी निर्देश नहीं दिये गये। परिणाम यह हुआ कि भाजपा के संगठन और संसद में  कमाऊ पूत ही स्थान पाते गये। दिवंगत प्रमोद महाजन को तो नागपुर अधिवेशन में अटलबिहारी वाजपेयी ने अपना लक्षमण बतलाया था। आज भी वे पहले उसके बेटे, फिर बेटी को राजनीति से जोड़े रखने के भरपूर प्रयास करने में लगे हुए हैं। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनते समय कभी पार्टी छोड़ देने की धमकी देने वाले गोपीनाथ मुंडे को लोकसभा में उपनेता बनाना पड़ा था। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा उठाये गये इस सवाल का कि गडकरी के पास इतना पैसा कहाँ से आया, आज तक कोई उत्तर नहीं दिया गया।              
            भाजपा सदैव से ही ऐसी नहीं थी। अपने पूर्व नाम जनसंघ के प्रारम्भिक दौर में कुछ सिद्धांतवादिता शेष थी। स्मरणीय है कि ; प्रथम, जमींदारी और जागीरदरी के खिलाफ जब वैचारिक माहौल बन रहा था और राजस्थान विधान सभा में इसे हटाने के लिए विधेयक आया तब जनसंघ के पास तेरह विधायक थे. उनमे ग्यारह विधायक ज़मींदारी के समर्थक थे. जनसंघ ने उन्हें दल से निकाल दिया और पार्टी के पास मात्र दो विधायक रह गए। जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन के दौरान विपक्ष ने विधान सभा से इस्तीफा देने का निर्णय लिया. इस पर जनसंघ के पच्चीस विधायकों में से चौदह ने विरोध किया. पार्टी ने उन सबको निकाल दिया। किंतु आज येदुरप्पा से लेकर मोदी तक और वसुन्धरा से लेकर उमाभारती तक के मामलों में भाजपा दृड़ता नहीं दिखा सकी। इसका प्रमुख कारण उसकी सत्ता लोलुपता है। कुर्सी के लिए उन्होंने जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन करने से लेकर कैसे कैसे गलत और अनैतिक समझौते किये हैं उनकी सूची बहुत लम्बी और सर्वज्ञात है। आज भाजपा के रूप में जनसंघ का केवल नाम चल रहा है, जहाँ अवैध पैसे की दम पर वोट खरीदे जाते हैं तथा झूठ और षड़यंत्र के सहारे चुनाव के समय साम्प्रदायिकता फैला कर ध्रुवीकरण किया जाता है। हिन्दू एकता का ढोंग करने वाले आज चुनावों में  जातिवाद  का भरपूर सहारा लेते हैं और अपने राजनीतिक आर्थिक हितों के लिए जातिवादी दलों के साथ गलबहियां करते हैं। वे वोटों के लालच में सारे सांसदों को गालियाँ देने वाले  बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक किसी भी आन्दोलन में घुसने की कोशिश करते हैं जबकि एक बड़े आकार का दल होने के कारण ये राजनीतिक आन्दोलन उन्हें स्वयं चलाने चाहिए थे।
           
आज भाजपा चुनावी सौदेबाजी में माहिर और सिद्धांतहीन गठजोड़ के लिए सदैव उतावली संस्था के रूप में सत्ता के लिए टकटकी लगाये रहती है। आज यह उस संस्था के रूप में जानी जाती है जिसमें मूल्य और लोकतंत्र की जगह जिद और दबाव के आगे बार बार झुकने के दृष्य सामने रहे हैं। आज भाजपा सिद्धांतों के लिए सत्ता का दाँव इसलिए नहीं खेल पा रही क्योंकि वो रीढहीन हो चुकी है जो भ्रष्टाचार के आरोप में कैमरे के सामने आये राष्ट्रीय अध्यक्ष को तब तक पार्टी में ढोती है जब तक कि उसे सजा नहीं हो जाती उसकी गैर राजनीतिक पत्नी को लोकसभा में भेजने को विवश होती है।
      अपने षड़यंत्रकारी तरीकों के कारण वे हर सहभागी से डरते हैं जो उनकी पोल खोल सकता है, वे राज्यों के हर उस मुख्यमंत्री और मंत्री से डरते हैं जो उनके खजाने को निरंतर भर रहे हैं और इसी के सहारे अपने खजाने को भी कुबेर का खजाना बना लेते हैं। आज उनकी सबसे बड़ी ताकत पैसा, अवसरवादिता, सैद्धांतिक लोच, और विकल्प हीनता वाले क्षेत्र ही हैं। यही कारण है कि आज अनुशासन नाम का भी नहीं रह गया है और इसी के अनुसार उसके नेतृत्व की छवि भी प्रभावित हुयी है  इस रीढहीनता के चलते वे कभी भी विलुप्त जातियों की सूची में सम्मलित हो सकते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, जून 07, 2012

पाँचजन्य और आर्गनाइजर, मुखपत्र या मुखौटापत्र






पाँचजन्य और आर्गनाइजर, मुख पत्र या मुखौटा पत्र

वीरेन्द्र जैन
       

 गत दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख राम माधव ने भोपाल में कहा कि पांचजन्य और आर्गनाइजर का संचालन स्वयंसेवक करते हैं लेकिन उनमें प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार संघ के विचारों से मेल खाएं यह जरूरी नहीं है। वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में आरएसएस के दो मुखपत्रों में छपे अलग अलग विचारों के बारे में सफाई दे रहे थे।
       विकीपीडिया पर बताया गया है कि आर्गनाइजर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का इन-हाउस पब्लिकेशन/न्यूज पेपर है, जिसे ही हिन्दी में मुख पत्र कहा जाता है। यही सूचना पांचजन्य के बारे में है। दोनों ही साप्ताहिक पत्र एक ही स्थान से मुद्रित व प्रकाशित होते हैं और दोनों का कार्यालय संस्कृति भवन देशबन्धु गुप्ता मार्ग झंडेवालान दिल्ली में स्थित है। जो संघ के दिल्ली कार्यालय के समीप है। दोनों साप्ताहिकों के समाचारों के सूचना माध्यम एक ही होते हैं, व दोनों के ही लेखों के लेखक भले ही अलग अलग होते हों किंतु विषय और विचार एक ही होते रहे हैं। दोनों साप्ताहिकों का पाठक वर्ग भी संघ समर्थक मध्यम वर्ग है। महात्मा गान्धी की हत्या के बाद और इमरजैंसी में जब संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया तब इन समाचार पत्रों का प्रकाशन भी प्रभावित हुआ और ये डूबा साध कर बैठ गये। दोनों के सम्पादक संघ से जुड़े लोग रहे हैं।
       देश के स्वतंत्र होने के बाद प्रकाशित इन दोनों साप्ताहिकों के जीवन में यह पहली बार हुआ है जब इनके सम्पादकीय लेखों के विचारों में वैसा ही भेद नजर आया जैसा कि संघ समर्थित अडवाणी और मोदी के विचारों में दृष्टिगोचर हुआ। अपनी कमजोरी पर विचार करने, उसे समझने, भूल स्वीकारने व उसके लिए क्षमाप्रार्थी होने, की परम्परा संघ में नहीं रही है। वे दोषी व्यक्ति से अपने सम्बन्ध को ही नकार देते रहे हैं, जैसा कि महात्मा गान्धी के हत्यारे गोडसे के मामले में किया था। इन्हीं से प्रशिक्षित होकर निकले भाजपा के नेता भी इसी तरकीब का अनुसरण करते हैं। अडवाणीजी ने बाबरी मस्ज़िद ध्वंस के बाद कहा था कि उसे तोड़ने वाले तो मराठी लोग थे जिन्हें मैं रोकता रहा पर मेरी भाषा न समझने के कारण मेरी अपील का कोई असर नहीं हुआ। कर्नाटक के खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं से उपकृत और उन्हें आशीर्वाद देने वाली सुषमा स्वराज उनके फँस जाने के बाद उनसे कोई भी सम्बन्ध होने से इंकार कर देती हैं। मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष रोहाणी से लेकर ऐसे सैकड़ों अन्य प्रकरण गिनाये जा सकते हैं। साध्वी की वेषभूषा धारण करने वाली प्रज्ञा सिंह और उसकी टीम से अपने सम्बन्ध भी संघ परिवार ने साफ नकार दिये थे और सीडी सामने आने के बाद संजय जोशी से तुरंत दूरी बना ली थी। इसलिए पाँचजन्य और आर्गनाइजर को संघ का मुख पत्र होने से इंकार करने पर अचम्भित लोगों को सम्पादकों  से संघ के विचारों की असहमति वाले बयान से कोई आश्चर्य नहीं हुआ होगा।
        विडम्बनापूर्ण स्थिति आ जाने पर संघ के बयानवीर कहने लगते हैं कि हम भाजपा के कार्यों में कोई दखल नहीं देते, केवल माँगने पर उन्हें सलाह देते हैं। इसके विपरीत सच यह है कि भाजपा में संघ की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होता रहा और उसकी छोटी से छोटी घटना पर भी उसकी निगाह रहती रही है, जिसके लिए प्रत्येक स्तर के संगठन मंत्री का पद संघ प्रचारक के लिए आरक्षित रखा गया है। भारतीय लोकतंत्र में इस दूसरे सबसे बड़े दल की कार्यप्रणाली में संघ ही सबसे बड़ी बाधा रहा है। जनसंघ के सबसे पहले अध्यक्ष मौल्लिचन्द्र शर्मा ने संघ के अनावश्यक हस्तक्षेप से दुखी होकर ही स्तीफा दिया था। देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार संघ के साथ दुहरी सदस्यता के कारण ही बिखरी थी जिससे विकसित हो रही लोकतांत्रिक प्रणाली को बड़ा धक्का लगा था। एनडीए के गठबन्धन में और बाद में उसके निरंतर कमजोर होते जाने में सबसे बड़ा कारण संघ का हस्तक्षेप ही रहा है। संघ के कारण ही तेलगुदेशम अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में सम्मलित नहीं हुयी थी अपितु उसे अपनी शर्तों पर बाहर से समर्थन देना मंजूर किया था जिससे सरकार लगातार अस्थिरचित्त रही। लाल कृष्ण अडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता को अपना अध्यक्ष पद संघ के दबाव में ही छोड़ना पड़ा था जबकि कार्यकारिणी के दस प्रतिशत सदस्य भी ऐसा नहीं चाहते थे। यही कारण रहा कि
आडवाणी ने 2005 सितंबर में चेन्नई में आयोजित बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ये कहते हुए संघ को आईना दिखाने की कोशिश की थी कि, बीजेपी के बारे में ये धारणा बन गई है कि इसके कोई राजनीतिक या सांगठनिक निर्णय आरएसएस की सहमति के बगैर नहीं होते, ऐसी धारणा से बीजेपी के साथ संघ का भी नुकसान हो रहा है।भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने की कल्पना तक किसी भाजपा सदस्य ने नहीं की थी किंतु उन्हें न केवल संघ ने पूरी पार्टी पर थोप दिया अपितु राज्यों के चुनावों में खराब प्रदर्शन की बाबजूद दुबारा अध्यक्ष बनाये जाने का रास्ता साफ कर दिया गया है।
      संघ परिवार का इस समय मूल संकट ही यह है कि इस अति का विरोध प्रारम्भ हो गया है राजस्थान में वसुन्धरा राजे ने संघ के सबसे चहेते गुलाब चन्द्र कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा को धूल चटा दी व संघ को अपनी हरी झंडी को लाल में बदलना पड़ा। नरेन्द्र मोदी स्वयं को गुजरात का प्रधानमंत्री समझते हैं और कुछ उद्योगपतियों द्वारा स्वार्थवश उनकी अतिरंजित प्रशंसा कर देने के कारण वे अपने काल्पनिक पद का विस्तार करने के सपने देखने लगे हैं। वे भी अपनी उम्मीदवारी में पहली चुनौती संघ को मान रहे हैं इसीलिए उन्होंने समय रहते उसे चुनौती दे दी है व उसके द्वारा नियुक्त संजय जोशी को निकालने के लिए अपने वीटो का प्रयोग कर दिया। उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ अपने क्षेत्र में अपने स्वयं की आरएसएस चलाते हैं। उत्तराखण्ड और हिमाचल में भी सुगबुगाहट है क्योंकि इन क्षेत्रों में साम्प्रदायिकता का असर कमजोर है जो आरएसएस की जीवनी शक्ति है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में भी किसान संगठन के लोग संघ की पकड़ से निकल भागे हैं।
      प्रत्येक मतभेद को आंतरिक लोकतंत्र कहने का तरीका अब घिस चुका है और प्रभावित नहीं करता। संघ के लोगों को स्पष्ट करना चाहिए कि जिस विषय पर ये आंतरिक लोकतंत्र कौंध रहा है उस विषय पर उनका कहना क्या है और वे किस तरफ हैं। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि अगर ये दोनों पत्र केवल मुखौटापत्र हैं त्तो उनके संगठन के मूल फैसले कहाँ पर उपलब्ध होते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, जून 01, 2012

अडवाणीजी अब तो सच्चाई स्वीकारिये


अडवाणीजी अब तो सच्चाई स्वीकारिये
वीरेन्द्र जैन
       दर्शन शास्त्र के एक प्रोफेसर को साधारण भौतिक वस्तुएं भूल जाने की बीमारी थी। बरसात की एक शाम जब वे भीगे हुए अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे तो घर में प्रवेश से पहले ही तेज याददाश्त वाली उनकी पत्नी ने पूछा छाता कहाँ है?
वह तो कहीं खो गया प्रोफेसर ने बताया
...पर कहाँ? पत्नी ने क्रोधपूर्ण जिज्ञासा की
वह तो पता नहीं वे बोले
आखिर आपको कब पता चला कि छाता खो गया है? पत्नी का अगला प्रश्न था
जब बरसात बन्द हो गयी और मैंने छाता बन्द करने के लिए हाथ ऊपर किया तो पता चला कि छाता तो है ही नहीं प्रोफेसर ने बताया।        
       भाजपा के वरिष्ठतम नेता पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी को भी भाजपा से जनता के निराश होने का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें सारी उम्मीदवारियों से मुक्त कर दिया गया अर्थात उनकी आशाओं पर न केवल पानी फेर दिया गया अपितु पौंछा भी लगा दिया गया। इतना ही नहीं गडकरी ने अपने चहेते भामाशाह अंशुमान मिश्रा द्वारा जो अपने पैसे की दम पर भाजपा अध्यक्ष को जेब में डाले हुए है, उनका अपमान भी करा दिया जिसने भारतीय राजनीति के इस सबसे वरिष्ठ नेता को रिटायर होकर नाती पोतों को खिलाने की सलाह दे डाली है और इस रामलीला पार्टी में राजनीतिक भूमिकाओं को अभिनेताओं की भूमिकाओं से तुलना करते हुए कहा है कि देश को ए.के. हंगल नहीं आमिर और रणवीर कपूर की जरूरत है। स्थिति की बिडम्बना यह भी है कि भरी पूरी पार्टी में उन लोगों का अकाल दिखा जो अपने नेता के इस अपमान का विरोध करते क्योंकि सारी ही पार्टी लालचियों और चापलूसों के गिरोह में बदल गयी है, जो गडकरी जैसी कठपुतली को सलाम कर सकते हैं पर अडवाणी के अपमान पर अफसोस भी नहीं कर सकते। जब अडवाणी के सहारे सत्ता तक पहुँचने की सम्भावनाएं थीं तब इन्हीं लोगों ने रथ यात्रा के दौरान उनको गिरफ्तार किये जाने पर पूरे देश में हिंसक उपद्रव कर दिये थे।
       वैसे अडवाणी ने भाजपा के प्रति जनता के रुख का सार्वजनिक खुलासा अभी किया हो पर जहाँ जहाँ भाजपा की सरकारें हैं या वह किसी क्षेत्रीय पार्टी के नीचे किसी राज्य सरकार में सम्मलित है वहाँ वहाँ जनता की निराशा के पर्याप्त संकेत सूचना माध्यमों पर उपलब्ध हैं। उन्हें छुपाने के लिए सम्बन्धित राज्यों के जनसम्पर्क विभाग द्वारा पर्याप्त मात्रा में खैरातें बाँटी जा रही हैं, पर वे फिर भी रोके नहीं रुक रहीं। निराश जनता ने एनडीए का शासन भी भोग लिया है और वह जानती है कि सरकार के सहारे लूटखसोट करने में ये सबसे आगे रहते हैं इसलिए जनता अब इन्हें विकल्प के रूप में नहीं देख रही। जहाँ तक बाबूलाल कुशवाहा समेत उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से निकाले गये मंत्रियों को भाजपा में सम्मलित करने का सवाल है, वह भाजपा के लिए कोई नया हथकण्डा नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चलाने के लिए उन सुखराम से गलबहियाँ करने से गुरेज नहीं किया गया था जिन पर छापा पड़ने पर इन्होंने छह दिन तक संसद नहीं चलने दी थी। शिबू सोरेन समेत दागी मंत्रियों को हटाने के नाम पर इन्होंने सदन के कई महत्वपूर्ण दिन बरबाद करवा दिये थे उन्हीं के साथ आज झारखण्ड में सरकार बनाये हुए हैं और वही शिबू सोरेन अपने लड़के के नाम पर सरकार चला रहे हैं और अपनी सरकार में भाजपा अपना राज्य सभा का उम्मीदवार तक नहीं जितवा पाती। जिन जयललिता के भ्रष्टाचार के खिलाफ इन्होंने संसद में तूफान मचा दिया था उन्हीं के सहारे अटल बिहारी ने एनडीए की सरकार चलायी तथा इतनी चिरौरियां करते हुए चलायी कि जयललिता अटलजी के रक्षा मंत्री को घंटों बाहर बिठाये रखती थीं। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की शुरुआत भी एनडीए शासन काल में ही हो गयी थी, जिसमें अडवाणीजी उपप्रधानम्ंत्री थे व ‘प्रधान मंत्री के सारे काम’ देख रहे थे।      
       सत्ता के लिए सारे अनैतिक हथकण्डे अपनाना व सभी तरह के समझौते करना गडकरी ने अपने पूर्ववर्तियों से ही सीखा है। टिकिट न मिलने या किसी अन्य असंतोष की वजह से अपनी पार्टी छोड़ने वाले सारे प्रमुख नेताओं को भाजपा ने आगे बढकर गले लगाया है और उसका एक बड़ा हिस्सा दलबदलुओं या लोकप्रिय सितारों को किराये से लेकर से भरा हुआ है। दलबदल करा के पूरे विधायक दल को किसी पर्यटन स्थल पर कैद करने की परम्परा भी भाजपा ने ही शुरू की थी व दलबदल में सौदेबाजी की शुरुआत भी मध्यप्रदेश में संविद शासन के लिए विजया राजे सिन्धिया द्वारा थैली खोल देने से ही हुयी थी। उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ छह छह महीने सरकार चलाने का बेहद हास्यस्पद प्रयोग भी भाजपा की देन है। इस पर इनके सहयोगी बाल ठाकरे ने व्यंग किया था कि अगर कुछ पैदा करना था तो छह छह महीने क्यों कम से कम नौ नौ महीने  का समझौता तो करना चाहिए था। समस्त दलबदलुओं समेत सौ लोगों का मंत्रिमण्डल बनाने का अजीब प्रयोग भी उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह सरकार में किया गया था जिसके मंत्रियों का यहाँ तक कहना था कि मंत्री बने छह महीने हो गये पर हमारे पास आज तक एक भी फाइल दस्तखत होने नहीं आयी। पूर्व डकैतों को टिकिट देने की शुरुआत भी भाजपा ने ही की थी जब उन्होंने मुलायम सिंह के खिलाफ मलखान सिंह को खड़ा किया था, बाद में तो यह फार्मूला ही चल निकला था। आज भी प्रत्येक चुनाव में आत्मसमर्पित दस्यु या जमानत पर छूटे अपराधी टिकिट माँगते देखे जाते हैं। नगर निकायों या पंचायती राज में तो उनमें से कई अभी भी विभिन्न पदों पर कब्जा किये हुए हैं। अभी हाल ही में हरियाणा के उपचुनाव में इन्होंने उन्हीं भजनलाल के बेटे के साथ समझौता किया था जिन्हें भ्रष्ट और अवसरवादी बताते हुए इन्होंने लम्बा समय गुजारा है।
       अवसरवादी, समझौता परस्ती का यह दोष भले ही भाजपा में अब अपने चरम पर पहुँच गया हो किंतु इसकी शुरुआत बहुत पहले ही हो गयी थी और कोई भी ऐसा काम अडवाणी की जानकारी के बिना सम्भव ही नहीं था। कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं को इस दशा तक पहुँचाने में अडवाणी की परम शिष्य श्रीमती सुषमा स्वराज के आशीर्वाद का ही हाथ रहा है जिन्हें श्रीमती सोनिया गान्धी के खिलाफ चुनाव में उतारा गया था और चुनाव की पूरी व्यवस्था रेड्डी बन्धुओं ने की थी। यदि उम्र के इस पड़ाव पर अडवाणीजी सचमुच ही अपने किये पर पछता रहे हों तो उन्हें चाहिए कि वे अब एक सच्ची आत्मकथा लिखें और पूरे राजनीतिक जीवन में अपने द्वारा किये या देखे गये उन कामों का खुलासा करें जो अभी तक जनता के सामने नहीं आये हैं। यदि उन्होंने ऐसा करने का साहस जुटाया तो वे प्रधानम्ंत्री बनने की तुलना में इतिहास में अमर हो सकते हैं और भारतीय लोकतंत्र को अपना आत्मावलोकन करने व सुधरने का अवसर मिल सकता है।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 25, 2012

सम्वेदनात्मक ज्ञान की भेदक क्षमता और मीडिया के सदुपयोग का उदाहरण


सत्यमेव जयते
सम्वेदनात्मक ज्ञान की भेदक क्षमता और मीडिया के सदुपयोग का उदाहरण
वीरेन्द्र जैन
      जयप्रकाश आन्दोलन और इमरजैंसी के दौरान अपनी गज़लों के माध्यम से पूरे समाज को झकझोर देने वाले शायर दुष्यंत कुमार का एक शे’र है-

                   वे मुतमईन हैं पत्थर पिघल नहीं सकता
                   मैं बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए
आमिर खान द्वारा तैयार कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ ने एक बार फिर दूरदर्शन को, बुनियाद, हमलोग, महाभारत, भारत एक खोज, तमस, आदि सीरियलों के उस दौर में पहुँचा दिया है जहाँ सम्वेदना के साथ ज्ञान का समन्वय करके देश के बड़े मध्यम वर्ग तक समाज को सार्थक दिशा में बदलने का सन्देश दिया जाता रहा है। आज इस माध्यम में रंग हैं और निखार है और इसकी पहुँच दूर दूर तक है। अगर आप कोई समझदारी भरी बात दिल को छू लेने वाली भाषा और अन्दाज़ में करते हैं तो ऐसा नहीं है कि समाज में परिवर्तन के वे बीज न बोये जा सकें जो अभी दिमागों में कुण्ठित हो कर दम तोड़ देते हैं। वैसे भी वे अपने सन्देशों के साकार परिणाम चाहते हैं, इसलिए उनका कथन भी है कि-
               सिर्फ हंगामा खड़ा करना मिरा मकसद नहीं
               मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
 अमिर खान के इस कार्यक्रम के अब तक प्रसारित अंकों को जो लोकप्रियता मिली है, वह इस बात की संकेतक है कि आमिर के एपीसोडों से सम्बन्धित भावनाएं देशवासियों के मानस पटल पर निरंतर दस्तक देती रही हैं पर उन्हें आन्दोलन में बदल उनके अग्रदूत बनकर झंडा उठाने का साहस कोई नहीं जुटा पा रहा था। आमिर ने वह दुस्साहस किया और देश का समर्थन हासिल किया है। कोई बात उसी समय लोकप्रिय होती है जब वह पूर्व से ही लोगों के मन में छायी होती है पर उसका श्रेय उस बात को शब्द देने वाले उस व्यक्ति को मिलता है, जो असफलता की सम्भावना से भयभीत हुये बिना आगे आता है। मिर्ज़ा गालिब ने कहा है-

               देखिए तकरीर की लज्जत कि जो उसने कहा
               मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है  
      आमिरखान एक प्रयोगधर्मी संस्कृतिकर्मी हैं। पिछले दिनों उन्होंने ‘रंग दे बसंती’, ‘फना’, ‘तारे जमीं पर’, ‘पीपली लाइव’, ‘थ्री ईडियट्स’ आदि फिल्में बनाकर यह साबित किया था कि उनमें न केवल नये विषय चुनने की तमीज है अपितु देश और समाज के हित में उन आफबीट विषय पर फिल्में बना कर व्यावसायिक खतरा मोल लेने की हिम्मत भी है। किसी बात के कहने का महत्व इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे कौन कह रहा है, क्योंकि उस के व्यक्तित्व के आधार पर ही उसे कहने का अधिकार प्राप्त होता है। इस मामले में साधु द्वारा बच्चे को गुड़ न खाने की सलाह देने के पहले पन्द्रह दिन का समय लेने की लोककथा बहुत प्रचलित है जिसमें साधु ने पहले सलाह देने की पात्रता प्राप्त की थी तब बच्चे को सलाह दी थी। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त फिल्में बनाकर आमिर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ बनाने की पात्रता पायी है और वे सन्देश देने में सफल भी रहे हैं।
      उन की लोकप्रियता आज के दो दूसरे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से होड़ लेती है। किंतु इन शिखर के कलाकारों ने कुछ बहुत अच्छी और आदर्श फिल्में करने के बाबजूद जिस तरह के व्यावसायिक समझौते किये उससे वे किसी आदर्श को सामने रखने के हक़दार नहीं रह गये। उन्होंने केवल कहानी पर अभिनय किया है किंतु आमिर ने सच्ची घटनाओं से समस्याओं को उठाया है और समाधान के स्तर तक ले जाने की प्रेरणा दे रहे हैं। अमिताभ बच्चन की सफलता में उनके परिवार की श्रीमती इन्दिरा गान्धी के परिवार से मित्रता की भी बड़ी भूमिका रही है और बाद के समय में अमिताभ बच्चन और राजीव गान्धी की मित्रता जग जाहिर रही है। राजीव गान्धी ने जब सोनिया गान्धी से शादी की थी तब सोनिया परिवार का निवास श्री हरिवंश राय बच्चन का बंगला ही बनाया गया था जो उस समय राज्यसभा के मानद सदस्य थे। सोनिया गान्धी के हाथों में मेंहदी रचाने का काम श्रीमती तेज़ी बच्चन ने किया था। राजीव गान्धी को चुनावी सफलता दिलाने के लिए अमिताभ ने इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे कद्दावर नेता को अपनी फिल्मी लोकप्रियता से हरा कर चुनावों को गैर राजनीतिक और मुद्दाविहीन बनाने की शुरुआत की थी। बाद में बोफोर्स तोप सौदों की खरीद पर लगे आरोपों में उनके और उनके भाई अजिताभ का नाम भी इसलिए उछाला गया था ताकि राजीव को कमजोर किया जा सके। अमिताभ बच्चन एक प्रतिष्ठित साहित्यिक परिवार से आते हैं और फिल्मों से की गयी कमाई को उन्होंने कई तरह के उद्योग धन्धों में लगाया जिनमें उन्हें नुकसान भी हुआ, पर उन्होंने कभी धन का स्तेमाल आमिर की तरह के सामाजिक सोद्देश्यतापूर्ण संस्कृतिकर्म में नहीं किया। व्यवसाय में नुकसान होने पर वे अमर सिंह की सलाह पर चलने लगे और समाज को भटकाने वाली विज्ञापन फिल्में करने लगे। उन्होंने एक ओर समाजवादी पार्टी के लिए उस समय काम किया जब उसकी सरकार अव्यवस्था के कारण बहुत बदनाम हो रही थी जिससे उनकी लोकप्रियता पर फर्क पड़ा। इनकम टैक्स विभाग इलाहाबाद से नोटिस मिलने पर जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विभाग पर हमला कर दिया और कार्यालय में तोड़फोड़ कर दी तो उन्होंने अफसोस जताने की जरूरत नहीं समझी। आज भी वे एक ओर तो अस्पताल में जाकर बीमार अमर सिंह के गले लग कर रोने का अभिनय करते हैं जो सार्वजनिक रूप से मुलायम के मरने की दुआ करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी पत्नी श्रीमती जया बच्चन को समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा में दुबारा भेजते हैं। समाजवादी पार्टी से अपनी पत्नी को सांसद बनवाने के बाबजूद वे उस भाजपा शासित गुजरात के ब्रान्ड एम्बेसडर बनना स्वीकार कर लेते हैं जिसकी करतूतों का विरोध करने के कारण ही समाजवादी पार्टी अपनी जीत सुनिश्चित कर पाती है। लगभग ऐसा ही हाल आईपीएल में अपनी टीम उतारने वाले शाहरुख खान का भी है जो सुर्खियों में बने रहने के लिए तरह तरह के तमाशे करते रहते हैं। यही कारण है कि इस समय फिल्मों के तीन सुपर स्टारों में से आमिर का कद समाज में सबसे ऊंचा बना हुआ है।
      आमिर के काम और उसके कद को उनके विरोधियों के चरित्र से भी नापा जा सकता है। स्मरणीय है कि जिन कार्लमार्क्स के बारे में डा. राधा कृष्णन ने कहा है कि
मार्क्स इस युग के ईसा मसीह हैं उनकी अंतिम यात्रा में कुल 29 लोग थे। दफनाते समय जब उनके घनिष्ठ मित्र और सहयोगी एंजिल ने कहा कि हम इस दौर के सबसे महान व्यक्ति को दफना रहे हैं तो एंजिल के एक मित्र ने बाद में पूछा कि जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में कुल 29 लोग थे उसे सबसे महान व्यक्ति कैसे कहा जा सकता है। एंजिल ने उत्तर दिया कि यह भी देखो कि उसके विरोध में दुनिया के कितने लोग हैं! बाद में उनकी बात सच साबित हुयी। इसी तरह आमिर खान के इस काम को जहाँ एक ओर आम भारतीय मध्यम वर्ग का व्यापक समर्थन मिल रहा है वहीं एक खास वर्ग उनका विरोध भी कर रहा है। यह वह वर्ग है जिस पर न केवल आपराधिक आरोप हैं अपितु जो कानून के रन्ध्रों में से निकल कर अपने आप को सजाओं से बचाये हुये हैं। आमिर खान का मुखर विरोध करने वालों में बाबा रामदेव प्रमुख रूप से सामने आये हैं और उन्होंने कहा है कि आमिर यह काम केवल पैसे बनाने के लिए कर रहे है। रोचक यह है कि यह बात वह व्यक्ति कह रहा है जिसने कुल पन्द्रह साल में ग्यारह सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति बनायी है और जिसको हाल ही में करोड़ों रुपये टक्स न चुकाने के लिए नोटिस मिले हैं। दूसरी ओर अपने दुहरे चरित्र के लिए जाने जाने वाले संघ परिवार के वे संगठन हैं जो छद्म रूप से काम करते हैं, उनके छद्म खातों वाले फेसबुकिये आमिर की पूर्व पत्नी से हुए तलाक के मामले को उठाने, और कार्यक्रम में धन का हिसाब किताब लगाने में लग गये हैं। सच तो यह है कि सत्यमेव जयते नाम से ही वे लोग घबराते हैं जिनकी सारी राजनीति ही झूठ और धोखे पर टिकी होती है। वे भयभीत हैं कि कहीं सच को सामने लाने वाला यह कार्यक्रम, बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार, नेताओं के चारित्रिक पतन, राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार, साधु साध्वियों के भेष में रह कर किये गये आतंकी कारनामों, और उनके आरोप दूसरी जमात के लोगों पर मड़ने के सच को न सामने लाने लगे।
      स्मरणीय है कि समाज में परिवर्तन चाहने वाली यह वही जनता है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव तक के पीछे जाने को उतावली बैठी रही है। अब जब उसे स्वयं कुछ सार्थक करने के अवसर मिल रहे हैं तो वह दूसरों पर निर्भर होने की जगह खुद ही कुछ सार्थक करके देखने के सन्देश से प्रभावित होगी। यदि यह अभियान सफल रहा तो बहुत समय बाद  सांस्कृतिक अभियान से समाज परिवर्तन का बड़ा प्रयोग होगा। समाज के प्रति चिंतित सभी शक्तियों को इस अभियान, कार्यक्रम और उसकी सफलता की कहानियों पर नजर रखनी चाहिए और संतुष्ट होने पर इसे सहयोग देना चाहिए।   
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 18, 2012

भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली पड़ गयी है


    भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली हो गयी है
                                                                        वीरेन्द्र जैन
        आरएसएस और भाजपा के सम्बन्ध कुछ कुछ अवैध सम्बन्धों जैसे हैं जिन्हें दिन के उजाले में छुपाये रखा जाता है किंतु अँधेरे में बनाये रखा जाता है। किंतु इनका यह सत्य भी ऐसे ही जग जाहिर है जैसा कि रहीम ने एक दोहे में कहा है-
                खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीति, मदपान
                रहिमन दाबे न दबे, जानत सकल जहान
      स्मरणीय है कि जब महात्मा गान्धी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब इस प्रतिबन्ध से मुक्ति के लिए उसके पदाधिकारियों ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपने संगठन को शुद्ध सांस्कृतिक संगठन बताते हुए वादा किया था कि वह कभी राजनीति में भाग नहीं लेगा। जब इस आश्वासन के बाद उस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया तो उसने कुछ ही दिन बाद राजनीतिक दल गठन करने के लिए अपने स्वयं सेवक भेज दिये जिनमें दीनदयाल उपाध्याय, कुशा भाऊ ठाकरे, सुन्दर सिंह भंडारी, कैलाशपति मिश्र, अटल बिहारी वाजपेयी, व लाल कृष्ण आडवाणी भी सम्मलित थे। तब से ही संघ दुहरा खेल खेल रहा है। जहाँ एक ओर वह कहता है कि उसे जनसंघ, जिसका परिवर्तित नाम भारतीय जनता पार्टी है, की कार्यप्रणाली से कोई मतलब नहीं है और उसके स्वयं सेवकों में तो सभी दलों के सदस्य हैं, वहीं दूसरी ओर वह केवल भाजपा की छोटी से छोटी बात में दखल देता रहा है व सारी गतिविधियां उसके निर्देश में ही चलती हैं। इतना ही नहीं नियंत्रण बनाये रखने के लिए भाजपा में ब्लाक से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन मंत्री के सारे पद केवल संघ प्रचारकों के लिए आरक्षित कर रखे हैं। संघ के स्वयं सेवक ही चुनावों में भाजपा की रीढ रहे हैं और अपने प्रारम्भिक चुनाव उन्होंने इसी पूंजी की दम पर लड़े हैं, और इसी के प्रभाव के अनुपात में सीटें जीती हैं। भाजपा के सारे बड़े नेता मौके ब मौके अपने को स्वयं सेवक बतलाते रहते हैं और उनके गणवेष में समारोहों में शामिल होते रहते हैं। असंतुष्ट होने पर संघ के एक निर्देश पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेता को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अलग कर दिया जाता है, और संघ के निर्देश पर ही राष्ट्रीय स्तर पर अज्ञात नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाता है। दोनों ही मामलों में कार्यकारिणी अचम्भे से देखती हुयी केवल सहमति देने को विवश होती है। संघ के निर्देश पर ही जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को विपक्षी नेता का पद नहीं दिया जाता और संघ के आदेश पर ही पार्टी से खुला विद्रोह करने वाली उमा भारती को पार्टी में पुनर्प्रवेश दिया जाया है।
राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पिछले दो एक महीने में छपे समाचारों के शीर्षक सारी कहानी कहते हैं
·         21मार्च 2012- संघ प्रमुख ने लगाई गडकरी की क्लास , भागवत का आदेश, कर्नाटक संकट जल्द निपटाएं। नागपुर/नई दिल्ली संघ के प्रमुख मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की क्लास ली। मंगलवार को तीन घंटे चली मैराथन बैठक में दोनों शीर्ष पदाधिकारियों ने लम्बे समय से चले आ रहे कर्नाटक को सुलझाने में असफल रहने पर गडकरी से स्पष्टीकण मांगा और इस मामले को जल्दी ही पटाक्षेप करने को कहा। राज्यसभा के उम्मीदवारों में नागपुर के अजय संचेती, और म.प्र. में नजमा हेपतुल्ला के चयन पर भी असंतोष जताया।...........
·         18मार्च2012- संघ ने दी भाजपा को नसीहत, विधानसभा चुनावों में मिला हार से नाखुश। नईदिल्ली, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भाजपा के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन से खासा नाखुश है। उन्होंने कहा है कि भाजपा को इस सवाल का जबाब ढूंढना चाहिए कि सांगठनिक ढांचा और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के एक मजबूत सीरीज होने के बाबजूद मतदाताओं की नजर में वह क्यों नहीं चढ सकी। ...............
·         18मार्च2012- गडकरी पर नहीं बनी सहमति। नागपुर/ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में नितिन गडकरी को फिर से भाजपा की कमान सौंपने की संघ मंशा रास नहीं आ रही है। वे संजय जोशी को संगठन महामंत्री का मौका देने के भी खिलाफ हैं।...................
·         16मार्च 2012- संघ म.प्र. सरकार की कार्यशैली से नाराज। नागपुर / भाजपा शासित राज्यों के संघ प्रचारकों ने पार्टी नेताओं की कार्यशैली पर और खासतौर पर मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को लेकर जिस तरह से नाराजगी जाहिर की, उससे इस बात की प्रबल सम्भावना है कि संघ इस बार भाजपा को लेकर बड़े फैसले ले सकता है। ...........
·         13मार्च2012- जनसत्ता सम्पादकीय- संघ का शिकंजा.........लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद संघ के सरसंघ संचालक मोहन भागवत ने पार्टी नेताओं को तलब करने से पहले सीधे संवाददाता सम्मेलन बुला कर नसीहत दी थी, और पार्टी अध्यक्ष को बदलने की जरूरत रेखांकित ही नहीं की थी अपितु बदल भी दिया था। विधानसभा चुनावों में मिली ताजा हार के बाद उन्होंने फिर से सार्वजनिक रूप से नेतृत्व बदलने की जरूरत बतायी। ...... गुजरात भाजपा इकाई में खींचतान और विद्रोह के बाबजूद भी मोदी बचे रहे तो उसकी बड़ी वजह संघ का उन पर वरद हस्त का होना था।  
इन समाचारों और विचारों से भाजपा पर संघ के नियंत्रण का पता चलता है, पर भाजपा में उफन रहे भ्रष्टाचार और दौलत से चुनाव संचालन के कारण भाजपा के नेताओं की संघ पर निर्भरता कम होती जा रही है और उनमें संघ से स्वतंत्र होने की छटपहाटें दिखायी देने लगी हैं।
कुछ नमूने देखिए-  
·         राजस्थान में वसन्धुरा राजे ने जिन गुलाब चन्द्र कटारिया की जन जागरण यात्रा को रुकवाया वे संघ के कट्टर स्वयं सेवक रहे हैं और राजस्थान में सरकार बनने के बाद भले ही दिखावटी मुख्यमंत्री का पद वसन्धुरा राजे को दिया गया था पर गृहमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद संघ ने उन्हें ही दिलवाया था। भैरोंसिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति पद पर चुने जाने के बाद विपक्ष के नेता पद पर उन्हें ही प्रतिष्ठित किया गया था। भाजपा सरकार के दौर में वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाते थे। उनकी यात्रा पहले संघ और फिर पार्टी से अनुमति लेने के बाद ही निकाली जा रही थी पर पद जाने की आशंकाओं से ग्रस्त वसुंधरा ने उन्हें चुनौती देकर और 59 विधायकों से त्यागपत्र लिखवा कर सीधे सीधे संघ को चुनौती दे दी है। वसन्धुरा की माँ विजयाराजे सिन्धिया ने काँग्रेस से नाराज होने के कारण बदला लेने के लिए भाजपा को अटूट साधन उपलब्ध कराये थे जिसकी बदौलत ही भाजपा[पूर्व जनसंघ] अपना आधार तैयार कर पायी थी। अडवाणी पीढी के लोग अब भी उनसे उपकृत महसूस करते हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता पद पर नियुक्ति के संघर्ष में वे पहले ही भाजपा और संघ नेताओं को नाकों चने चबवा चुकी हैं।
·         मध्यप्रदेश में आरएसएस के आनुषांगिक संगठन किसान संघ ने संघ से अनुमति लिये बिना पहले ही मुख्यमंत्री निवास घेर लिया था, और कुछ आश्वासन लेकर ही वापिस लौटे थे। इस बार पहले तो एक धरने के दौरान किसान संघ और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच बकायदा मारपीट हुयी और एक दूसरे के खिलाफ रिपोर्टें लिखवायी गयीं वहीं गैंहू खरीद के मामले में किये गये चक्काजाम के बाद पुलिस ने न केवल गोली चलायी अपितु एक किसान को गोली मार कर उसकी लाश का आनन फानन में अंतिम संस्कार भी करवा दिया। इसके साथ ही किसान संघ के अध्यक्ष और महासचिव को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस बीच भले ही उन्होंने एक जेबी पदाधिकारी बना कर भ्रम उत्पन्न करने की कोशिश की हो, किंतु प्रदेश में किसान संघ के संघर्षशील नेता ही अभी भी किसान संघ के किसानों की पहली पसन्द के नेता हैं। संघ के इशारों पर प्रदेश अध्यक्ष द्वारा किसान संघ के लोकप्रिय अध्यक्ष को ब्लेकमेलर कहा गया और संघ में कई अनियमितताओं के आरोप लगाये। ऐसे में संघ और किसानों के बीच टकराव तय है।
·         कर्नाटक में येदुरप्पा ने स्वयं को मुख्यमंत्री बनाने की माँग लेकर न केवल धमकी दी अपितु अपने पक्ष के विधायकों और मंत्रियों के त्यागपत्र भी ले के रख लिये। येदुरप्पा पहले कभी संघ के स्वयं सेवक रहे थे किंतु सत्ता का स्वाद चखने के बाद वे रेड्डी बन्धुओं की शह पर खुली बगावत पर उतारू हैं। संघ सत्ता की ओट में काम करने का अभ्यस्त हो चुका है और वह किसी भी तरह दक्षिण के इकलौते राज्य में संकीर्ण और जुटाये गये बहुमत से प्राप्त सत्ता खोना नहीं चाहता। यदि वह सैद्धांतिक आधार पर सत्ता दाँव पर लगाता है तो विभाजन तय है। इसके विपरीत जाने पर देश भर में स्वयं सेवक और समर्थक संघ में आस्था खो देंगे।
·         गुजरात में नरेन्द्र मोदी को केशुभाई ने खुली चुनौती दी है जबकि संघ मोदी के साथ है। संघ के कृपापात्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और स्वयं को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी समझने वाले नरेन्द्र मोदी एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देखना चाहते। ऐसे में संघ को अपनी पक्षधरता तय करनी पड़ेगी।
      इसी तरह हिमाचल में शांता कुमार बनाम धूमल, उत्तराखण्ड में निशंक बनाम खण्डूरी बनाम कोशियारी उत्तरप्रदेश में योगी, बनाम, राजनाथ सिंह, बनाम लालजी टण्डन, बनाम कटियार, बनाम कलराज मिश्र के साथ अब मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और चुनावों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित उमाभारती के साथ वरुण गान्धी मनेका गान्धी के बीच चल रहे द्वन्द में संघ को चुनाव करना पड़ रहा है और इस चुनाव के बाद उसकी ताकत का कमजोर होना तय है। गठबन्धन वाली सरकारों में तो क्षेत्रीय दल इस राष्ट्रीय दल के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं और संघ की छाया से भी बचते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि संघ की कूटनीति अब संकट में घिर गयी है। तभी पिछले दिनों संघ ने विधानसभा चुनावों के पूर्व झुंझला कर कहा था कि भाजपा हार जाये तो अच्छा और बिल्कुल से हार जाये तो बहुत अच्छा।  
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 10, 2012

प्रमुख दलों में खुली अनुशसनहीनता के खतरे


प्रमुख दलों में खुली अनुशासन हीनता के खतरे
                                                                        वीरेन्द्र जैन
                वैसे फुटकर समाचार तो आते ही रहते थे किंतु जब एक साथ एक ही दिन एक ही राज्य से दो राष्ट्रीय दलों में खुली अनुशासन हीनता, रोने गाने, मारपीट और कपड़ों के फटने के समाचार मुखपृष्ठ पर एक साथ आये तो इस पर विषयगत की जगह वस्तुगत रूप में विचार करना जरूरी हो गया। गत दिनों राजस्थान से समाचार आये कि प्रदेश भाजपा में कोर कमेटी की बैठक में से बाहर निकल कर पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष की नेता वसन्धुरा राजे सिन्धिया ने पार्टी से त्यागपत्र देने का विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के सदस्यों की भावना से प्रभावित कर पाने में असमर्थ रही हूं इसलिए त्यागपत्र देने का विचार कर रही हूं। कुछ ही देर बाद पार्टी के 58 विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों ने उन्हें अपने त्यागपत्र सौंप दिये। खबर के अनुसार इससे पहले बैठक में बहुत उत्तेजक बहस हुयी और इसी बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फोन पर संघ के नजदीकी गुलाब चन्द कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा का समर्थन करते हुए तिथि भी तय कर दी , इससे वसन्धुरा राजे सिन्धिया बिफर गयीं। उनका विश्वास है कि इस तरह की यात्रा का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बन सकता है इसलिए उनके अलावा किसी और के नेतृत्व में यह यात्रा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि भाजपा की मातृपितृ संस्था आरएसएस कटारिया के नेतृत्व में यात्रा के पक्ष में थी, क्योंके वे संघ के समर्पित स्वयं सेवकों में माने जाते हैं।
      दूसरी ओर राजस्थान के ही भरतपुर में उसी दिन कांग्रेस की सम्भागीय कार्यशाला चल रही थी जिसमें पूर्व सांसद विश्वेन्द्र सिंह और उनके समर्थकों ने कई पदाधिकारियों की लात घूंसों से पिटायी कर दी व कपड़े फाड़ दिये और प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान समेत मंचासीन लोग देखते ही रह गये। पूर्व राज परिवार से सम्बन्धित उक्त पूर्व सांसद ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतुष्ट होने का बहाना बनाते हुए कहा कि भरतपुर में पार्टी के अध्यक्ष का पद एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया है जिसकी भाजपा नेताओं से गहरी सांठ गाँठ है, व जो हत्या के मामले में आरोपी रह चुके हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भी प्रदेश अध्यक्ष मानने से इंकार करते हुए कहा कि वे उनके नेता नहीं हैं। उनके नेता तो सोनिया गाँधी और अशोक गहलोत हैं।
      इससे कुछ दिन पूर्व ही उत्तरप्रदेश में भी नवनिर्वाचित समाजवादी पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर सैकड़ों युवा मंच पर चढ गये थे और उन्होंने जंग जीतने जैसे उत्साह में न केवल मंच की शोभा अपितु समारोह की गरिमा को भी नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी के युवाओं की मर्जी से चल रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपीलें भी कुछ काम नहीं कर पा रही हैं।
      स्मरणीय है कि कुछ ही दिन पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने अपने पक्ष के विधायकों की एक बैठक बुला कर स्वयं को पुनः मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास किया था व राष्ट्रीय नेतृत्व को लगभग धमकाने वाले अन्दाज में चेतावनी दी थी कि एक खास तिथि तक उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दें अन्यथा दक्षिण में भाजपा की इकलौती सरकार गिरने के लिए वे स्वयं जिम्मेवार होंगे। झारखण्ड के राज्य सभा चुनाव में भाजपा के लिए विदेश से डालरों में धन जुटाने वाले अंशुमान मिश्र की उम्मीदवारी से बौखलाये यशवंत सिन्हा ने उनकी उम्मीदवारी न बदलने की दशा में पार्टी छोड़ देने की धमकी दी थी जिससे केन्द्रीय नेतृत्व घबरा गया और प्रत्याशी बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी सरकार होते हुए भी उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया। अभी हाल ही में दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा का टिकिट चाहने वाले एक उम्मीदवार ने दूसरे को गोली मार दी थी।
      वाय एस रेड्डी की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद जगनमोहन रेड्डी द्वारा अपने दल के आदेशों के खुले उल्लंघन के बाद पार्टी छोड़ देने के बाद आन्ध्र प्रदेश में अस्थिरता बढ गयी है, व पहले से जारी पृथक तेलंगाना आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया है। कांग्रेस के सांसद भी अपनी ही सरकार के खिलाफ सदन में नारेबाजी कर रहे हैं और अनुशासनहीनता में उन्हें सदन से निलम्बित करना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस हाईकमान द्वारा तय किये गये मुख्यमंत्री प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेस के ही दूसरे नेता ने खुला विद्रोह कर दिया था जिसे बमुश्किल मनाया जा सका। तृणमूल कांग्रेस ने अपने ही दल के रेल मंत्री के रेल बजट के बहाने उन्हें रेल मंत्री पद से हटाने की जिद ठान ली जिस निर्णय के विरोध में एक दूसरे सांसद ने ममता बनर्जी के खिलाफ झंडा उठा लिया और गीत लिख डाला। डीएमके में करुणानिधि के दोनों बेटों में उत्तराधिकार के लिए तीखी जंग चल रही है जो बहुधा हिंसक हो जाती है। शिवसेना तो दो भागों में विभाजित ही हो चुकी है, अकाली दल में से मनप्रीत सिंह बादल को भले ही चुनावी सफलता न मिली हो किंतु अकाली दल में रन्ध्र तो हो ही चुका है। अपने अनुशासन के लिए जाने जाने वाले बामपंथी दलों में भी राष्ट्रीय कांग्रेस के अवसर पर पोलित ब्यूरो सदस्य अनुपस्थित पाये जाने लगे हैं।
      विचारणीय यह है कि अनुशासनहीनता की यह बाढ क्यों आ गयी है, और जिन दलों या गठबन्धनों में अपना अनुशासन ही न हो उनसे अपने कार्यक्रम या घोषणाओं के पूरी होने की उम्मीद कैसे लगायी जा सकती है। इसका प्रणाम अभी हाल ही में मिला जब वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संतुलित शब्दों में कहा कि गठबन्धन सरकारों में कार्यक्रम लागू करने में विलम्ब होता है।
      दर असल हमने अपने लोकतंत्र को लोगों की आकांक्षाओं के शासन की जगह उनके ऐसे वोटों का शासन बना दिया है जो उनकी आकांक्षाओं का प्रदर्शन नहीं करते अपितु वे वोट किसी लालच, दबाव, भ्रम, धोखे, भावुकता, या अज्ञानता से गिरवा लिये जाते हैं। ऐसा करने के लिए विचार, सिद्धांत, कार्यक्रम, या घोषणापत्रों की जगह, चुनावों के दौरान कुछ सेलीब्रिटीज, कुछ साम्प्रदायिकता, कुछ जातिवाद, कुछ भाषावाद, कुछ क्षेत्रवाद, आदि का प्रयोग कर लिया जाता है। चुने हुए प्रतिनिधि विशिष्ट प्रतिनिधि बन जाते हैं जो न केवल अपनी सुख सुविधाओं को ही बढाते रहते हैं, अपितु अपनी विशिष्ट स्थिति से नये नये धन्धे करते हैं, या पुराने धन्धों का विस्तार करते हैं। इस अर्जित विशिष्टता से वे अपनी गैरकानूनी और आपराधिक गतिविधियों में सुरक्षा पाते हैं। यही कारण है कि गैरकानूनी धन्धा करने वाले लोग ज्यादा से ज्यादा सत्ता की सम्भावनाओं वाले दलों से जुड़ने की कोशिश करने लगे हैं और ये खोटे सिक्के असली सिक्कों को बाजार से बाहर करने लगे हैं। सदनों में आज तीन चौथाई करोड़पति पहुँचने लगे हैं जो समाज सेवा की भावना से नहीं अपितु अपने व्यावसायिक लाभ या सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए वहाँ जाना चाहते हैं। चुने जाने के बाद वे सदन में नजर नहीं आते और ना ही बहसों में भाग लेने की कोशिश ही करते हैं। ऐसे लोग अपनी या अपने पक्ष के लोगों की उम्मीदवारी और चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते। अरविन्द केजरीवाल और बाबा रामदेव द्वारा भले ही प्रतिवाद द्वारा सुर्खियों में आने के लिए सांसदों के खिलाफ निन्दनीय भाषा का प्रयोग किया गया हो, किंतु यह भी समरण रखना होगा कि ऐसा इसलिए भी किया गया है क्योंकि जनता का एक बड़ा वर्ग भी ऐसे ही विचार रखता है।
      राष्ट्रीय दलों में अनुशासनहीनता दलों में विभाजन और अधिक से अधिक गठबन्धन वाली अस्थिर सरकारों की ओर ही ले जायेगी जिसका परिणाम देश के लिए अच्छा नहीं होगा, इसके लिए जरूरी होगा कि सत्ता की चिंता किये बिना राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों और विचारों पर दृड़ संगठनों का निर्माण करें। अनुशासनहीनता किसी भी हालत में सहनीय न हो और सभी दलों को इसके लिए किसी कानून से बाँधा जाये। सदन की उम्मीदवारी या लाभ के पद के लिए पार्टी में वरिष्ठता की सीमा तय हो ताकि एक दल से निकाला हुआ अनुशासनहीन व्यक्ति लाभ के लिए दूसरे दल में आश्रय न पा सके। विशिष्ट पद पर बैठे व्यक्तियों का जीवन पारदर्शी हो और उन्हें व्यापार व्यवसाय की अनुमति न हो। उन पर लगे आरोपों के खिलाफ त्वरित जाँच और शीघ्र न्याय की व्यवस्था हो। विशिष्ट व्यक्तियों के विचलन पर दण्ड भी विशिष्ट होना चाहिए। इस मामले में हाल ही में दिये गये बंगारू लक्ष्मण के मामले में दिये गये फैसले की भावना से प्रेरणा ली जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में अधिकारियों को निष्पक्ष कठोर फैसले लेने की सलाह दी है जिसे केवल अधिकारियों तक सीमित न मान कर दलों के अध्यक्ष समेत प्रत्येक निर्णायक व्यक्ति के लिए जरूरी माना जाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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